
फर्जी इतिहास-बोध न केवल अपनी विरासत को नकारता है, बल्कि अपने अस्तित्व को भी नकारता है। कैसे? पढ़ें यह लेख।

हमारी संस्कृति में नशापान अनन्य रूप से शामिल है। देवी-देवता नशापान करते हैं और धार्मिक आयोजनों में शराब और भाँग-धतूरे का प्रयोग होता है। फिर भी कुछ बातें ऐसी हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

आजादी के संघर्ष में "भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केवल एक संगठन नहीं थी, बल्कि वह उस चेतना का नाम थी, जिसने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना सिखाया।" - इसी आलेख से

"विष से भरे बाण कलेजे में चुभोए जा रहे हैं और जिसे चुभाया जा रहा है, वह उसे अमृत मान रहा है।" इसी आलेख से

"वतन के वास्ते मिट गए बिस्मिल जैसे हज़ारों लोग और अब के सत्ताधारी स्वार्थ के वास्ते वतन को ही चींथ रहे हैं।" - इसी आलेख से

"वे खूब ज्ञान परंपरा की तलाश करें, लेकिन वे बतायें कि वे ज्ञान परंपराएँ इतनी निर्बल क्यों थीं कि भारतीय परस्पर घृणा करते रहे और देश ग़ुलाम होता रहा?" पढ़िए इस आलेख में

शिक्षा-सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के आधारों पर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अच्छे स्कूल नहीं कहा जा सकता। कैसे? तथ्यों और तर्कों से अवगत होने के लिए पढ़े यह आलेख.

"अड़ानी एनटीपीसी स्थल में ज्योंही हमलोगों ने प्रवेश किया, पहाड़िया जाति के बीसों स्त्री-पुरुष आ गए। ये लोग हताश-निराश हैं। कोई आता है तो उनके अंदर हल्की-सी आशा बंध जाती है।" इसी आलेख से

"बच्चों को किताबों और नेट में झोंक दीजिए, फिर तो यंत्र ही बनेंगे और नहीं बन सके तो किसी कुकांड के शिकार होंगे। ऐसे ही बिगड़े बच्चों के मुँह पर ताले नहीं होते।" - इसी आलेख से

सोशल मीडिया पर या तो आप एआई की गिरफ्त में हैं या नफ़रत की या विज्ञापनों की। बहुत कम पोस्ट तार्किक और बौद्धिक होते हैं।