
"जाति एक दड़वा बनाती है, जिसमें इंसान घुटता रहता है। जाति के हजारों दड़वे हैं और उन दड़वों में इंसान जितना भी स्नान कर ले, लेकिन देह पर फिर भी मैल जमी ही रहती है, मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह।" - इसी आलेख से

"एक तरह से देखा जाए तो जब सरकार पब्लिक द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे का सदुपयोग करने में असफल हो जाती है, तब उसे सत्ता में बने रहने के लिए दंडनीति का प्रयोग करना पड़ता है। साम-दाम-दंड-भेद सब जायज लगने लगता है।" इसी आलेख से

"यह देश तय करे कि उसे प्रधानमंत्री की प्रशंसा चाहिए या देश की तबाही? हम आखिर कहाँ आ गये हैं? क्या सचमुच राजनैतिक नेता गैरतहीन हो गये हैं?" - इसी आलेख से

"राजभवन को लोकभवन बना दिया गया, मगर उसकी कार्यशैली में क्या अंतर आया? अंग्रेजों के ये लाट साहब आजादी के बाद भी लाट ही बने रहे।" - इसी आलेख से

"जब तक किसी की अशिक्षा और बीमारी से मुनाफा होता रहेगा, ना ही कोई शिक्षित होगा, ना ही स्वस्थ। आज एक समाज बीमार पड़ा है। इसकी समस्या सिर्फ सत्ता नहीं है, सिस्टम है।" - इसी आलेख से

"जो भी हो, गलगोटिया कोई एक दिन में पैदा नहीं होता। उसकी भी लंबी परंपरा है। झूठ का जो टोकरा प्रधानमंत्री ने जनता को थमाया है, उसमें गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ही विकास हो सकता है।" - इसी आलेख से

"शिक्षा बीच बाजार में खड़ी है। हर स्तर की डिग्री का मोल भाव हो रहा है। यहाँ तक कि सरकारी विश्वविद्यालयों की हालत कम खराब नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ नारों में सिमट गई है।" - इसी आलेख से

"क्या हम श्रम विहीन दुनिया में प्रवेश करने जा रहे हैं? अभी तक की मनुष्य की संस्कृति श्रम आधारित है। यंत्रों ने मनुष्य को श्रम से काटने की शुरुआत की। पहले उसने मदद की और अब यंत्रों ने उसे घेर लिया है। यंत्र ने शरीर और मन दोनों पर कब्जा करना शुरू किया है।" इसी आलेख से

"प्रेम की गति अजीब होती है। बात बात में ‘आई लव यू' कहने वाला संभव है कोई लव नहीं करे और कोई भितरघुन्ना कुछ न कहे और लव में अपने को शहीद कर दे।" - इसी आलेख से

"पक्ष और विपक्ष में परस्पर विश्वास न हो, तो लोकतांत्रिक व्यवहार का क्षरण होता है। प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता पर इसकी जिम्मेदारी ज्यादा होती है कि वह लोकतंत्र को बचाये रखे। व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी लोकतंत्र को नष्ट करने में सहायक होती है।" इसी आलेख से