Category जन पत्रकारिता

हाले-लोकतंत्र

"जिस तरह से कार्यपालिका अर्थ का बंटाधार कर रही है, मुझे लगता है इस लोकतंत्र को एक चौथे और मजबूत खंभे की जरूरत है, जो अर्थ का संचार न्याय-संगत कर सके। मैं पब्लिक पालिका की प्रस्तावना आपके सामने रखता हूँ।" - इसी आलेख से

जय श्रीराम बनाम जय काली

"प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हिंदी पट्टी में चुनावी काम जय श्री राम से चल जाता था। बंगाल में श्री राम बहुत महत्वपूर्ण देवता नहीं हैं। उनसे वहाँ वोट उगाही नहीं हो सकती, इसलिए इस बार वे जय काली पर उतर आए हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : अतिरिक्त बुद्धि का कृष्ण पक्ष

a close up of a lion on a field
"जहाँ सोचना बंद या अवरुद्ध हो जाय, वहाँ जंगलराज शुरू होता है। सत्ता को सोचने वालों से बहुत डर लगता है। जंगल का राजा सिंह होता है। वह भी सोचता कम है और अन्य जानवरों को भी सोचने नहीं देता और भयभीत रखता है।" - इसी आलेख से

हज़ारों करोड़ का चंदा, चुनिंदा कंपनियाँ और वही दल—क्या भारत का लोकतंत्र अब अमीरों का खेल बन चुका है?

"सवाल सीधा है और असहज करने वाला भी— भारत का लोकतंत्र किसके लिए काम कर रहा है? उस आम नागरिक के लिए, जो टैक्स देता है, वोट देता है और नियम मानता है? या फिर उन कॉरपोरेट कंपनियों के लिए, जो राजनीतिक दलों को हज़ारों करोड़ रुपये का चंदा देकर नीतियों तक सीधी पहुँच बना लेती हैं?" - इसी आलेख से

नया कुरुक्षेत्र

"विक्रमशिला हो, या तक्षशिला, उस समय के अनुसार उत्तम शिक्षा दे रही थे। धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति फल-फूल रही थी। इसलिए नहीं कि किसी देवी-देवता का वरदान था। हम ही थे जो मंदिर को सुंदर बना रहे थे। कला समृद्ध हो रही थी। संगीत की शाला थे मंदिर, मधुर भजन मन को शांत करती थी।" इसी आलेख से

इन दिनों : असंतुष्टों की जंग के शिकार

a couple of black birds sitting on top of a tree
"अमानवीयता में कुरूपता है और संवेदना में सौंदर्य है। मनुष्य प्रकृति को खदेड़ता जा रहा है। वह जिसके कारण जीवित है, उसके खिलाफ ही युद्ध ठान रखा है।" इसी आलेख से

मुझे तो इहलोकतंत्र चाहिए!

a large crowd of people standing in a street
"क्या है इहलोकतंत्र? मैंने पाया यह दुनिया मेरी है। मैं इसे लिख रहा हूँ, ना सिर्फ़ शब्दों में, बल्कि अपने कर्मों से। मैंने अपने कर्म लिख डाले।" - इसी आलेख से