Category जन पत्रकारिता

निजी विद्यालय संचालन की चुनौतियाँ

केवल सरकारी स्कूल ही नहीं, निजी विद्यालयों की भी व्यथाएँ हैं। प्रस्तुत आलेख में निजी विद्यालयों के संचालन के मार्ग में विभिन्न प्रकार की संरचनात्मक, आर्थिक और प्रशासनिक कठिनाइयों का विश्लेषण है।

ईरान–अमेरिका टकराव: लोकतंत्र का ढोंग या साम्राज्यवाद की भूख?

white and black plane in the air during daytime
"जिस भूमंडलीकरण के दौर में हमें बताया गया था कि अब दुनिया “मुक्त बाजार” से चलेगी, विश्व में सह-अस्तित्व संभव है द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतराष्ट्रीय कानून और UNO के गठन का उद्देश्य भी यही बताया गया था लेकिन वह भ्रम धीरे-धीरे टूट रहा है।" इसी आलेख से

इन दिनों : आधुनिक सभ्यता का स्याह चेहरा

Four missiles on a launch platform with brick wall background
सभ्यता का तक़ाज़ा है कि लोग शांति और सुख की ओर बढ़ें। लेकिन विश्व में हड़पने की होड़ ने हत्याओं और विनाश का अंतहीन दौर चल पड़ा है। हमारी सभ्यता का आज यही चेहरा बन गया है।

इन दिनों : आपदा में अवसर की ‘सुगंध’

"असल में लोकतंत्र पूँजीपतियों और उसके दलालों का शासन है। जनता को सरकार चुनने का भ्रम भले रहे, लेकिन असल लाभ और मजा पूँजीपति और दलाल ही उठाते हैं।" इसी आलेख से

बिहार में सत्ता-पलट से उपजी संभावनाएँ

व्यतीत का विश्लेषण राजनीतिक उठा-पटक और छल-छद्म को समझने में सहायक हो सकता है। परंतु वास्तविक चिंता राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संभावनाओं की होनी चाहिए। यह आलेख इन्हीं संभावनाओं का विश्लेषण करने की कोशिश करता है।

इन दिनों : विश्व के हुक्मरानों से

a group of men standing around a wrecked airplane
"प्रकृति की किसी भी चीज़ को मनुष्य ने निर्मित नहीं किया, फिर इन पर मनुष्य का एकाधिकार क्यों हो? ये तमाम चीज़ें सबके लिए हैं और किसी लालची तानाशाह को इसे बर्बाद करने की छूट देना मनुष्यता के साथ द्रोह है।" इसी आलेख से

इन दिनों : कमाबे लंगोटिया, खाय लंब धोतिया

" राजनीतिक दलों के लिए खून-पसीना बहाते हैं उसके कार्यकर्ता, मगर कार्यकर्ताओं पर नेताओं को भरोसा नहीं होता, इसलिए गोदाम में पड़े अपने पुत्र-पुत्रियों को धो-पोंछ कर व गाल पर पाउडर मल कर निकाल लाते हैं। और फिर उनके जयकारे लगने लगते हैं।" इसी आलेख से

सिद्धांत और सत्ता के बीच फँसी नीतीश की राजनीति

"भारतीय राजनीति में आदर्श और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष नया नहीं है। अनेक नेता सिद्धांतों की बात करते रहे हैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के दबाव में उनके निर्णय बदलते रहे हैं। नीतीश कुमार का हालिया कदम भी शायद इसी राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा है।" - इसी आलेख से

महिलाएँ पीछे नहीं जाएँगी

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शताब्दियों के संघर्ष के बाद महिलाओं ने जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकार प्राप्त किए थे, वे फिर से कमजोर हो रहे हैं। लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों में भी महिलाएँ कमज़ोर नहीं हो रही हैं। अपने अधिकारों को बनाए रखने और समानता के लिए पूरी दुनिया में महिलाएँ आज भी संघर्ष कर रही हैं। इस आलेख में चिंता और विश्वास दोनों हैं।