Category जन पत्रकारिता

इहलोकतंत्र क्या है?

"“स्वराज” एक राजनैतिक अवस्था ही नहीं है, यह एक दार्शनिक चित्रण है जो हमारे चरित्र में प्रतिबिंबित होना चाहिए। स्वराज सिर्फ एक विचार ही नहीं, व्यवहार है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : बुढ़ापा और जवानी: सौंदर्य और उदासी

"विरह और मिलन का क्रम ही तो जीवन है। कहाँ होता है विरह और मिलन? एक स्थल पर निर्धारित है मिलन भी और विरह भी। जीवन इसके संयोग से ही समृद्ध होता है।" इसी आलेख से

इन दिनों : जाति के दड़वों की घुटन

"जाति एक दड़वा बनाती है, जिसमें इंसान घुटता रहता है। जाति के हजारों दड़वे हैं और उन दड़वों में इंसान जितना भी स्नान कर ले, लेकिन देह पर फिर भी मैल जमी ही रहती है, मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह।" - इसी आलेख से

लोकतंत्र की सत्ता का सपना, अपना होना चाहिए!

"एक तरह से देखा जाए तो जब सरकार पब्लिक द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे का सदुपयोग करने में असफल हो जाती है, तब उसे सत्ता में बने रहने के लिए दंडनीति का प्रयोग करना पड़ता है। साम-दाम-दंड-भेद सब जायज लगने लगता है।" इसी आलेख से

इन दिनों : राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के संघर्ष में हारता एक देश

"यह देश तय करे कि उसे प्रधानमंत्री की प्रशंसा चाहिए या देश की तबाही? हम आखिर कहाँ आ गये हैं? क्या सचमुच राजनैतिक नेता गैरतहीन हो गये हैं?" - इसी आलेख से

इन दिनों : जिजीविषा और लोकतंत्र के चीथड़े

a large building with a clock tower on top of it
"राजभवन को लोकभवन बना दिया गया, मगर उसकी कार्यशैली में क्या अंतर आया? अंग्रेजों के ये लाट साहब आजादी के बाद भी लाट ही बने रहे।" - इसी आलेख से

शिक्षा क्रांति की जरूरत

gray locker
"जब तक किसी की अशिक्षा और बीमारी से मुनाफा होता रहेगा, ना ही कोई शिक्षित होगा, ना ही स्वस्थ। आज एक समाज बीमार पड़ा है। इसकी समस्या सिर्फ सत्ता नहीं है, सिस्टम है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : गलगोटिया की अपसंस्कृति अचानक नहीं आयी

"जो भी हो, गलगोटिया कोई एक दिन में पैदा नहीं होता। उसकी भी लंबी परंपरा है। झूठ का जो टोकरा प्रधानमंत्री ने जनता को थमाया है, उसमें गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ही विकास हो सकता है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : भींगे कंबल, बरसे पानी

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"शिक्षा बीच बाजार में खड़ी है। हर स्तर की डिग्री का मोल भाव हो रहा है। यहाँ तक कि सरकारी विश्वविद्यालयों की हालत कम खराब नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ नारों में सिमट गई है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : मनुष्य क्या पिंजरबद्ध दुनिया स्वीकार करेगा?

"क्या हम श्रम विहीन दुनिया में प्रवेश करने जा रहे हैं? अभी तक की मनुष्य की संस्कृति श्रम आधारित है। यंत्रों ने मनुष्य को श्रम से काटने की शुरुआत की। पहले उसने मदद की और अब यंत्रों ने उसे घेर लिया है। यंत्र ने शरीर और मन दोनों पर कब्जा करना शुरू किया है।" इसी आलेख से