
"क्रिसमस में चर्च जल रहे, युवाओं को पार्क में पीट रहे, नदी - मंदिर में किसी खास को जाने से रोक रहे। दूसरे धर्म के त्योहार में रुकावट बन रहे हैं तो अपने त्योहार को तमाशा बनाने पर तुले हैं। अरे, जबकि यह बस धर्म का विषय नहीं है, यह आपकी संस्कृति के हनन का विषय है।" - इसी आलेख से

"कोई देश यों ही विश्वगुरु नहीं हो जाता। जहाँ महात्मा भी बलात्कार करते हों और इन महात्माओं की चरण वंदना सत्ता में बैठे लोग करते हों, ऐसे देश को विश्व गुरु बनने से कौन रोक सकता है।" - इसी आलेख से

दुनिया के कई देशों की शिक्षा प्रणाली बेहतर मानी जाती है और कई प्रसंगों में उदाहृत होती है। इस लेख में कई देशों की शिक्षा प्रणाली की विशेषताओं पर विहंगम दृष्टि डाली गयी है ताकि वैश्विक परिप्रेक्ष्य को समझ सकें और अपने देश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोच सकें।

"जिस देश की अस्सी फीसदी जनता को खाने के पाँच किलो अनाज सरकार दे रही है । दो सौ लाख करोड़ रुपए देश पर विदेशी कर्ज है। डालर की तुलना में रुपये की कीमत धड़ाधड़ गिर रही है। पेट्रोल से लेकर बाजारू सामान की कीमत पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। वहाँ प्रधानमंत्री की रैलियों पर इतना खर्चा क्या बताता है?" - इसी लेख से

"इस संगीन अपराधकर्म में न्यायपालिका भी है, विधायिका भी और कार्यपालिका भी। तीनों पर से वस्त्र उतर रहे हैं। बिल्किस बानो का केस याद होगा। निचली अदालत अपराधियों की सजा माफ करता है। अपराधी जेल से निकलता है तो ध्वजधारी पार्टी के लोग माला लेकर उसके स्वागत में नारे लगाते हैं। यह कौन समाज है भाई!" - इसी आलेख से

दुनिया में सबसे अधिक पढ़नेवाले देशों में भारत का स्थान दूसरा है। जबकि यहाँ बमुश्किल 10 प्रतिशत लोग मैट्रिक पास हैं। उनकी पढ़ाई का स्तर भी श्लाघनीय नहीं है। तो फिर वे कौन हैं, जिनके कारण भारत दुनिया का दूसरा सबसे पढ़ाकू देश है? - पढ़िए इस आलेख में।

"अगर आपकी आँखों पर भी नारे और वादों की पट्टी है या नेताओं के धूर्त-जाल में फंस गए हैं तो अरावली से लेकर तमाम नदियों, सागर, जंगल, जल आदि को लुटने दीजिए। ऐसी हालत में इस धरती पर अंततः फंसड़ी लगाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।" - इसी आलेख से

"नैतिकता कोई जड़ चीज नहीं है। समय, काल और स्थान पर नैतिकता परिवर्तित हो जाती है।" - इसी आलेख से

"यह बात सही है कि आर्थिक तंगी भी कई समस्याओं को जन्म देती है। लेकिन आर्थिक तंगी खत्म होने के बाद भी आदमी संतुष्ट कहाँ रह पाता है? आखिर आदमी क्या ढूँढ रहा है?" - इसी आलेख से

"पाखंड और अंधविश्वास परोस कर लोगों के कान, आँख और मुँह बंद कर दिए। ऐसी सीख और पट्टी पढ़ाई कि वे असत्य को सत्य मानने लगे। प्रधानमंत्री को देश को नये मुकाम पर ले जाना था तो चंदन टीका लगा कर सोलहवीं शताब्दी में खींच कर ले गए।" - इसी आलेख से