Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : मत रो माता, लाल तेरे बहुतेरे

"धरम के वरद पुत्र कितने अधार्मिक हैं! इन्हें वंदे मातरम् का शौक चढ़ा है। मातरम् के पुत्रों को खूब कूटो और वंदे मातरम् के जरिए देश में घृणा का माहौल बनाओ।" - इसी आलेख से

इन दिनों : सैंया भए कोतवाल

सुबह सूरज ठीक से उगा नहीं। सूरज पर कटे-कटे बादल छाये रहे। ठंड के कारण खिड़कियां बंद रहती हैं, इसलिए चिड़िया के स्वर सुनाई नहीं पड़े। खिड़कियों में लगे शीशे के बाहर सबकुछ शांत लगता है। आम, नारियल और महुगनी…

इन दिनों : है गीत अधूरा, तराना अधूरा

जीविका दीदियाँ मछली पालन करेंगी, इसके लिए तालाब बनवाया गया। तालाब में पानी नहीं था तो मुख्यमंत्री के आने के दिन उसमें बोरिंग से पानी भरा गया। मुख्यमंत्री वही तालाब जीविका दीदियों को समर्पित करके चले गए।

इन दिनों : यह नए युग की संसद है साहिबान!

"देश भौंचक है। सरकार क्या केवल अपना एजेंडा चलायेगी और विपक्ष को ही सिरफिरा साबित करेगी। दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष की मांग को प्रधानमंत्री ड्रामा कह रहे हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : आँख के अंधे, नाम नयनसुख

कुछ संत महिलाओं पर लगातार अभद्र टिप्पणियाँ कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। ये वही संत हैं, जो हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। ऐसा हिंदू राष्ट्र, जिसमें महिलायें मानवीय इकाई नहीं, एंजॉयमेंट का उपकरण होंगी।

इन दिनों : गिद्ध और मांस की पोटली की आधुनिक कथा

हमाम में नंगे लोग अगर सबको कपड़े पहनने का आह्वान करे तो उसकी बात कोई क्यों मानेगा? जिसके हाथ अपराधियों को टिकट देने से नहीं कांपे और हत्यारोपी विधायक बनाता रहे, उसके राज में अपराध खत्म कैसे होगा?

इन दिनों : असली लोकतंत्र का दृश्य: जेसीबी में लटके युवक

सड़कों के किनारे बसे हुए लोग केवल झुग्गी-झोपड़ियाँ ही नहीं खड़ी करते, बल्कि अपने लिए रोज़ी-रोजगार भी खड़े करते हैं। जब सरकार शहर की सफाई के नाम पर झोपड़ियों को उजाड़ती है तो केवल झोपड़ी नहीं उजड़ती है, बल्कि उन ग़रीबों का रोज़गार भी उजड़ता है।

इन दिनों : सामाजिक न्याय और जातिवाद

"देश‌ को तीसरी राह की जरूरत है, जिसके केंद्र में राष्ट्र हो, सभी नागरिकों के लिए उसमें स्पेस हो, जाति उच्छेद करने की सच्ची ख्वाहिशें हों और आर्थिक समानता की जिद हो। सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की बुलंद आवाज़ हो। वह न अन्याय करे और किसी को अन्याय करने दे।" - इसी आलेख से

इन दिनों : दिल्ली प्रदूषण का हल है पब्लिक पालिका

"देश का वास्तविक विकास ट्रिक्ल डाउन थ्योरी से नहीं, बल्कि ‘रेनफाल थ्योरी' के आधार पर होना चाहिए यानी रिस-रिस कर बूंद-बूंद विकास नहीं होगा, बल्कि हर जगह एक तरह से विकास होगा। कोई गैर बराबरी नहीं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : आदिवासी समाज में हलचल के मायने

"आजादी के बाद जनता कमजोर हुई है और तंत्र मजबूत हुआ है। लोकतंत्र के लिए यह बड़ा खतरा है। तंत्र की मजबूती के बाद शक्तियों का केंद्रीकरण होता है और यह शक्तियां एक व्यक्ति में निहित हो जाती हैं । इस प्रक्रिया में जनता पीछे छूटती जाती है।" - इसी आलेख से