अर्थशास्त्र की बुनियाद अभाव पर टिकी है, और वाणिज्यशास्त्र का आधार व्यापार पर। आइए! समझते हैं कैसे? इस अध्याय में हम दोनों का अंतर समझेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि इनकी हमारी जिंदगी में क्या जरूरत है। जरूरी…
"पंडितों ने भी गजब कहर बरपा रखा है। ठंड है तो मंदिरों के देवता काँपने लगते हैं। पंडित ऊनी कपड़े का इंतजाम करते हैं। गर्मी है तो एयरकंडीशन। देवताओं के लिए हर मौसम में यथोचित इंतजाम है। देवता खुश, पंडित खुश।" - इसी आलेख से
"जिस तरह से कार्यपालिका अर्थ का बंटाधार कर रही है, मुझे लगता है इस लोकतंत्र को एक चौथे और मजबूत खंभे की जरूरत है, जो अर्थ का संचार न्याय-संगत कर सके। मैं पब्लिक पालिका की प्रस्तावना आपके सामने रखता हूँ।" - इसी आलेख से
"प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हिंदी पट्टी में चुनावी काम जय श्री राम से चल जाता था। बंगाल में श्री राम बहुत महत्वपूर्ण देवता नहीं हैं। उनसे वहाँ वोट उगाही नहीं हो सकती, इसलिए इस बार वे जय काली पर उतर आए हैं।" - इसी आलेख से
"जहाँ सोचना बंद या अवरुद्ध हो जाय, वहाँ जंगलराज शुरू होता है। सत्ता को सोचने वालों से बहुत डर लगता है। जंगल का राजा सिंह होता है। वह भी सोचता कम है और अन्य जानवरों को भी सोचने नहीं देता और भयभीत रखता है।" - इसी आलेख से
"सवाल सीधा है और असहज करने वाला भी— भारत का लोकतंत्र किसके लिए काम कर रहा है? उस आम नागरिक के लिए, जो टैक्स देता है, वोट देता है और नियम मानता है? या फिर उन कॉरपोरेट कंपनियों के लिए, जो राजनीतिक दलों को हज़ारों करोड़ रुपये का चंदा देकर नीतियों तक सीधी पहुँच बना लेती हैं?" - इसी आलेख से