मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि चारा घोटाला ही काफ़ी नहीं था, पता चला है कि मध्य-प्रदेश में गौ-मूत्र घोटाला भी हो गया। गौ-अनुसंधान केंद्र खुल रहे हैं। 8-8 करोड़ रुपये Urine-Test में खर्च हो गए। अजीब माया है। आसाम ने गुजरात से 300 गीर गायें मंगाने में लाखों उड़ा दिए गए, और पता चला कि उनमें से आधी तो लौटा दी गई और जो बची स्वस्थ गायें स्टेशन पर उतरी उनको लूट लिया गया। लूटने वाले पता चला हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों के चहेते हैं। होंगे भी। वरना यहाँ तो हमारे गृह मंत्री ही गाजे-बाजे के साथ बताते हैं, उनके राज में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। बस, यहाँ बसने वाले परिंदों के उन्होंने पर ही खुचल डाले। अब बेचारे उड़-उड़ कर भी कहीं जाते हैं, तो उनमें से कुछ को तो बेड़ियों में बाँधकर हिंदुस्तान भेजा जा रहा है। हाल ही में ऐसा एक हवाई जहाज़ अमेरिका से लुधियाना उतरा था। गर्व की बात होनी चाहिए, ये गर्व की राजनीति कितनी खोखली है?
भगवान भी कोई गर्व करने की बात हैं। किसी धर्म और मजहब में हम पैदा नहीं होते। पैदा तो हम बस जानवर होते हैं। इंसान तो हमें समाज बनाता है, संवाद बनाता है, सोचिए! अकेला आदमी और अकेला कुत्ता भी एक परिवार बना लेता है। शब्द कम होते हैं, कुछ हाव भाव, कुछ लाड़-प्यार से संवाद होता है, तो झगड़ा भी कम होता है।
स्वामी विवेकानंद ने धर्म के तीन स्तंभ की बात की है। पहला उसका मिथक, वह साहित्य, जो संवाद को जन्म देता है। वो कहानियाँ होती है, जो आसानी से हमें नैतिकता सिखाती है। हर समाज अपनी नैतिकता ख़ुद चुनता है। कोई अपने बच्चों को जीसस की कहानियाँ सुनाता है, कोई कृष्ण की, कोई राम, कोई मोहम्मद की। गौर से देखिए हर कहानी में अच्छाई जीत जाती है, बुराई हार जाती है। अच्छाई क्या है? जो जीवन के पक्ष में है अच्छा है, नैतिक है। यहीं मामला उलझ जाता है। इन प्रतीकों की प्रतिष्ठा में मतभेद हो जाते हैं। मैंने जिसकी कहानी अपने बच्चों को सुनाई है, वह ज़्यादा अच्छा है। हम एक-दूसरे की अच्छाई देखने की जगह, उनके बच्चों में ही खोट देखने लगते हैं। मन को मेहनत करना एकदम पसंद नहीं। मुझे बड़ी हैरानी होती है यह देखकर कि इन्हें पढ़े बिना ही लोग मरने-मारने को लालायित नजर आते हैं। हँसी भी आती है। अफ़सोस भी होता है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार धर्म का दूसरा आधार आता है कर्म कांड, जिसमें निज दिन की दिनचर्या से लेकर त्योहारों की तैयारी शामिल होती है। ये त्योहार समाज को जोड़ते हैं। व्यक्ति को व्यक्ति के साथ प्रेम करने का मौका देते हैं। साथ हँसने-खेलने का वक्त देता है, हर त्योहार। इंसान मशीन नहीं हो सकता, क्योंकि वह थक जाता है। उसे मरने का डर सताता है। इसलिए उसे मनोरंजन चाहिए। मेरी ऐतिहासिक समझ से दुनिया में भूमंडलीकरण का दौर तो दूसरे-विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ। पर धर्म युद्ध तो बहुत पुराना है। वेदों के युग से यही तो निरंतर चलता आया है। दस्यु तो यहाँ के थे, आर्यन बाहर से आए। धर्म युद्ध को अगर गौर से देखेंगे तो मेरे अनुमान से आप भी देख पायेंगे कि यह अर्थ-युद्ध है। क्या आज अमेरिका टैरिफ़ के माध्यम से अर्थ-युद्ध नहीं कर रहा?
खैर, जो सबसे बड़ी बात स्वामी विवेकानंद हमें बताते हैं, वो यह है कि धर्म का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ दर्शन होता है। और यहाँ हर धर्म आज भी एक है। हर धर्म के अपने अपने ग्रंथ है, चाहे कुरान हो, या बाइबिल, गीता हो, धम्मपद हो, या चाहे वह हो गुरु-ग्रंथ-साहिब। सारे-के-सारे एक धुन में जीवन-संगीत सुनाते हैं। हर किसी को दर्शन पढ़ाया जाना चाहिए। यहाँ तो हालत ऐसे हैं कि स्कूल में Moral Science को भी दूध-भात की तरह पेश किया जाता है। हर किताब, हर पन्ने में हमें ख़ुद को, ख़ुद की ज़रूरतों को पढ़ना हमें किसी ने सिखाया ही नहीं। समाज ने मान लिया है, कि उसे पैसे ने मतलब है, प्रेम जाए तेल लेने।
सबको “भगवान” की तलाश थी,
सब अपने-अपने सफ़र पर निकले।
कुछ को मिले,
वे ज्ञान बाँट रहे हैं।
कुछ को आभास हुआ,
वे शांति से अपना काम कर रहे हैं।
बाक़ी को भ्रम-मात्र है,
वे बस कर्मकांड निभा रहे हैं।
सत्य को छिपा कर,
सब अपना-अपना सच बता रहे हैं।
ख़ैर,
जो भी हो धर्म,
हर भक्त घमंड में चूर है,
अपने ही बच्चे से नहीं पूछता –
“बता मेरे बच्चे! तेरा धर्म क्या है?”
क्योंकि, कभी अपने ही बच्चे को,
नहीं बताया हर धर्म में, ख़ास क्या है?
क़िस्से और कहानियाँ ही तो हैं,
किसी ने पड़ोसी के क़िस्से,
भी अपने बच्चों को नहीं सुनाये।
सुना तो दो,
शिद्दत से वो कहानियाँ,
हर मज़हब जनाब,
एक हो जाएगा।
हमें ही अपने देश-अपनी दुनिया के बारे में जिम्मेदारी लेनी होगी। क्या होता है जिम्मेदारी लेना? अर्थ का आवंटन होती है जिम्मेदारी। अर्थशास्त्र की वैचारिक बुनियाद ही आभाव पर आधारित है। भारतीय ज्ञान-मीमांसा में अभाव को भी प्रमाण बताया गया है। अभाव के अनुमान को लगाने की जिम्मेदारी ही अर्थशास्त्र की होती है। छोटा हो या बड़ा, हर कोई अर्थशास्त्री है। हर घर एक पिता इस जिम्मेदारी का वहन करता है। हर रसोई हर माँ अपने बच्चों की जरूरत समझ उन्हें पोषित करने की जिम्मेदारी उठाती है। अर्थशास्त्री होने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी भी नहीं, यहाँ तो चायवाला भी प्रधानमंत्री बन जाता है। फिर पढ़ना-लिखना क्यों जरूरी है। ताकि हम बेहतर अनुमान लगा पायें। एक प्रज्ञावान अर्थशास्त्री एक बेहतर दुनिया बसा सकता है।
इसलिए हम सबको मिलकर शिक्षा के बारे में सोचना ही होगा। एक ऐसी शिक्षा, जो जानवरों को ऐसा इंसान बना सके, जिसे जानवरों से भी सहानुभूति हो। यहाँ तो जानवरों के नाम पर भी भ्रष्टाचार चल रहा है, और नारे लग रहे हैं कि धर्म ख़तरे में है। होगा ही। जहाँ जीवन ख़तरे में हो, वहाँ धर्म पर दुधारी तलवार तो लटकती ही रहेगी। सुना है भूखे पेट भजन नहीं होता। जजमान से बिना कुछ लिये कोई कर्म काण्ड कभी पूरा हुआ है भला?

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








[…] हर कोई शास्त्री […]
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