कोई कहता है धर्म खतरे में है। कोई संविधान को, कोई देश को खतरे में बताता है। सबसे बड़े खतरे में तो हम हैं। हमारा बस ध्यान भटकाया जा रहा है। एक छोटे वैचारिक प्रयोग में आपका साथ चाहूँगा। मान लीजिए एक छोटा सा गाँव है — आदर्शपुर। उसमें 1000 लोग रहते हैं। एक अनुमानित आयु अनुसार उसकी संरचना कुछ इस प्रकार होगी —
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65+: 60
आदर्शपुर की जनसंख्या के अनुसार उनका आर्थिक योगदान कुछ इस प्रकार होगा। 14 साल तक के बच्चे स्कूल जा रहे होंगे। 14 के बाद वे कॉलेज, या कुछ रोज़गार में अपनी भूमिका देना शुरू करेंगे। 25 से 44 तक की उम्र के लोग अर्थोपार्जन में अपनी मुख्य भूमिका निभा रहे होंगे। 45 से 64 के बीच अपने-अपने क्षेत्र में मिले अनुभव से ये लोग आने वाली पीढ़ी को बेहतर दिशा दे रही होगी। और 65 पार लोग अपनी कहानियाँ सुनाकर अपने परिवार को अपना अनुभव बता रहे होंगे।
आदर्शपुर की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अगर हम अनुमान लगायें तो, कुछ ऐसी तस्वीर हमारे सामने आएगी — आदर्शपुर के 170 लोग खेती और उससे जुड़े रोजगार में लगेंगे। शिक्षा और बच्चों की देख-भाल के लिए 136, स्वास्थ्य और समाज सेवा में 102, लगभग 80 इंजीनियर और कारीगर लगेंगे। मनोरंजन और कला, संस्कृति के क्षेत्र में 90 लोग अपना योगदान दे रहे होंगे, और बाक़ी के 102 लोग शासन-प्रशासन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट में कार्यरत होंगे। सबके पास रोजगार होगा। आपको क्या लगता है, अगर सबकी जरूरतें पूरी हो रही होंगी तो कोई धर्म, कोई संविधान, कोई देश खतरे में होगा?
मगर ऐसा हो नहीं पाता है, हमारे आदर्शपुर में किसानों की कोई कमी नहीं है, जहाँ 170 की जरूरत है, वहाँ 215 लगे हुए हैं। इसलिए उनकी डिमांड कम है, जिस कारण उन तक मुनाफ़ा नहीं पहुँच पा रहा। शिक्षा में जहाँ 136 शिक्षकों और प्रोफेसरों की जरूरत है, वहाँ 60 भी मुश्किल से पूरे हो पा रहे हैं। जिस कारण शिक्षा और महंगी होती जा रही है। स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्र में 102 लोगों का काम 45 लोग संभाल रहे हैं। काबिल इंजीनियर और कारीगरों की भी कंगाली है। मनोरंजन नया धंधा बन चुका है, आदर्शपुर के मुखिया युवाओं को बोलते हैं कि रील बनाना नया रोजगार है। जहाँ 102 लोग शासन-प्रशासन में चाहिए, वहाँ 42 लोग भी ढंग के नहीं मिल पा रहे। और बाक़ी 40-50 तो बेचारे बेरोजगार घूम रहे हैं।
आदर्शपुर के ये आंकड़े मौजूदा भारत की आर्थिक तस्वीर की एक छोटी सी झलक है। आपको क्या लगता है, आदर्शपुर की इस विपदा का क्या कारण हो सकता है?
मेरी समझ से आपने भी अनुमान लगा लिया होगा कि आदर्शपुर की समस्या क्या है। क्यों खेती-किसानी, मजदूरी करने की इतनी मारा-मारी है? क्यों डॉक्टर, इंजीनियर, और शासन-प्रशासन में लोगों की इतनी कंगाली है?
आदर्शपुर के लोगों ने मिलकर सोचना शुरू किया कि आख़िर इस आर्थिक आपदा का दोषी कौन है। पहले तो सब एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाते रहे। फिर किसी ने बोला कि देखो! सबसे ज़्यादा कमी डॉक्टरों, इंजीनियरों, शासन-प्रशासन में कुशल लोगों की है। क्यों? क्योंकि इन रोजगारों के लिए शिक्षित होने जरूरी होता है। अब सबका ध्यान शिक्षकों पर गया। शिक्षकों ने उँगली प्रशासन की तरफ़ उठाकर कहा — हम क्या करें, हम तो कब से किताब-कॉपी, डेस्क-बेंच माँग रहे हैं। एक ब्लैकबोर्ड नहीं है, पढ़ायें कैसे?
चलो! इतने मंथन से इतना तो पता चला कि शिक्षा ही वह समस्या है, जिसके कारण किसानों की जिंदगी बेहाल हुई पड़ी है।
दुनिया में सन् 1992 में वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ। लगता नहीं है, यह प्रक्रिया आज भी पूरी हो पायी है। निजीकरण का फैशन बड़ा लुभावना लग रहा था। सरकारें जल्दी-जल्दी अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर, लोकतंत्र को जनता के हाथ में सौंपने की तैयारी कर रही थी। भारत भी कैसे पीछे रहता? तब से लेकर आज तक में भारत की सरकारों ने लगभग हर क्षेत्र को निजी हाथों में सौंप दिया। अब सरकार को लगा कि अब तो बस सब जनता कर लेगी, चलो अब हम मंदिर वहीं बनाते हैं।
ऐसा नहीं है कि निजीकरण कोई बुरी व्यवस्था है। अब सरकार कार बनाकर किसका भला करेगी? शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि हमें और अच्छी कार मिल सके। हमें अच्छी कार कैसे मिलेगी? जब हमारे पास कुशल इंजीनियर होंगे। यहाँ तो जबरदस्ती लोग इंजीनियर बन रहे हैं। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था छात्रों को इस काबिल भी नहीं बना पा रही है कि वे बनना क्या चाहते हैं, इसका निर्णय भी ले सकें। कुकुरमुत्ते की तरह इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खुल गए हैं, जहाँ अब योग्यता की कोई जरूरत नहीं है। पैसे से डिग्री खरीदी जा सकती है। महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में मेरा दाखिला 2006 में मात्र 50,000 रुपये में हुआ था। फिर साल में लाखों की फीस और खर्चा। कितना महँगा है इंजीनियर बनना। आज तो बीस साल गुज़र चुके हैं, आज तो हालात और भी गंभीर हैं। मेरी छह साल की बेटी को अ, ब, ट पढ़ाने में लाखों खर्च हो जा रहे हैं। सरकारी स्कूल में अपने बच्चों को भेजना गुनाह लगता है। हालत देखी है?
ऐसी दशा में क्या हो सकता है?
एक ही दिन में निजी संस्थाओं को बंद तो किया नहीं जा सकता, ना ही एक दिन में उनका सरकारीकरण संभव है।
मेरे पास एक सुझाव है। हम एक आर्थिक इकाई का गठन करते हैं। मान लीजिए हम उसे नाम देते हैं — आदर्शपुर पब्लिक पालिका। अपना इनकम टैक्स हम केंद्र सरकार को छोड़कर इस इकाई को देना शुरू करते हैं। इस इकाई के पास अब बजट बनाने की क्षमता और पैसे दोनों होंगे। पब्लिक इस इकाई से स्कूल और हॉस्पिटल माँगेगी। जन-प्रतिनिधि आदर्शपुर नगर पालिका के साथ मिलकर सरकारी स्कूलों में हर जरूरी संसाधन की आपूर्ति करेगी। इस स्कूल में पढ़ रहे हर बच्चे का पिता इस संस्था का स्टेकहोल्डर होगा। क्योंकि टैक्स के माध्यम से उसने पहले ही इन जन-सुविधाओं का भुगतान कर दिया है, महीने-महीने या दाख़िले के लिए उसे पैसे नहीं देने होंगे। जनसंख्या के अनुसार आदर्शपुर पब्लिक पालिका के हर मुहल्ले में एक आदर्श स्कूल होगा। साथ ही होंगे प्राइवेट स्कूल भी। जिसे जहाँ चाहिए वहाँ अपने बच्चे का दाखिला करवा सकता है।
राज्य पालिका और भारत पालिका मिलकर उच्च शिक्षा के संस्थान की स्थापना हो सकती है। हर पालिका के पास एक विधायिका होगी, जहाँ चुने हुए प्रतिनिधि पहुंचेंगे। हमारे पास पहले से ही केंद्र, राज्य और पंचायत के प्रतिनिधि हैं। पब्लिक पालिका, जो लोकतंत्र का चौथा आर्थिक स्तंभ बन सकती है, उसमें सिर्फ़ राजनैतिक चुनाव से नहीं, बल्कि एक्सपर्ट्स, मज़दूर से लेकर छात्र संघ के नेता मिलकर बजट भी बना रहे होंगे और अपना ही भविष्य बेहतर बना रहे होंगे। हम, भारत के लोग एक बेहतर भारत बना रहे होंगे। आपको क्या लगता है? अपनी टिपण्णी ज़रूर बतायें।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)







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यह तो समाजवादी निज़ाम में ही मुमकिन हो सकता है. नवउदारवादी दौर में यह नागवार गुजरेगा
धन्यवाद