एक गाड़ी नोएडा की चकचौंध दुनिया से गुज़र रही है। अँधेरी रात, घना कोहरा। कुछ नजर नहीं आ रहा। हमारा हीरो अपनी गाड़ी चलाता रात के बारह बजे घर जा रहा है। उसकी इच्छा बस सही सलामत घर पहुँचने की है। एक मोड़ पर एक टूटी हुई दीवार है। दूर से कोहरे में वह दीवार अपने हीरो को दिखी नहीं, गाड़ी सीधा दीवार के पार नाले में गिर जाती है। नाला क्या गंदगी का तालाब बन चुकी थी यह जगह।
खबर आई है — दो घंटे तक वह मदद माँगता रहा। मदद आई भी। दनदनाते हुए पुलिस आई। अपनी रस्सी लिए फायर ब्रिगेड भी पधारी। एनडीआरएफ की टीम भी अपनी नाव लिए पहुँची। अब पुलिस इतनी ठंडी में नाले में कूद तो नहीं सकती। फायर-ब्रिगेड की रस्सी छोटी पड़ गई। एनडीआरएफ के पहलवान किनारे पर ही तैरते दिखे। तब एक क्रेन भी बुलायी गई, उस पर चढ़कर रस्सी पहुँचाने की भी कोशिश हुई। सब बेकार।
इधर गृहमंत्री और प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार कर रहे हैं। जब से इनकी सरकार आई, ये प्रचार करते ही पाये गए हैं। जैसे इनके चुनाव जीत जाने से दुनिया बदल जाएगी। दुनिया तो बदल ही रही है। बनारस में प्राचीन मणिकर्णिका की मणि पर बुलडोज़र चल गया, अहिल्या बाई की मूर्ति भी तोड़ दी गई। जो सरकार जिस धर्म को खतरे में बता रही है। उसी पर हमला भी कर रही है। इस सरकार ने इतने नाम बदले, पीएमओ “सेवा तीर्थ” हो गया। इन लोगों को अपने-अपने पद का नाम बदलकर चुनावमंत्री और प्रचारमंत्री रख लेना चाहिए।
निजीकरण कर देने से इन्हें लगा कि सब जनता कर लेगी, हम बैठकर मेवा खाएँगे। रेल से लेकर सेल, तेल से लेकर तीर्थ सब निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। सेवा की कोई भावना थोड़ी भी होती तो देश का युवराज यूँ नाले में डूबकर मर नहीं मारा जाता, अपने पिता की आँखों के सामने। निजीकरण का अर्थ होता है, वैसी संस्था जो मुनाफा कमाये। मुनाफा कमाना क्यों जरूरी है? ताकि वह संस्था अपनी विधा में और रिसर्च का डेवलपमेंट कर पाये। तभी तो नए उत्पाद बाजार में आ पाएंगे। पर हर काम पैसे के लिए नहीं हो सकता — जैसे प्यार, परिवार, हवा, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा। इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं।
शिक्षा, क्या इसमें रिसर्च एंड डेवलपमेंट की जरूरत है। हाँ है। क्या यह निजी हाथों में सुरक्षित है? आइए देखते हैं! शिक्षा की पहली ज़िम्मेदारी है कि छात्र पहले विद्यार्थी बन सकें। जो बुनियादी शिक्षा है, उस तक पहुँच सके। हालत ऐसे हैं कि पाँचवी का बच्चा नर्सरी की कविता नहीं पढ़ पा रहा। पीएचडी धारी को पता नहीं होता उनकी ही थीसिस में लिखा क्या है? कौन-सा उन्होंने ख़ुद लिखा है। जब मैं दर्शनशास्त्र की पढ़ाई कर रहा था, मेरे पास पचास हज़ार में एक शोध लिखने का प्रस्ताव आया। मेरे ही एक प्रोफेसर ने यह सौदा मेरे सामने रखा था। मैंने कहा मैं पैसे भी नहीं लूँगा, और शोध भी नहीं लिखूँगा। पर, मैं आपके शोधार्थी की हर संभव मदद करने को तैयार हूँ। मैं उसे अपना समय दे सकता हूँ।
मैंने उस छात्र से बात की। उसका विषय एक फ्रेंच दार्शनिक पर था। उनकी कई किताबें अंग्रेजी में उपलब्ध भी हैं। पर अफ़सोस हमारे रिसर्चर को अंग्रेजी भी नहीं आती, फ्रेंच सीखना तो उसके लिए बस एक ख़याली पुलाव होगा। उनसे बात कर लगा उन्हें तो हिंदी भी ठीक से नहीं आती। उन्होंने अपना शोध किसी और से लिखवा लिया होगा। उन्हें प्रोफ़ेसर बनना था, इसलिए जल्दी से बस डिग्री चाहिए था। उसी विश्वविद्यालय से मेरी पत्नी भी अपना शोध कर रही थी। उसका शोध, थीसिस प्रिंट भी हुआ। पर वह डिग्री लेने ही नहीं गई। उसने देखा था, अपनी सहपाठियों को प्रोफेसरों के घर में नंबर के लिया झाड़ू-पोछा लगाते। हमने फ़ैसला लिया हम मिलकर अपनी बात कहेंगे।
अगर शिक्षा का निजीकरण इसी रफ़्तार से चलता रहा तो डिग्री सब के पास होगी, पर पढ़ा-लिखा, शिक्षित-दीक्षित कोई नहीं होगा।
सोचिए! जब इतना आसान होगा प्रोफेसर बनना, तो क्या उनके बच्चे जो पढ़ा रहे हैं, शिक्षित हो पाएंगे? नहीं हो पा रहे हैं तभी तो भगदड़ में, ट्रेन से गिरकर, प्लेन में उड़कर, सड़क चलते, हॉस्पिटलों में, स्कूलों में, यहाँ तक कि रसोई में गैस फट जाने से हम, भारत के लोग ही मर रहे हैं। जो बचे हैं, अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं।
सार्वजनिक शिक्षा का आधार मज़बूत करना ही पड़ेगा। यह काम निजी क्षेत्र नहीं कर सकता। जनहित में शिक्षा वह नहीं पहुँचा सकती। क्यों?
इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, यह कि निजी संस्थाएं व्यापार को सर्वोपरि रखती है। और व्यापार की बुनियाद मुद्रा में आधारित है। अक्सर वे अर्थ कमाना भूल जाते हैं। भ्रम में जीने लगते हैं। कई उदाहरण आपको मिल जाएँगे। नोकिया को ही देख लीजिए, वह समय और स्थान के साथ अर्थ का उत्पादन करना भूल गया। बाजार भी उसे भूल गया। हम, भारत के लोग आज अर्थ से ज़्यादा मुद्रा को समाधान मान बैठे हैं। आज हमारा IT Sector बड़े खतरे में है। मैं जब २०१० में इस क्षेत्र में काम शुरू किया था, तभी मैं समझ गया था कि यहाँ विकास की गुंजाइश कम है। इसलिए २०१२ में ही मैं एक कविता लिख आया — सॉफ्टवेयर इंजीनियर का इस्तीफा
एक ऑफिस का फ्लोर, फ्लोर पर कंप्यूटर,
कई लोग उसके सामने बैठे हैं,
कोशिश है चल जाए,
अपनी-अपनी गृहस्थी का कैलकुलेटर।
बैठे हैं सब काम कर रहे हैं,
बैठा हूँ मैं भी,
देखता हूँ मशीन,
और मशीनों के इशारे पर नाचता इंसान।
अरसे से सुबह की धूप नहीं देखी,
ओस से भीगी घास पर दौड़ा नहीं,
दिन गुजर गए जब रात साफ खामोश हो,
और खुले आसमान में चांद और बादल की शरारत नहीं देखी।
नेचर के नज़ारे अब वॉलपेपर बन गए हैं,
एक छोटे से डब्बे में दुनिया सिमट गई है,
दोस्ती और रिश्ते भी अब वर्चुअल बन गए हैं,
फेसबुक, ट्विटर, इंस्टा पर जवानी से बचपन फँस गई है।
लोग कहते हैं, गप मारना औरतों का काम है,
मशीनें आज ये काम भी उनसे बेहतर कर रही हैं,
कहते हैं उनके पेट में बातें नहीं पचती,
मशीनों का हाजमा भी कुछ बेहतर नहीं है।
इस मशीनी दुनिया को देख कर,
एक बार तो रोया होगा खुदा भी,
चिल्लाया होगा – जी ले, जो दो पल दिए हैं,
और जवाब आया होगा –
“इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं”।।
युवराज की तो लाइन मिल भी गई, फिर भी बेचारे को भगवान बचा नहीं पाये। इसका कारण अशिक्षा नहीं तो और क्या है? क्या हो जाएगा अगर शिक्षकों की नियुक्ति पड़ोस के विद्यालय में हो, लोग अपने बच्चों को पास के स्कूल में भेजें, और पब्लिक पालिका इन्हें मुद्रा प्रदान करे। हमारे टैक्स का पैसा पहले स्थानीय विकास पर खर्च हो फिर ऊपर राज्य और केंद्र सरकार तक पहुँचे। केंद्र के पास तो आयकर विभाग से लेकर ED, CBI भी है। कोई गड़बड़ हो, तुरंत कार्रवाई हो। पब्लिक पालिका इसी सपने को पूरा करने का एक प्लान है। अब डिस्क्रिप्शन में दिए लिंक पर क्लिक कर इसके मैनिफेस्टो को पढ़ भी सकते हैं।
https://publicpalika.in/node/16

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








[…] युवराज डूब गया […]
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