चुनाव के दौर में नारा लगाया जाता था – ‘बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है‘ और ‘25 से 30, फिर से नीतीश।’ नारे लगे, बम्पर वोट आया। शपथग्रहण भी हुआ, लेकिन साल 26 अभी पूरे भी नहीं हुए और नीतीश कुमार ‘अज्ञातवास’ में चल पड़े। वे खुद गये या ले जाया गया, पता नहीं, लेकिन जिस तरह से घेराबंदी हुई, वह सम्मानजनक नहीं लगता। नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए नामांकन पत्र भर रहे हैं और उनके इर्द-गिर्द बीजेपी के नेता हैं, जदयू के नेता नहीं हैं। जदयू के अध्यक्ष संजय झा भी नजर नहीं आ रहे, न केंद्रीय मंत्री ललन सिंह। गाँव-घर में के ‘पकड़ौआ विवाह’ का नजारा था। दुल्हा चाहे या न चाहे, उसे विवाह करना है, वरना गोली चलेगी या थप्पड़ लगेगा। दुल्हा छटपटा कर रह जाता है और घरवालों के पास कोई उपाय बचता नहीं है, इसलिए वर-वधू को आशीर्वाद देने चले आते हैं। मगध का तथाकथित चाणक्य मर रहा था और गुजरात का चाणक्य मुस्कुरा रहा था।
सत्ता की गद्दी के लिए जो हलचल सामने दिखती है, उससे ज्यादा हलचल पर्दे के पीछे होता है। पर्दे के पीछे की हलचल बताती है कि सबकुछ ठीक नहीं है। चाणक्य के सामने चुनौती क्या थी? उसे सत्ता से कोई समस्या नहीं थी, न वह बहुत ईमानदार था। इसलिए चाणक्य नीति कहते हैं तो उससे धूर्तता का अहसास होता है। चाणक्य के सामने चुनौती थी शूद्र राजा नंद। जयशंकर प्रसाद ने एक नाटक लिखा – ‘चंद्रगुप्त‘। उस नाटक में मगध के राजा नंद और चाणक्य से बहस हुई है। उसमें चाणक्य कहता है – ‘नियति-सुंदरी के भवों में बल पड़ने लगा है। समय आ गया है कि शूद्र राजसिंहासन से हटाये जायें और सच्चे क्षत्रिय मूर्धाभिषिक्त हों।’ शूद्र राजा नंद को अपदस्थ करने के लिए चाणक्य प्रण लेता है और अपनी शिखा खुली रखता है और कहता है – ‘यह शिखा नंदकुल की काल-सर्पिणी है , वह तब तक न बन्धन में होगी, जब तक नंदकुल नि:शेष न होगा।’
चाणक्य बार-बार अपने ब्राह्मणत्व की दुहाई देता है और अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करता है। वह नंद से इसलिए परेशान नहीं है कि वह अत्याचारी है, उसकी परेशानी नंद की शूद्रता है। जैसे सावरकर ने खुद को वीर घोषित कर लिया, उसी तरह से चाणक्य ने। वीर सावरकर हो या चाणक्य – दोनों ने एक ही तरह की लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई आज भी लड़ी जा रही है। चंद्रगुप्त चाणक्य के मोहरे थे और आज मोहन भागवत के नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू मोहरे हैं। मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह को चाणक्य कहा जाता है, जबकि वह चाणक्य की तरह तीक्ष्ण भी नहीं था, न तक्षशिला में पढ़ा-लिखा है। उसकी चालाकी सिर्फ इतनी है कि वह पूँजीपतियों को साधता है और लोभियों के सामने हड्डी के ‘टुकड़े’ फेंकता है। उस हड्डी के टुकड़े को चाभ-चाभ कर टुक्कड़खोर
राजनेता के मुँह और जीभ में खून-ही-खून हैं। नीतीश कुमार का पकड़ौआ विवाह हो चुका है। उनकी अंतिम आकांक्षा थी कि वे सभी विधान मंडलों के सदस्य बन जायें। विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा के सदस्य हो चुके थे, राज्य सभा बाकी थी, वे उसके भी सदस्य हो गये। अगर यह आकांक्षा है तो कितनी छोटी आकांक्षा है! क्या उनके जीवन की यही आकांक्षा रही कि वे सभी विधान मंडलों के सदस्य हो जायें! बिहार उनके बारे में क्या सोचता रहा है और वे क्या निकले?
दरअसल वे लड़ाका कभी नहीं रहे। चतुर थे। हेराफेरी करना जानते थे। राजनीति को अपने तरीके से फेरा। उसका कुल परिणाम यही होना था, जो हुआ। चार महीने पूर्व भी मैंने लिखा था कि नीतीश कुमार के लिए बढ़िया है कि वे अब सम्मानपूर्वक विदा हो जायें, मगर लिप्सा कम खतरनाक नहीं होती। अंततः उनका कारुणिक अवसान हुआ- मुँह लिपलिपाते और पेट पर हाथ फेरते। परिवारवाद का बहुत रट्टा मारते थे, लगता है मरते वक्त परिवारवाद भी सिर पर चढ़ कर बोलेगा।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







