संविधान को मुख्यमंत्री न माने तो क्या करना चाहिए? उस मुख्यमंत्री को गौरवान्वित करना चाहिए या सजा देनी चाहिए। शांतिप्रिय सोनम वांगचुक को जेल में बंद कर दिया गया है और सरेआम जो संविधान की खिल्ली उड़ा रहा है, उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा कर गौरवान्वित किया जा रहा है। संविधान का आर्टिकल 14 कहता है कि धर्म के आधार पर किसी नागरिक के साथ कोई विभेद नहीं किया जायेगा और असम का मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा का सार्वजनिक बयान है – ‘रिक्शेवाला मियाँ हो तो वह भाड़ा पाँच रुपए माँगे तो चार रुपए दो। उसे सताने और तंग करने में बहुत मजा आता है।’ बीजेपी के बड़े बड़े नेता अपने घर में ‘मियां’ को दामाद बना रखा है और छुटभैय्ये और चिरकुट नेता संविधान का सरेआम बखिया उधेड़ रहे हैं।
जिस मुख्यमंत्री को संविधान से प्यार नहीं है, उसे सम्मान नहीं देता, उस मुख्यमंत्री को कुर्सी पर क्यों रहना चाहिए? राष्ट्रपति उसे बर्खास्त क्यों नहीं करतीं और प्रधानमंत्री उसे सजा क्यों नहीं देते? कोर्ट संज्ञान क्यों नहीं लेता? संविधान का सरंक्षक तो सुप्रीम कोर्ट होता है। वह ऐसे संविधान विरोधी बयान पर संज्ञान क्यों नहीं लेता? क्या विधायिका और न्यायपालिका मर चुकी है? जिन लोगों को ऐसे बयान सुखद लगते हैं, वे जान लें कि अगर यह घृणित आदतें ख़त्म नहीं हुई तो उनकी भी बारी आयेगी। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की राजनीति के शिकार और गंदी सोच के शिकार होना नियति हो जायेगी। आज संप्रदाय के नाम पर यह खेल जारी है, कल जाति के नाम पर होगा।
सुनते हैं कि महामानव का नाम एपस्टीन फाइल में आया है। इससे भी शर्म की बात है कि राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के लिए उन्होंने इजरायल में ठुमके लगाए। मुझे सहज विश्वास नहीं होता। भारत के प्रधानमंत्री ऐसे भी कर सकते हैं? लेकिन एपस्टीन जो नाबालिग बच्चियों का धंधा करता है, वह दावा कर रहा है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे बयान दें। एपस्टीन ग़लत कह रहा है तो उसका खंडन करें। ट्रंप के इशारे पर प्रधानमंत्री नाचें, यह सुन या पढ़ कर अच्छा नहीं लग रहा। वे जैसे भी हैं, भारत के प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री पर ऐसे आरोप करोड़ों-करोड़ नागरिकों का अपमान है। प्रधानमंत्री को आगे आकर एपस्टीन के बयान को निराधार साबित करना चाहिए। मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा का तो वे कुछ करेंगे नहीं, क्योंकि वे भी उसी राह के राही हैं। वे भी कपड़ों से बहुतों को पहचान लेते हैं और उलजलूल बयान देते रहते हैं। हेमंत बिस्वा कोई एक दिन की पैदाइश नहीं है। उसे पालने पोसने में ऊपरवाले का भी हाथ है। पूरी पार्टी में एक रोग लग गया है और इस रोग का विषाणु संविधान को ग्रस रहा है। संविधान नागरिकों को सुरक्षा देता है और नेता अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए संविधान की भावनाओं को आहत करता है।
2026 का एक माह पूरा हो गया। दिन यों ही बीतेंगे और रात भी।
पूरी दुनिया को एक और अन्य विषाणु से खतरा है और वह खतरा है एलन मस्क जैसे पूँजीपति से जिसका दावा है कि आदमी को अब काम करने की कोई जरूरत नहीं है। आदमी का सभी काम रोबोट करेंगे। आदमी बिना हाथ पैर डुलाए, खाये और सोये और मौज करें। यानी आदमी महज मांस का लोथड़ा रहेगा। उसे न सोचना है, न कोई चिंता फिक्र करनी है। दुनिया की संस्कृति का विकास श्रम से हुआ है। श्रम विहीन मानव क्या सचमुच मानव रहेगा? क्या यह दुनिया दुनिया रहेगी? जब सारा काम रोबोट करेगा तो यह दुनिया तो रोबोट की होगी। क्या आने वाले समय में रोबोट मानव को विस्थापित करने वाला है?

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





