कभी जिन्हें बीजेपी के छुटभैय्ये प्रवक्ता से लेकर उसके नेता तक ‘पप्पू’ कहकर दुष्प्रचार करते थे, अब उन्हें ‘राउडी-राउडी’ पुकार रहे हैं। संसद में उन्हें देखकर ही बीजेपी के नेता असहज हो जाते हैं। प्रधानमंत्री आँखें झपकाते हैं। गृहमंत्री यदा-कदा चीखने लगते हैं और संसदीय मंत्री को तो जैसे मिर्गी ही लग जाती है। एक सांसद को तो लगता है कि मैनिया ही हो गया है। उनका अपना कोई चरित्र नहीं है, इसलिए दुनिया में सभी चरित्रहीन ही नजर आते हैं। संसद का दुर्भाग्य है कि मंत्री तक फेक एआई द्वारा बनाई गई तस्वीर के माध्यम से दूसरे का चरित्रहनन करने पर उतारू हैं। बीजेपी के पू्र्व अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री एल ओ पी को अबोध बालक कह कर पुकारते हैं। जिन लोगों के पाँव, देह और मुंडी कीचड़ में सने हों, वे दूसरे पर कीचड़ फेंक रहे हैं।
लेकिन यह सवाल मौजू है कि बीजेपी ने जिसे ‘पप्पू’ कह कर नीचा दिखाना चाहा, वह ‘राउडी’ कैसे हो गया? एक ऐसा बालक जिसने अपनी दादी और पिता की लाश देखी हो, राजनीति में पदार्पण भी अनमने ढंग से किया हो, पद पर जाने की कोई आकांक्षा नहीं हो, मुलायम-मुलायम -सा दिखता हो, वह इतना गरजने कैसे लगा, अपनी बात कहने का सलीका कैसे ढूँढ लिया और कैसे राजनीतिक पैंतरेबाजी में दक्ष होने लगा? क्या मार-मार कर हकीम बनाया जा सकता है? बीजेपी ने इतना नोंचा-खसोटा, लोकतंत्र की जैसी-तैसी की, बार-बार निशाना ठोकता रहा कि सीधा बैल मरखंडा हो गया। अब मरखंडा बैल जहाँ-तहाँ सिर डाल रहा है। घरबैया परेशान है कि इसका क्या किया जाए?
सत्ता में हो तो जरा संभल कर रहो। जिह्वा पर कंट्रोल रखो। वरना, रहीम कवि को याद करो। उन्होंने कहा है –”रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।” बीजेपी के नेता दुर्मुख बने बैठे हैं। उन्होंने सोचा था कि ऐसे ही सबकुछ चलता रहेगा। ऐंठ तो जैसे जन्म से ही प्राप्त कर लिया है। गली के गुंडों से भी गयी-बीती भाषा है। इसके बूते कितने दिनों तक गाड़ी खींच पाओगे? ट्रंप परीक्षा ले रहा है। हाँके फिरता था कि अमेरिकी भारत की वीजा के लिए लाइन लगाये रहेगा और अमेरिका ने अवैध ढंग से प्रवेश करने वाले भारतीयों को हाथ-पैर में जंजीर लगा कर भेज दिया। अवैध ढंग से प्रवेश किए भारतीय को तो छोड़िए, प्रधानमंत्री अमेरिका के राष्ट्रपति के सामने कोंकिया रहे हैं। ‘माई डियर फ्रेंड’ हर दिन बेइज्जत करने वाला एक बयान जारी कर देता है और महामानव मुँह छिपाए मारे-मारे फिर रहे हैं। भारत की नीतियों का खुलासा अमेरिका करता है और महामानव के मुँह पर ताला लगा है। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्रियों को कोसने की आदत है और अब इस आदत पर भी लगाम लग रही है।
संसद से तथाकथित चंद्रगुप्त और चाणक्य दोनों गायब रहते हैं। अरे, आपको भारतीय जनता ने मुँह छिपाने के लिए नहीं भेजा है। संसद में जाना आपकी प्राथमिक ड्यूटी है। आप अपनी ड्यूटी भी नहीं कर रहे। उधर एल ओ पी संभल नहीं रहे। संसद से निकालने के लिए एक लखेड़े सांसद ने आवेदन दिया है। उन्हें निकालने की भूल मत करना, वरना तुम्हारी झोपड़िया धूं-धूं कर जल उठेगी। अब वह पुराने वाला सेनापति नहीं है। इस बार जिरह बख्तर सख्त है। एक बार निकालने की भूल को याद करो। सौ तक उसे तुमने पहुँचाया। इस बार भिड़े कि तुम्हारी दुनिया खाक बन जायेगी। लगता ऐसा है कि बूढ़ा बंदर गुलाटी तो कर सकता है, लेकिन हो जाता है बेकाम। जो कहना था, कह चुके, देश को जितना तबाह करना था, कर चुके, असत्य का वृक्ष जितना उगाना था, उगा चुके। अब अपने को भी माफ करें और देश को भी। वरना ‘राउडी’ किल्ला-खूंट्टा उखाड़ ही देगा।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






