अगर लोकतंत्र के प्रति आस्था न हो, तो लोकतांत्रिक ढंग से चुन कर आने के बाद या तत्कालीन राजनैतिक शख्सियत से समझौता कर भी आप लोकतंत्र का हत्यारा हो सकते हैं। लोकतंत्र को खत्म करने के लिए कोई जरूरी नहीं है कि राजधानी की गलियों में टैंक उतरवाये जायें या गोलियों से लोगों के कलेजे को छलनी किया जाय। दुनिया के कई देशों में ऐसी घटना घट चुकी है। उदाहरण के लिए जर्मनी, ब्राजील, पेरू, वेनेजुएला आदि को ले सकते हैं। जर्मनी के एडोल्फ हिटलर चुन कर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे थे, लेकिन जर्मनी के लोकतंत्र को तहस-नहस कर दिया। उसी तरह ब्राजील के जेतूलियो वर्गास, पेरू के अलबर्तो फुजिमोरी और वेनेजुएला के हुगो चावेज ने किया। इतिहास हमें सीखने का अवसर देता है, लेकिन सत्ता का लोभ हमें सीखने नहीं देता।
आपको याद होगा, जब 2020 में डोनाल्ड ट्रंप जो बाइडन से हार गए, तब भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे थे। अब जब जीत कर आये हैं तो दूसरे देश के राष्ट्रपति को उठवा रहे हैं। यह व्यवहार किसी भी तरह से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। दरअसल ट्रंप की राजनैतिक ट्रेनिंग नहीं हुई है। वे मशहूर व्यापारी रहे हैं। अकूत धन उनके पास है। लोकतांत्रिक प्रैक्टिस की उन्हें आदत नहीं है।कहा जाता है कि पूँजी की कोख से लोकतंत्र का जन्म हुआ है, लेकिन लोकतंत्र ही एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें आम लोगों की राय भी ली जाती है। संभव है कि लोकतंत्र से अलग जो तंत्र है, उसमें जनता को खाने के लिए रोटी मिल जाये, लेकिन उसकी राय का कोई मतलब न रहे।
मेरे गुरु रहे प्रो राधाकृष्ण सहाय पाँच वर्षों तक जर्मनी के हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। उन्होंने जर्मनी पर एक संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी – ‘फिर मिलेंगे।’ यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक में एक घटना का जिक्र है। प्रो राधाकृष्ण सहाय को जर्मनी पहुँचे कुछ ही दिन हुए थे कि एक रात एक युवक आया। युवक ने आते ही पूछा कि आपके पास बुद्ध की कोई किताब है? युवक डर-डर कर पूछ रहा था। उन दिनों पूर्वी जर्मनी पर साम्यवादी शासन था। शासन के खिलाफ बोलने और सुनने की सख्त मनाही थी। पति-पत्नी भी संभल कर बात करते थे कि उसकी कोई बात अन्य लोग न सुन ले। दीवारों से भी भय लगता था, क्योंकि दीवारों के भी कान खड़े रहते थे। जर्मनी में भूख से कोई नहीं मर रहा था, लेकिन दिमाग और हृदय पर शासन का शिकंजा था। युवक की चाहत थी बुद्ध की महाकरूणा की, लेकिन देश में शासन की निष्ठुरता थी।
संसद में क्या हुआ? प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने तीन-तीन बार एक बात कहनी चाही। सरकार और संसद के अध्यक्ष उन्हें बोलने से रोकते रहे। नहीं बोलने देने के पीछे का कारण था कि राहुल गांधी एक अप्रकाशित किताब का हवाला दे रहे थे। वैसे उसके कुछ अंश कारवाँ पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। वह पब्लिक डोमेन में है। यह पुस्तक पूर्व थल सेनाध्यक्ष नरवणे द्वारा लिखी गई है। साढ़े चार सौ पृष्ठों की है और उनके संस्मरण हैं। दो साल से यह पुस्तक रक्षा मंत्रालय के पास इस इंतजार में रखी है कि वह इसे प्रकाशित करने की इजाजत देगा। रक्षा मंत्रालय छपने के संदर्भ में न हाँ कह रहा है, न ना। रक्षा मंत्रालय राजनाथ सिंह के पास है। इस किताब में पू्र्व जल सेनाध्यक्ष ने रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में असुविधाजनक बातें कहीं हैं। दो-तीन सवाल उठते हैं। पहला- दो साल से रक्षा मंत्रालय किताब पर अपनी सम्मति क्यों नहीं दे रहा? वह हाँ करे या ना करे। दूसरे, जब किताब के कुछ अंश कारवाँ पत्रिका में प्रकाशित है तो उस अंश को संसद में पढ़ने क्यों नहीं दिया जा रहा? अगर राहुल गांधी उसे पढ़ना चाहते थे और सत्ता पक्ष को यह अच्छा नहीं लग रहा था तो बाद में संसद में बैठे प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और अन्य सांसद उसका विरोध कर सकते हैं। लोकतंत्र तो संवाद के लिए है। संसद में अगर बहस नहीं होगी तो कहाँ होगी?
क्या लोकतंत्र और संसदीय राजनीति के लिए यह सही है कि प्रतिपक्ष के नेता को बोलने से रोका जाए और उसमें अध्यक्ष, रक्षा मंत्री, गृहमंत्री, संसदीय मंत्री और सत्ता के सांसदों का हाथ हो?

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





