जिसे नये शगूफे गढ़ने की आदत होती है, वह अचानक ऐसे शगूफे गढ़ लेता है कि उसके समर्थक भी चिंताग्रस्त हो जाते हैं। इजरायल को ‘फादरलैंड’ कहना और भारत को ‘मदरलैंड’ कहना ऐसे ही बेवकूफी पूर्ण शगूफे हैं। ऐसे कथन का औचित्य क्या है? इससे भारत की विदेश नीति में कहाँ चार चाँद लग जाते हैं, सिवा शर्मसार होने के? विश्व के किसी देश की धरती अच्छी-बुरी नहीं होती, बल्कि वहाँ के वाशिंदे अच्छे-बुरे होते हैं।
इजरायल के सर्वेसर्वा बैंजामिन न्येतन्याहू कहीं से भी अच्छे नहीं लगते। वे विश्व-मानवता पर बदनुमा दाग हैं, जिसने गाजा के मूल लाखों वाशिंदों की हत्या की। जिसने उसे शरण दी, उसे ही खदेड़ा, मारा और मौत के घाट उतारा। यह जमीन फिलिस्तिनियों की थी। द्वितीय विश्व युद्ध में यूरोप में यहूदियों का नरसंहार हुआ था। इस कारण यहूदियों को लगा कि उसके पास एक अलग देश होना चाहिए। वह अलग देश बना फिलिस्तीन की जमीन पर और ये यहूदी वहीं काम करने लगे जो उनके साथ द्वितीय विश्व युद्ध में हुआ था। जबकि द्वितीय विश्व युद्ध में फिलिस्तिनियों की कोई भूमिका नहीं थी। भारत पहले फिलिस्तीन के पक्ष में था। फिलिस्तीन के लोकप्रिय नेता यासिर अराफात भारत आते रहते थे और उनसे भारत के गहरे संबंध थे। उन्हें शांति नोबेल पुरस्कार भी मिला था। इजरायल के नेता धूर्त और हिंसक हैं। उनके सहयोग से ही भारत में पेगेसस आया और लोगों की जासूसी की गई।
सैंया को सिर्फ कोतवाल होना चाहिए, फिर तो लाठी-डंडे, इस्तौल-पिस्तौल – सब अपने। संविधान और कानून डंडों और झंडों पर चलते हैं। नैतिकता तो उनसे कोसों दूर रहती है। न्येतन्याहू, ट्रंप जैसे नेता जिस पर चल रहे हैं कि कभी भी ज्वालामुखी फट सकती है। ट्रंप वैश्विक कोतवाल बने हैं। वैश्विक राजनीति में रूस हो या जर्मनी या इंग्लैंड या भारत की कोई दखल नहीं है। ये सिर्फ हरि बोल कर रहे हैं। अमेरिका का प्रभुत्व दुनिया को तबाह कर सकता है। कहने को वह लोकतांत्रिक देश है, लेकिन ट्रंप में लोकतांत्रिक व्यवहार की घोर कमी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की हालत पतली हो गई और वह वैश्विक सत्ता का केंद्र नहीं रहा। इसके बाद लंबे समय तक रूस और अमेरिका में शीत युद्ध चलता रहा।
मिखाइल गोर्बाचोव 1990 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने और उन्होंने ग्लास्नोस्त (खुलेपन की नीति) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन की नीति) अपनायी। नतीजा हुआ कि सोवियत संघ पाँच देशों में विभक्त हुआ। आज भी विभक्त हुए दो देश- रूस और यूक्रेन आपस में वर्षों से युद्ध कर रहे हैं। गोर्बाचोव ने अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन के साथ शीत युद्ध को खत्म करने के लिए शिखर वार्ता की और उन्हें शांति नोबेल पुरस्कार भी दिया गया। सोवियत संघ के बिखराव के बाद वैश्विक ताकत अमेरिका के पास आ गयी और अब वह कोतवाल की तरह डंडे लिए खड़ा है। चीन ने भी शक्ति हासिल करने की कोशिश की है और उसके साम्राज्यवादी मन से भी लोग आशंकित रहते हैं। ग़लत नीतियों और कमजोर नेता के कारण भारत की कोई अपनी विदेश नीति नहीं है। वह अपना फैसला खुद नहीं ले पा रहा। देश के अंदर प्रधानमंत्री की बहुप्रचारित बाहुबली-छवि तार तार हो गई है, तब भी शगूफे गढ़ने की आदत गयी नहीं है।
किसी की धरती को पिता और किसी की धरती को माँ कहने में कौन सी बुद्धिमानी है? विदेश नीति इससे कहाँ मजबूत हो जाती है? नेहरू जी को तो कम से विश्व सुनता था, लेकिन हम अपने इतिहास से कुछ नहीं सीखते। सिर्फ उसकी अवहेलना और तथ्यहीन आलोचना करते रहते हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







