शिक्षा के माध्यम के रूप में भाषा के मुद्दे पर दुनिया भर में काफी शोध हुआ है। यह शोध प्राप्त करना बहुत आसान है (जैसे मक्कड़-जाल के माध्यम से)। इन सभी शोधों और सफल देशों के व्यवहार ने साबित कर दिया है कि शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा का कोई सफल विकल्प नहीं है। मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने पर यूनेस्को लगातार ज़ोर देता रहा है। अब विश्व बैंक ने भी इस संबंध में अपना पहला ‘नीति सोच पत्र’ जारी किया है। इस पत्र का शीर्षक है ‘दिन की तरह सफेद: सीखने की भाषा की प्रभावी नीतियाँ। यह 100 पेज का पत्र https://www.worldbank.org/en/topic/education/publication/loud-and-clear-efffective-language-of-instruction-policies-for-learning पर उपलब्ध है।
पत्र की शुरुआत में पाँच पन्नों का कार्यकारी सारांश दिया गया है। विश्व बैंक ने 14 जुलाई, 2021 को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। निम्नलिखित पाठ इस प्रेस वक्तव्य का हिंदी अनुवाद है-
“बच्चों की सीखने की अक्षमता को समाप्त करने के लिए घर पर बोली जाने वाली भाषा में पढ़ाना महत्वपूर्ण है।
वाशिंगटन, जुलाई 14, 2021 – यदि बच्चों को उस भाषा में पढ़ाया जाता है, जो वे बोलते और समझते हैं, तो वे अधिक सीखेंगे और उनके स्कूल में रहने की अधिक संभावना होगी। फिर भी, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 37% बच्चों को दूसरी भाषा में पढ़ाया जाता है, जिससे उन्हें स्कूल काल के दौरान हर समय नुकसान होता है और उनकी सीखने की क्षमता सीमित हो जाती है। विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के अनुसार, सीखने की असमर्थता को कम करने और दूसरे शिक्षण परिणामों, एकसमानता, और सर्व-साझेदारी में सुधार के लिए, शिक्षा के माध्यम का स्थान केन्द्री है।
शिक्षण प्रक्रिया भाषा के माध्यम से पूरी की जाती है – बोली जाने वाली और लिखित – और बच्चों को पढ़ना और लिखना आना दूसरे अकादमिक विषय सीखने के लिए नींव का काम करता है। ‘ऊँची और दिन की तरह सफेद’ रिपोर्ट इसे सरलता से कहती है: अधिकांश बच्चों को एक विदेशी भाषा में पढ़ाया जाता है, जो कि इस बात के लिए सब से अधिक महत्वपूर्ण कारणों में से एक है कि बहुत देशों में सीखने का स्तर इतना ख़राब क्यों है।
जिन बच्चों पर इन नीतियों और बदलों का सब से अधिक असर होता है वे और पक्षों से भी वंचित होते हैं – वे समाज-आर्थिक पैमाने के निचले 40 प्रतिशत से होते हैं और दूर-दराज क्षेत्रों से होते हैं। उनके सीखने पर परिणामविहीन भाषा नीतियों के होने वाले प्रभाव से बचने के लिए उनके पास पारिवारिक स्रोत भी नहीं होते। इसका नतीजा स्कूल छोड़ने की ऊँची दर, एक श्रेणी में कई साल, सीखने की ऊँची बुरी दर, और समग्र रूप से कम सीखने में निकलता है।
विश्व बैंक फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट की अध्यक्ष ममता मूर्ति के अनुसार, “सीखने पर कोविड-19 के विनाशकारी प्रभावों ने एक पूरी पीढ़ी को जोखम में डाला हुआ है। महांमारी से पहले भी, बहुत शिक्षा प्रणालियाँ बच्चों को ऐसी भाषा में पढ़ने में धकेल कर जो वे अच्छी तरह नहीं जानते उन्हें हानि में रखती है। सीखना ग्रहण करने और इसकी गति बढ़ाने के लिए, मानवीय पूँजी के नतीजों में सुधार के लिए, और अधिक प्रभावी और एक-समान शिक्षा प्रणाली के सृजन के लिए ज़रूरी है कि बच्चों को उस भाषा में पढ़ाया जय जो वे जानते हैं।”
शिक्षा के माध्यम की भाषा पर एक नई रिपोर्ट दर्ज करती है कि जब बच्चों को शुरू में उस भाषा में पढ़ाया जाता है, जो वे बोलते और समझते हैं, तो वे अधिक सीखते हैं, अन्य भाषाओं को सीखने के लिए बेहतर तैयार होते हैं, गणित और विज्ञान जैसे और विषय सीख सकते हैं, स्कूल में अधिक टिके रहते हैं, और अपनी संस्कृति और स्थानीय वातावरण के अनुकूल स्कूल में अपनापन महसूस करते हैं। इस से भी बढ़ कर, इससे स्कूल में बाद में दूसरी भाषा सीखने के लिए सब से तगड़ी नींव रक्खी जाती है। क्योंकि शिक्षा के माध्यम की भाषा की प्रभावी नीतियों से सीखने में और स्कूल में आगे बढ़ने में सुधार होता है, इस लिए इनसे देश का प्रति-विद्यार्थी खर्च कम और, इस तरह, सभी बच्चों के लिए शिक्षा की अधिक पहुँच और गुणवत्ता में बढ़ोतरी के लिए धन का बेहतर प्रयोग होता है।
पश्चिम और मध्य अफ्रीका के लिए विश्व बैंक के उपाध्यक्ष उस्माने डायगाना ने कहा: “उप-सहारा अफ्रीका में भाषाई विविधता इसकी पहली विशेषताओं में से एक है – जहाँ इस क्षेत्र में 5 राज भाषाएँ हैं, वहीं पश्चिमी और केंद्रीय अफ्रीका में 940 और सब-सहारा अफ्रीका में 1,500 अल्प-संख्यक भाषाएँ हैं, जो शिक्षा की चुनौतियों को बढ़ाती हैं। शिक्षा के माध्यम में बेहतर भाषा नीतियों को अपनाने से देश बच्चों को स्कूल में बेहतर शुरुआत करने में सक्षम बनाएगा और उनकी अर्थव्यवस्थाओं के दीर्घकालिक उत्पादन और स्थिरता के लिए आवश्यक मानव पूँजी के निर्माण के लिए सही रास्ता तय करेगा।”
हालाँकि दुनिया ने कोविड-19 से पहले बच्चों को स्कूल भेजने में काफी प्रगति की थी, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा में लगभग सार्वभौमिक नामांकन के परिणामस्वरूप सार्वभौमिक शिक्षा लगभग नहीं हुई है। वास्तव में, महामारी की चपेट में आने से पहले, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 53 प्रतिशत बच्चे सीखने की अक्षमता की स्थिति में थे, जिसका अर्थ है कि 10 वर्ष की आयु तक, इस उम्र के लिए निश्चित पाठ्य पढ़ने और समझने के योग्य नहीं थे। आज, लंबे समय तक महामारी से जुड़ी स्कूल बंदी होने और गहरी मंदी की दोहरी मार ने संकट को और बढ़ा दिया है। प्रारंभिक अनुमानों से पता चलता है कि सीखने की अक्षमता 63 प्रतिशत की एक नई ऊँचाई तक पहुँच सकती है। कई मामलों में, ये कम सीखने के परिणाम अपूर्ण भाषा नीतियों का परिणाम हैं।
विश्व बैंक के वैश्विक निदेशक जेम सवेदरा का ज़ोर देकर कहना है, “संदेश उच्च-स्वरीय और स्पष्ट है। जब बच्चों को उस भाषा में पढ़ाया जाता है जिसे वे समझते हैं, तो वे सबसे अच्छा सीखते हैं। सीखने के गहरे और अन्यायपूर्ण संकट के लिए कुछ करने की ज़रूरत है। यदि छात्र उस भाषा को नहीं समझते हैं जिसमें उन्हें सिखाया जाता है, तो शिक्षा प्रणाली में निवेश करने से उनकी शिक्षा में कोई गणनीय सुधार नहीं होगा। बच्चों को उनके घर की भाषा में पढ़ा कर शिक्षण दरिद्रता में बड़े सुधर हो सकते हैं।”
शिक्षा की भाषा पर नई विश्व बैंक नीति का दृष्टिकोण 5 सिद्धांतों पर आधारित है:
1. प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा और देखभाल सेवाओं के साथ शुरू करते हुए, बच्चों को कम से कम छह साल की प्रारंभिक शिक्षा के लिए उनकी समझ में आने वाली भाषा में पढ़ायें।
2. साक्षरता और लेखन से परे शैक्षणिक विषयों को पढ़ाने के लिए उस भाषा का प्रयोग करें, जिसे बच्चे समझते हैं ।
3. यदि छात्र प्राथमिक विद्यालय में दूसरी भाषा सीखना चाहते हैं, तो इसे एक विदेशी भाषा के रूप में शुरू करें और बोलने के भाषाई कौशल पर जोर दें।
4. विदेशी भाषा शिक्षा की मुख्य भाषा बन जाने के बाद भी, उस भाषा का प्रयोग करते रहें जिसे बच्चे समझते है।
5. देश और शिक्षा लक्ष्यों के संदर्भ में शिक्षा भाषा नीतियों के कार्यान्वयन की निरंतर योजनाबंदी, विकास, अनुकूलन और सुधार करना जारी रखें।
यह सच है कि राजनैतिक प्रतिबद्धता और शिक्षा व्यवस्था के सामंजस्य के लिए, इन भाषा-भाषी नीतियों को नीतियों के बड़े निकाय में अच्छी तरह से एकीकृत करने की आवश्यकता है।
अपने सभी छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली प्रारंभिक बचपन शिक्षा और बुनियादी शिक्षा के प्रावधान के लिए विश्व बैंक द्वारा देशों को प्रदान की जाने वाली वित्तीय और सलाहकार सहायता का यह सोच आधार बनेगी। विश्व बैंक विकासशील देशों में शिक्षा के लिए बाहरी वित्तीय सहायता का सबसे बड़ा स्रोत है – इस ने 2021 वित्तीय वर्ष में नया कीर्तिमान स्थापित किया और पुनर्निर्माण और विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय बैंक (आई बी आर डी) के स्रोतों के कोई 41,250 करोड़ रुपये नई गतिविधियों के लिए निर्धारित किए गए हैं, और इसके अलावा, 45 देशों के 60 नए शिक्षा कार्यक्रमों के लिए कोई 6,000 करोड़ रुपये ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन (जीपीई) के माध्यम से निर्धारित किए हैं।”

पूर्व प्रमुख, भाषाविज्ञान और पंजाबी लेक्सोग्राफी विभाग; पूर्व निदेशक, सेंटर फॉर डायस्पोरा स्टडीज, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला
प्रो. जोगा सिंह एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद हैं, जिनके शोध और शिक्षण ने भाषाविज्ञान और प्रवासी अध्ययन के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।







