कूटनीति की नई भाषा : युवा, शिक्षा और ज्ञान से बदलते वैश्विक संबंध

"कूटनीति लंबे समय तक सरकारों, राजधानियों और राजनयिकों के बीच होने वाली बातचीत तक सीमित समझी जाती रही। आज उसकी सीमाएँ काफी विस्तृत हो चुकी हैं। विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, सांस्कृतिक संगठन, विद्यार्थी, वैज्ञानिक, कलाकार और युवा स्वयं अंतरराष्ट्रीय संबंधों के महत्वपूर्ण वाहक बन रहे हैं।" - इसी आलेख से

आज की दुनिया को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किस देश के पास कितने हथियार हैं, उसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है या उसके कितने रणनीतिक साझेदार हैं। बदलती विश्व-व्यवस्था में शक्ति का एक दूसरा चेहरा भी तेजी से सामने आ रहा है। वह है लोगों के मन में किसी देश के प्रति बनी समझ, जिज्ञासा और विश्वास। इसी बदलती कूटनीति के बीच चीन की एक पहल विशेष ध्यान आकर्षित करती है। नवंबर 2023 में सैन फ्रांसिस्को में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अगले पाँच वर्षों में 50,000 अमेरिकी युवाओं को अध्ययन और आदान-प्रदान के लिए चीन आमंत्रित करने की घोषणा की थी। मई 2026 में चीनी आधिकारिक स्रोतों ने बताया कि यह लक्ष्य निर्धारित समय से लगभग ढाई वर्ष पहले ही पूरा हो गया और 50,000 से अधिक अमेरिकी युवा चीन जा चुके हैं।

पहली नजर में यह विद्यार्थियों के आने-जाने का एक कार्यक्रम दिखाई देता है, लेकिन इसके भीतर आधुनिक कूटनीति की एक गहरी सोच दिखाई देती है। किसी युवा को किसी देश के बारे में केवल समाचारों, सामाजिक माध्यमों या राजनीतिक वक्तव्यों से जानकारी मिलना और स्वयं उस देश की गलियों, विश्वविद्यालयों, लोगों, संस्कृति और जीवन को देखना—इन दोनों अनुभवों में बहुत अंतर होता है। दूर बैठकर किसी समाज को समझना और उसके बीच कुछ दिन रहकर उसे महसूस करना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं। यही वह जगह है, जहाँ आज की जन-कूटनीति अपनी वास्तविक भूमिका निभाती है।

कूटनीति लंबे समय तक सरकारों, राजधानियों और राजनयिकों के बीच होने वाली बातचीत तक सीमित समझी जाती रही। आज उसकी सीमाएँ काफी विस्तृत हो चुकी हैं। विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, सांस्कृतिक संगठन, विद्यार्थी, वैज्ञानिक, कलाकार और युवा स्वयं अंतरराष्ट्रीय संबंधों के महत्वपूर्ण वाहक बन रहे हैं। एक अमेरिकी विद्यार्थी जब चीन जाता है तो वह केवल चीन की यात्रा नहीं करता; वह अपने अनुभवों को परिवार, मित्रों, विश्वविद्यालय और समाज को अपने साथ लेकर लौटता है। उसी प्रकार जब चीनी विद्यार्थी अमेरिका, भारत या यूरोप जाते हैं तो वे भी अपने अनुभवों का एक नया संसार अपने साथ वापस ले जाते हैं। इस तरह यात्राएँ केवल भौगोलिक दूरी कम नहीं करतीं, बल्कि समाजों के बीच बनी मानसिक दूरियों को भी प्रभावित कर सकती हैं।

चीन की पहल का महत्व इसी दृष्टि से समझा जाना चाहिए। इसे केवल विद्यार्थियों की संख्या के रूप में देखना इसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देना होगा। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसे ‘जन-से-जन संपर्क’, ‘शैक्षिक कूटनीति’, ‘सांस्कृतिक कूटनीति’ और ‘युवा कूटनीति’ के व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। स्वयं चीनी नेतृत्व ने इस कार्यक्रम को चीन-अमेरिका संबंधों के भविष्य और दोनों देशों के युवाओं के बीच समझ बढ़ाने से जोड़ा है। जनवरी 2026 में चीन की ओर से कहा गया था कि उस समय तक 40,000 से अधिक अमेरिकी युवा कार्यक्रम में भाग ले चुके थे; मई 2026 में चीन ने 50,000 का लक्ष्य पार होने की घोषणा की।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—आखिर युवा ही क्यों? इसका उत्तर केवल इतना ही नहीं है कि युवा किसी भी समाज का भविष्य होते हैं। असली बात यह है कि आज का विद्यार्थी कल का शोधकर्ता, वैज्ञानिक, उद्यमी, शिक्षक, पत्रकार, प्रशासक या नीति-निर्माता हो सकता है। जिन समाजों के युवाओं के बीच आज संवाद स्थापित होता है, उनके बीच आने वाले दशकों में संस्थागत और व्यक्तिगत संबंधों के बनने की संभावना भी बढ़ती है। इसलिए विश्वविद्यालयों में बना परिचय कभी-कभी सरकारों के बीच बने औपचारिक समझौतों से अधिक लंबे समय तक टिकने वाला सामाजिक संबंध बन सकता है।

यही कारण है कि आज दुनिया में शिक्षा को केवल रोजगार और डिग्री से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है। विश्वविद्यालय अब ज्ञान के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। किसी विदेशी विद्यार्थी के लिए किसी देश का विश्वविद्यालय केवल कक्षा नहीं होता; वह उस देश की भाषा, समाज, संस्कृति, लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और जीवन-पद्धति को समझने का प्रवेश-द्वार भी बन जाता है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी किसी देश की ‘मानवीय उपस्थिति’ को दुनिया के दूसरे हिस्सों तक ले जाने वाली एक अदृश्य कड़ी बन जाते हैं।

भारत के लिए इस पूरी प्रक्रिया में एक अलग तरह का प्रश्न छिपा हुआ है। भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादियों में से एक है, उच्च शिक्षा का विशाल तंत्र है और ज्ञान, संस्कृति तथा सभ्यता की असाधारण विविधता है। लेकिन प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितने भारतीय विद्यार्थी विदेश जाते हैं। प्रश्न यह भी है कि दुनिया के कितने युवा भारत को अपने अध्ययन, शोध और जीवन-अनुभव का हिस्सा बनाते हैं। भारत सरकार की उच्च शिक्षा संबंधी रिपोर्टों में अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग, विदेशी शिक्षकों और विद्यार्थियों को भारत से जोड़ने की विभिन्न पहलों का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के लिए, ‘ग्लोबल इनिशिएटिव ऑफ एकेडमिक नेटवर्क’ के माध्यम से विदेशी विशेषज्ञों को भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

भारत के लिए अगला कदम केवल ‘स्टडी इन इंडिया’ तक सीमित रहने के बजाय ‘रिसर्च विद इंडिया’ की भावना को मजबूत करना हो सकता है—अर्थात दुनिया भारत में केवल पढ़ने न आए, बल्कि भारत के साथ मिलकर शोध भी करे। जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि, जल-सुरक्षा, जैव-प्रौद्योगिकी, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा और सतत विकास जैसे विषय किसी एक देश की सीमाओं में बंद नहीं हैं। इन क्षेत्रों में भारतीय और विदेशी युवाओं के बीच संयुक्त शोध और संवाद भविष्य की ज्ञान-कूटनीति का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

भारत की विशेषता यह भी है कि उसकी शक्ति केवल आधुनिक तकनीकी क्षमता में नहीं, बल्कि उसकी दीर्घ सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपरा में भी है। योग, बौद्ध दर्शन, संस्कृत, भारतीय दर्शन, साहित्य, संगीत, लोकतांत्रिक अनुभव, सहकारी संस्थाएँ, पंचायती राज और सामाजिक परिवर्तन जैसे विषय दुनिया के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन के महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकते हैं। नालंदा और विक्रमशिला की स्मृति से लेकर आज के भारतीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक भारत के पास दुनिया से संवाद करने के लिए केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की भी पर्याप्त सामग्री है।

यहाँ बिहार का संदर्भ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। जिस भूमि ने नालंदा और विक्रमशिला जैसी ज्ञान-परंपराएँ दुनिया को दीं, वही बिहार आज ग्रामीण विकास, कृषि, सामाजिक न्याय, पंचायती राज, प्रवासन, नदी-सभ्यता और लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे विषयों पर अंतरराष्ट्रीय शोध का क्षेत्र बन सकता है। यदि दुनिया के विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी बिहार के गाँवों, पंचायतों, कृषि-व्यवस्था और सामाजिक परिवर्तन को नजदीक से समझें और बिहार के विद्यार्थी भी दुनिया के अलग-अलग समाजों के अनुभवों से जुड़ें, तो यह केवल शैक्षिक आदान-प्रदान नहीं होगा; यह ज्ञान के दोतरफा प्रवाह की शुरुआत होगी।

चीन की पहल से भारत को किसी की नकल करने का संदेश नहीं मिलता। इसका बड़ा संदेश यह है कि आने वाली कूटनीति केवल विदेश मंत्रालयों की मेज पर नहीं लिखी जाएगी। वह विश्वविद्यालयों के परिसरों में, शोध प्रयोगशालाओं में, छात्रावासों में, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में और अलग-अलग देशों के युवाओं के बीच बनते रिश्तों में भी आकार लेगी। बीसवीं सदी की कूटनीति में राजदूत महत्वपूर्ण थे; इक्कीसवीं सदी की कूटनीति में विद्यार्थी, शोधकर्ता और युवा भी उतने ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

युवा कूटनीति का वास्तविक अर्थ किसी देश की छवि चमकाना नहीं, बल्कि दूसरे समाज को समझने के अवसर पैदा करना है। यदि किसी युवा को किसी देश को देखने, प्रश्न पूछने, असहमति रखने, संवाद करने और स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचने का अवसर मिलता है, तो अंतरराष्ट्रीय संबंध अधिक मानवीय बनते हैं। लोकतांत्रिक समाजों के बीच यही स्वतंत्र अनुभव दीर्घकालिक समझ की आधारशिला बन सकता है।

चीन-अमेरिका संबंधों की अपनी जटिलताएँ हैं और दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा, ताइवान तथा अन्य मुद्दों पर मतभेद भी बने हुए हैं। ऐसे वातावरण में युवाओं के बीच संवाद को आगे बढ़ाने की पहल इस बात की याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल सरकारों के मतभेदों का नाम नहीं हैं; उनके भीतर समाजों और लोगों के बीच संबंधों की भी एक अलग परत होती है। चीनी पक्ष ने स्वयं इस पहल को दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क और पारस्परिक समझ से जोड़ा है।

इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि युवा किसी देश की केवल जनसंख्या नहीं होते, वे उसके भविष्य की संभावित बौद्धिक और सामाजिक पूँजी होते हैं। इसलिए जिस देश की युवा पीढ़ी दुनिया से संवाद करती है और दुनिया के युवाओं के लिए अपने दरवाजे खोलती है, वह केवल शिक्षा का विस्तार नहीं करती, बल्कि अपने समाज को व्यापक वैश्विक संवाद से जोड़ती है।

भारत के सामने भी यही अवसर है। भारत के पास युवा हैं, विश्वविद्यालय हैं, विविधता है, ज्ञान की परंपरा है और दुनिया के अनेक देशों के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन संसाधनों को अलग-अलग खानों में न देखकर एक व्यापक ज्ञान-कूटनीति के रूप में देखा जाए। भारत के विद्यार्थी दुनिया में जाएँ, दुनिया के विद्यार्थी भारत आएँ, दोनों साथ शोध करें, साथ प्रश्न पूछें और एक-दूसरे के समाज को किताबों से आगे जाकर समझें। शायद यही वह रास्ता है जहाँ कूटनीति केवल सरकारों की भाषा नहीं रहती, बल्कि मनुष्य से मनुष्य के बीच संबंध बन जाती है।

आखिरकार, किसी देश की वास्तविक युवा शक्ति केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि उसके पास कितने युवा हैं। उसकी असली शक्ति तब दिखाई देती है जब वे युवा दुनिया से जुड़ते हैं, दुनिया के युवाओं को अपने पास बुलाते हैं और दोनों मिलकर भविष्य के प्रश्नों पर संवाद करते हैं। आने वाली दुनिया में सीमाएँ भले ही राजनीतिक रहें, लेकिन ज्ञान, विचार और युवा आकांक्षाएँ लगातार सीमाओं के पार जाएँगी। इसलिए भविष्य की विश्व-राजनीति को समझने के लिए यह देखना उतना ही जरूरी होगा कि राष्ट्रों के बीच कितने समझौते हुए, जितना यह देखना कि उनके युवाओं के बीच कितने संबंध बने। यही युवा कूटनीति का मानवीय पक्ष है और शायद इक्कीसवीं सदी की कूटनीति की सबसे शांत, लेकिन सबसे दूर तक जाने वाली आवाज भी।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना 
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।

रुपेश रॉय
रुपेश रॉय

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना 
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।

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