इसे यहाँ सुन भी सकते हैं –
किसी राष्ट्र की मुक्ति का इतिहास केवल घटनाओं, तिथियों और संधियों का दस्तावेज नहीं होता; वह समष्टि की चेतना, उसके संताप और उसकी सामूहिक इच्छाशक्ति का महाकाव्य भी होता है। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत का स्वाधीनता संग्राम संसार के आधुनिक इतिहास की संभवतः सबसे जटिल, बहुआयामी और नाटकीय परिघटना थी। इस संघर्ष के केंद्र में दो ऐसे प्रतीक उभरे, जो दृश्यतः तो परस्पर विरोधी जान पड़ते थे, किंतु अंततः एक ही राष्ट्रीय यज्ञ की अलग-अलग समिधायें थे। एक ‘चरखा’ था,जो अहिंसा, आत्मसंयम, आर्थिक स्वावलंबन और नैतिक सत्याग्रह का रूपक था और दूसरी ‘बंदूक’ थी, जो अस्मिता, निर्भीकता, सशस्त्र संप्रभुता और सामरिक प्रतिरोध का उद्घोष थी। दोनों ने मिलकर ही स्वाधीनता का महाकाव्य लिखा था।
एक सरल और इकहरी धारणा के तहत ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग, बिना ढाल’ की तर्ज पर कहा जाता है कि भारत की मुक्ति केवल अहिंसक आंदोलनों का परिणाम थी। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आजादी ‘चरखा’ चलाने और उपवास करने से नहीं, भगत सिंह के धमाके, आजाद की गोलियों की बौछार और अशफ़ाक़ की शहादत से उत्पन्न भय के कारण मिली। उनका मानना है यदि देश ने सशस्त्र क्रांति का पूर्ण वरण किया होता तो इतिहास की गति अधिक तीव्र और परिणाम भिन्न होते। किंतु जब हम तत्कालीन वैश्विक परिवेश, औपनिवेशिक राज्य के संरचनात्मक चरित्र और भारतीय समाज की आंतरिक बनावट के आलोक में इस द्वंद्व का अवलोकन करते हैं तो यह सत्य उद्घाटित होता है कि चरखा और बंदूक स्वाधीनता के दो विरोधी नहीं, बल्कि दो समानांतर और एक-दूसरे को शक्ति देने वाले पथ थे।
चरखे का राजनीतिक अर्थशास्त्र
मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा स्वाधीनता संग्राम के केंद्र में चरखे को स्थापित करना केवल एक आध्यात्मिक या रचनात्मक प्रयोग नहीं था। बल्कि राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक असाधारण रणनीतिक प्रतिकार था। 1857 के महासंग्राम के रक्तपात ने यह ऐतिहासिक यथार्थ सिद्ध कर दिया था कि एक आधुनिक, औद्योगिक और केंद्रीकृत औपनिवेशिक सत्ता, जिसके पास तोपों और पेशेवर सेना का असीम संजाल था, से सीधी सैन्य मुठभेड़ में पारंपरिक तरीकों से पार पाना अत्यंत कठिन और संदेहास्पद था। यदि यह संभव होता भी तो उसके लिए रक्त के समुद्र को लाँघना पड़ता। ब्रिटिश हुकूमत हिंसा के खेल में महारथी थी। वह किसी भी सैन्य विद्रोह को ‘कानून और व्यवस्था’ की समस्या घोषित कर निर्ममता से कुचलने की तकनीकी क्षमता और अंतरराष्ट्रीय औचित्य भी रखती थी।
लेकिन गांधी ने युद्ध के मैदान को ही बदल दिया। वे ब्रिटिश साम्राज्य को उस मैदान में खींच लाए, जहाँ उसकी तोपें और उन तोपों के पीछे संगीनें ताने सैनिक अप्रासंगिक सिद्ध हो गए। अब यह मैदान नैतिकता और नागरिक अवज्ञा का मैदान था।
चरखा मैनचेस्टर और लंकाशायर की कपड़ा मिलों के एकाधिकार के विरुद्ध एक देशी विद्रोह था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिस बात के लिए आई ‘पै धन विदेस चलि जात इहै अति ख्वारी’ कहा था और दादाभाई नौरोजी ने जिसे ‘धन की निकासी’ के अमूर्त सिद्धांत के रूप में पेश किया था, गांधी ने चरखे के माध्यम से उसे ग्रामीण भारत के दैनिक जीवन का यथार्थ बना दिया। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार केवल आयात रोकने का उपक्रम नहीं था, बल्कि भारतीय ग्रामीण श्रम को औपनिवेशिक परतंत्रता से मुक्त कराने का आर्थिक घोषणापत्र था। यह अंग्रेजों की आर्थिक रीढ़ पर सीधा प्रहार था।
किसी भी सशस्त्र गुरिल्ला संघर्ष की अनिवार्य सीमा यह होती है कि उसमें शारीरिक रूप से सक्षम, युवा और प्रशिक्षित वर्ग ही सक्रिय भाग ले सकता है। किंतु गांधीवादी सत्याग्रह ने प्रतिरोध की परिभाषा ही बदल दी। चरखे और अहिंसा ने आबाल-वृद्ध महिलाओं, किसानों, श्रमिकों और व्यापारियों अर्थात् समूचे समाज को ही संघर्ष का सिपाही बना दिया। जेल जाना कलंक के स्थान पर राष्ट्रीय सम्मान बन गया। इस नैतिक सम्मोहन ने ब्रिटिश शासन के सबसे बड़े हथियार ‘भय’ को निष्प्रभावी कर दिया, जिससे आमजन की भागीदारी का अभूतपूर्व विस्तार हुआ।
ब्रिटेन ने अपने दुष्ट औपनिवेशिक शोषण के ऊपर वैश्विक नैतिक दायित्व की एक चादर डाल रखी थी। वह विश्व को सभ्य बनाने के दायित्व की चादर थी। दो महायुद्धों के बीच जब ब्रिटेन स्वयं को विश्व मंच पर लोकतंत्र और स्वतंत्रता के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, तब निहत्थे सत्याग्रहियों पर लाठियों और गोलियों की वर्षा ने ब्रिटिश शासन की ‘सभ्य बनाने के दायित्व’ वाली औपनिवेशिक चादर को तार-तार कर दिया। अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ब्रिटिश बर्बरता के दृश्यों ने लंदन के नीति-निर्माताओं पर भारी नैतिक दबाव बनाया।
संप्रभुता की क्रांतिकारी गर्जना
लेकिन क्या केवल नैतिक आग्रह और उपवास ने एक धूर्त साम्राज्यवादी सत्ता को बोरिया-बिस्तर समेटने पर विवश कर दिया था? इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन इस एकांगी व्याख्या को शंका की दृष्टि से देखता है। चरखे के घरघर के समानांतर, कुछ ही दूरी पर बंदूक की नाल भी धधक रही थी, जिसने ब्रिटिश सत्ता के मन में यह स्पष्ट कर दिया था कि भारतीयों की शांति उनकी विवशता नहीं है, बल्कि एक सुगठित क्रांतिकारी आग भी धधक रही है। चापेकर बंधुओं, खुदीराम बोस, रासबिहारी बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, प्रीतिलता वाडेकर, दुर्गा भाभी, मातंगिनी हाजरा आदि से लेकर सरदार भगत सिंह और सूर्य सेन तक क्रांतिकारियों की यह धारा भारतीय आत्मसम्मान का तीखा विस्फोट थी।
भगत सिंह और उनके साथियों ने जल्द ही यह समझ लिया था कि क्रांतिकारी हिंसा प्रतिशोध के रूप में केवल किसी अंग्रेज अधिकारी की हत्या नहीं है। इसीलिए असेंबली में बम फेंकते हुए उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि एक अंधी-बहरी व्यवस्था के कान खोलना और देश के युवाओं में सोई हुई राष्ट्रीय चेतना को जगाना था। अदालत के कटघरे में खड़े होकर भगत सिंह द्वारा समाजवाद, साम्राज्यवाद-विरोध और मानव-मुक्ति की जो दार्शनिक व्याख्या की गई, उसने संपूर्ण आंदोलन को एक बौद्धिक और वैचारिक दिशा दी। इस तरह भगत सिंह का यह धमाका बहरे अंग्रेजों को सुनाने के लिए और स्वाधीनता की चेतना को उद्दीप्त करने के लिए किया गया विस्फोट था।
इस धारा की पराकाष्ठा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ के रूप में सामने आई। द्वितीय विश्व युद्ध की वैश्विक उथल-पुथल को भाँपते हुए नेताजी ने यह ऐतिहासिक साहस दिखाया कि भारत की मुक्ति के लिए विदेशी शक्तियों के अंतर्विरोधों का लाभ उठाकर एक नियमित सेना खड़ी की जाए। ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ केवल एक भावुक नारा नहीं था, बल्कि वह साम्राज्य की सैन्य सत्ता को उसी की भाषा में दी गई खुली चुनौती थी। इस तरह ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ का गठन भारत की संप्रभुता का सशस्त्र उद्घोष था।
1945-46 में लाल किले में चले आईएनए के अफसरों पर मुकदमों ने संपूर्ण देश में बारूद जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी। इसके बाद फरवरी, 1946 में बंबई और कराची में हुआ ‘शाही भारतीय नौसेना विद्रोह’ ब्रिटिश सत्ता के ताबूत की अंतिम कील साबित हुआ। इसने ब्रिटिश सैन्य बल की नींव को ही हिला दिया। ब्रिटिश राज भारत पर मुट्ठी भर अंग्रेजों के बल पर नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों और पुलिसकर्मियों की निष्ठा के सहारे टिका था। जब वह निष्ठा टूट गई, तब ब्रिटेन को अहसास हुआ कि अब इस उपमहाद्वीप को सैन्य बल से नियंत्रित रखना असंभव है। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने वर्षों बाद स्वीकार किया था कि 1947 में सत्ता हस्तांतरण के त्वरित निर्णय के पीछे आईएनए और सेना में फैली बगावत की भावना का भय सर्वाधिक निर्णायक था।
इस तरह अहिंसक आग्रह ही नहीं, बल्कि इसके समानांतर सशस्त्र विद्रोह की धारा भी उतनी ही सशक्तता के साथ चल रही थी। इसलिए गांधीवादी उपक्रमों को ही स्वाधीनता का श्रेय सौंप देना इतिहास की एकांगी समझ की सूचना मात्र है।
यदि आंदोलन का स्वरूप केवल हिंसक होता तो?
अक्सर यह विचारोत्तेजक प्रश्न उठता है कि यदि भारत ने पूर्णतः सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया होता तो क्या परिणाम अधिक गौरवशाली या शीघ्रगामी होते? उस समय के वैश्विक उदाहरण, चाहे वह सोवियत क्रांति (1917) हो, आयरिश स्वतंत्रता संग्राम (1919-1921) या बाद के वर्षों में चीन, वियतनाम और अल्जीरिया के मुक्ति-युद्ध – सभी वैश्विक उदाहरण यह दर्शाते हैं कि सशस्त्र क्रांति से साम्राज्यवाद को परास्त करना असंभव नहीं था। फिर भारत ने अहिंसा के मार्ग को ही क्यों चुना? इस प्रश्न का उत्तर इस महाद्वीप की राजनीतिक-सामाजिक संरचना के परिप्रेक्ष्य में देखना संगत होगा। इस परिप्रेक्ष्य के तीन आयाम हैं –
पहला, यदि आंदोलन केवल सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध तक सीमित रहता तो ब्रिटिश साम्राज्य को इसे कुचलने के लिए जालियाँवाला बाग जैसे सैकड़ों नरसंहारों का अंतरराष्ट्रीय व विधिक औचित्य मिल जाता। जैसा कि अंग्रेजों ने मलय और केन्या (माऊ-माऊ विद्रोह) में किया। वे पूरे-के-पूरे क्षेत्रों को सैन्य छावनियों में बदलकर आबादी को भुखमरी और दमन की आग में झोंक देते।
दूसरा, इसकी सामाजिक संरचना में निहित है। भारत कोई एकरस, एकरूप समाज नहीं है। 560 से अधिक देशी रियासतें, गहरी धार्मिक, भाषाई और जातीय आदि विविधताएँ इस देश को अनेक राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक खंडों में विभाजित कर रही थीं। ऐसे परिवेश में यदि एक सर्वस्वीकार्य, अहिंसक राजनीतिक मंच (कांग्रेस) के नेतृत्व में जन-आंदोलन न होता तो संभव था कि सशस्त्र संघर्ष या तो बहुत सरलता से क्षेत्रीय राजाओं की आपसी लड़ाई में बदल जाता या अनेक रजवाड़े निष्क्रिय रहते या अंग्रेजों के प्रति वफादारी प्रदर्शित करते हुए अपनों पर ही आक्रमण करते, जैसा कि 1857 में हुआ था या वह संघर्ष खूनी गृहयुद्ध में बदल सकता था, जैसा कि 1920 और 30 के दशक में चीन ने झेला। तब रक्त के सागर में नहाकर निकले हुए कई भारत हमारे सामने होते।
तीसरा, जिन देशों ने विशुद्ध रूप से बंदूकों के बल पर मुक्ति पाई, वहाँ सत्ता स्वभावतः सैन्य जनरलों या एकदलीय अधिनायकवादी तंत्र के हाथों में केंद्रित हो गई। भारत यदि केवल सशस्त्र क्रांति से स्वतंत्र होता, तो एक स्थिर, बहुदलीय और जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना शायद एक दूर का स्वप्न ही रह जाती।
दोनों धाराओं का मिलन
भारतीय इतिहास का सबसे सुंदर यथार्थ यह है कि चरखा और बंदूक परस्पर विरोधी होने के बावजूद एक अनकहे ऐतिहासिक द्वंद्वात्मक रिश्ते में बँधे थे। गांधी की अहिंसा को उसकी वास्तविक ‘मोलभाव की शक्ति’ क्रांतिकारियों के खौफ से मिलती थी। जब गांधी वायसराय के साथ समझौते की मेज पर बैठते थे, तो ब्रिटिश शासकों के मन में यह स्पष्ट भय होता था कि यदि वे इस अहिंसक संत से बात नहीं करेंगे, तो कल उन्हें भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद या सुभाष चंद्र बोस के सशस्त्र मोर्चे का सामना करना पड़ेगा। गांधी अंग्रेजों के लिए वह सुरक्षा-कपाट थे, जिसके बिना क्रांति का दबाव ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को उखाड़ सकता था।
वहीं दूसरी ओर, यदि गांधी का देशव्यापी संगठन, चरखे का प्रचार और लाखों लोगों का सत्याग्रह न होता, तो क्रांतिकारियों के आत्मबलिदान को ब्रिटिश प्रचार तंत्र आसानी से कुछ ‘भटके हुए उपद्रवियों की हिंसा’ कहकर इतिहास के पन्नों में दफन कर देता। गांधी द्वारा तैयार की गई जन-चेतना की उर्वर भूमि पर ही क्रांतिकारियों की शहादत जन-आंदोलन की ज्वाला बनकर धधकी।
अतः यह निष्कर्ष निकालना कि स्वाधीनता केवल चरखे के सूत से काती गई थी अथवा केवल बंदूक की गोली से छीनी गई थी, इतिहास को अधूरा समझना होगा। चरखे ने भारत को उसकी ‘आत्मा’ और उसका ‘लोकतंत्र’ दिया; उसने करोड़ों निर्धन, असहाय लोगों के भीतर नागरिक गरिमा और सामूहिक शक्ति का संचार किया। दूसरी ओर, बंदूक ने भारत को उसका ‘पौरुष’ और उसकी ‘अदम्य जिजीविषा’ दी। उसने साम्राज्यवादी घमंड को यह अहसास कराया कि भारतीय छाती गोलियों के आगे झुकने के लिए नहीं है और उसकी भुजाओं में संप्रभुता छीनने का दम भी है।
वस्तुतः स्वाधीनता का सूरज चरखा और बन्दूक के दो चक्कों पर चलकर आया था। चरखा भारत की आंतरिक एकता और लोकतांत्रिक भविष्य का शिल्पी बना और बंदूक ने विदेशी हुकूमत की दमनकारी दीवार को ढहाने वाले अंतिम झटके का काम किया। इन दोनों समानांतर धाराओं के संगम से ही उस स्वतंत्र भारत का प्रादुर्भाव हुआ, जो अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सामरिक शक्ति भी रखता है और अपनी आत्मा में विश्व-शांति एवं करुणा का चरखा भी संजोए हुए है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







