इसे यहाँ सुन भी सकते हैं –
गांधी, अम्बेडकर और फ्रेरे – तीनों अत्यंत महत्वपूर्ण शैक्षिक चिंतकों के रूप में उपस्थित होते हैं। लेकिन उन्हें एक साथ देखने की कोशिश करना अजीब लग सकता है। तीनों अलग-अलग ऐतिहासिक, भौगोलिक और राजनीतिक सन्दर्भों से आते हैं। गांधी औपनिवेशिक भारत में स्वराज, स्वावलंबन और नैतिक पुनर्निर्माण की परियोजना के बीच शिक्षा को देखते हैं। अम्बेडकर उसी औपनिवेशिक काल में और उसी भारतीय समाज में शिक्षा को समानता, सामाजिक न्याय और जाति-विनाश के संघर्ष का आधार बनाते हैं। फ्रेरे बीसवीं शताब्दी के ब्राजील और लैटिन अमेरिकी संदर्भ में गरीबी, निरक्षरता और दमन के अनुभव से ऐसी शिक्षाशास्त्रीय दृष्टि विकसित करते हैं, जिसके केंद्र में आलोचनात्मक चेतना, संवाद और मुक्ति है।
इन तीनों के शैक्षिक दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि, आयाम और दिशा अलग-अलग होने के बावजूद एक गहरा साझा बिंदु यह है कि तीनों के लिए शिक्षा सूचनाओं का संग्रहण, प्रमाणपत्रों का संकलन या ज्ञान/जानकारियों का हस्तांतरण मात्र नहीं है। बल्कि यह मानव-मुक्ति और सामाजिक पुनर्गठन का सबसे बड़ा औजार है। इन तीनों के कार्यों और शैक्षिक दर्शन का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इसीलिए वर्तमान भारतीय संदर्भ में शिक्षा के समुचित रास्ते की तलाश करते हुए इन तीनों महान विचारकों के शिक्षा-दर्शन की समीक्षात्मक व्याख्या आवश्यक है।
शिक्षा पर गांधी का काम :
गांधी की ‘बुनियादी शिक्षा’ या ‘नयी तालीम’ का सबसे आधिकारिक और व्यावहारिक दस्तावेज ‘बुनियादी राष्ट्रीय शिक्षा’ या ‘वर्धा स्कीम’ के नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित है। इसके पूर्व ‘हिन्द स्वराज’के अध्याय 18 में, तथा ‘हरिजन’ और ‘यंग इंडिया’ के विभिन्न लेखों में उन्होंने अपनी शिक्षा-दृष्टि प्रस्तुत की थी। उनके शिक्षा-दर्शन को आधार बनाकर पूरे देश में हजारों बुनियादी विद्यालय खोले गए और अनेक संस्थान उच्च शिक्षा के लिए भी स्थापित किए गए। इनमें गुजरात विद्यापीठ, गुजरात, गांधी विद्यापीठ, गुजरात, लोकभारती ग्राम विद्यापीठ, गुजरात, गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान, तमिलनाडु, ग्रामीण उच्च अध्ययन संस्थान, बिहार, बलवंत राजपूत ग्रामीण संस्थान, उत्तरप्रदेश, महात्मा गांधी ग्रामीण संस्थान, महाराष्ट्र, विद्या भवन ग्रामीण संस्थान, राजस्थान, कस्तूरबा रूरल इंस्टिट्यूट, पंजाब आदि प्रमुख रहे।
शिक्षा पर अंबेडकर का काम :
डॉ० बी० आर० अम्बेडकर ने शिक्षा पर केंद्रित कोई अलग पुस्तक नहीं लिखी। उनके विचार उनके विभिन्न लेखों, भाषणों और ज्ञापनों में मिलते हैं, जिनमें बॉम्बे प्रेसीडेंसी की विधान परिषद में भाषण, साइमन कमीशन को सौंपा गया ज्ञापन, पत्रिकाओं (‘मूक नायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘जनता’ आदि) में लिखे गए लेख, ‘जाति का उच्छेद’ के अंश आदि में मिलते हैं। अपने शिक्षा-दर्शन को व्यवहारिक रूप देने के लिए उन्होंने मुंबई में ‘पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी’ की नींव रखी, जिसके तहत सिद्धार्थ कॉलेज और मिलिंद कॉलेज की स्थापना हुई। इनके विज़न डॉक्यूमेंट अंबेडकर ने ख़ुद लिखे थे।
शिक्षा पर फ्रेरे का काम :
पॉलो फ्रेरे ने शिक्षा पर गांधी और अम्बेडकर से अधिक और ज़्यादा दृष्टिकोणों से विचार किया है। उनकी सबसे प्रसिद्ध और दुनिया भर में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में एक ‘पेडागोजी ऑफ़ द ऑपरेस्ड’ है। शिक्षा पर उनकी अन्य प्रसिद्ध पुस्तकों में ‘एजुकेशन फॉर क्रिटिकल कंशन्सनेस’, ‘पेडागोजी ऑफ़ होप’, ‘पेडागोजी ऑफ़ फ्रीडम’, ‘टीचर्स ऐज़ कल्चरल वर्कर्स’, ‘ए पेडागोजी फॉर लिबरेशन’ आदि हैं। फ्रेरे का शिक्षा-दर्शन सिद्धांत-भर नहीं है। अपने सिद्धांत का व्यावहारिक रूपांतरण उन्होंने उन मज़दूरों के साथ किया, जो अनपढ़ होने के कारण वोट देने के अधिकार से वंचित थे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर थे। उनके इस आशुप्रभावी शिक्षण-पद्धति ने न केवल अनपढ़ मज़दूरों को शीघ्र पढ़ना-लिखना सीखा दिया, बल्कि तत्कालीन ब्राजील के राजनीतिक-सामाजिक समीकरण को भी बदलकर रख दिया। जनता को जागरूक और सक्षम बनाने का दंड इन्हें तानाशाही सरकार के द्वारा देशनिकाला के रूप में भुगतना पड़ा।
गांधी का शिक्षा-दर्शन :
गांधी का प्रमुख उद्देश्य स्वराज की प्राप्ति था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जिस तरह उन्होंने ब्रिटिश उत्पादों के बहिष्कार का आंदोलन चलाया था, उसी तरह ब्रिटिश शिक्षा-पद्धति के विरुद्ध उन्होंने नयी तालीम की स्वदेशी अवधारणा विकसित की थी। इस तरह ‘नयी तालीम’ को ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध स्वदेशी शिक्षा का विद्रोह की तरह देखना चाहिए। इसीलिए उनका शिक्षा-दर्शन स्वावलंबन, स्वराज और नैतिकता के तिपाये पर खड़ा है। उनके अनुसार शिक्षा का अर्थ केवल साक्षरता नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के ‘शरीर, मन और आत्मा’ (Head, Heart and Hand = 3Hs) के सर्वांगीण विकास का माध्यम था, जिसे उन्होंने ‘बुनियादी शिक्षा’ या ‘नयी तालीम’ (1937) का नाम दिया। गांधी जी का मानना था कि शिक्षा वास्तविक जीवन से कटी हुई नहीं होनी चाहिए, इसलिए उन्होंने इसमें हस्तशिल्पको केंद्र में रखा। उनका विचार था कि बच्चे कताई, बुनाई, कृषि या बढ़ईगिरी जैसे किसी उद्योग के माध्यम से सीखें, जिससे न केवल उनकी बुद्धि का विकास हो, बल्कि शिक्षा आत्मनिर्भर और स्वावलंबी भी बने। इस दर्शन में मातृभाषा को शिक्षा का अनिवार्य माध्यम माना गया, ताकि बच्चा अपने परिवेश से सहजता से जुड़ सके। गांधी ज्ञान और कर्म (Learning by doing) के समन्वय पर बल देते थे, जहाँ कंठस्थ करने के बजाय व्यावहारिक अनुभव, शारीरिक श्रम के प्रति सम्मान और नैतिक मूल्यों का निर्माण सर्वोपरि था। ‘नयी तालीम’ का अंतिम लक्ष्य एक ऐसे नैतिक नागरिकों का निर्माण हो, जो शोषणविहीन, अहिंसक और स्वावलंबी समाज की स्थापना कर सकें और वे नागरिक अधिकारों के साथ-साथ उसके सामाजिक कर्तव्यों के प्रति भी सजग बनें। संक्षेप में, उनका यह दर्शन शिक्षा को जीवन से और जीवन को श्रम से जोड़ने का पाथ प्रशस्त करता है।
अम्बेडकर का शिक्षा-दर्शन :
जिस समय गांधी स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे, उसी समय अंबेडकर सामाजिक समानता के लिए संघर्ष कर रहे थे। अम्बेडकर की दृष्टि में सामाजिक असमानता को समाप्त किए बिना स्वाधीनता का कोई अर्थ नहीं है। इसीलिए उनकी शिक्षा-दृष्टि सामाजिक न्याय और सामाजिक समता पर टिकी हुई है। उन्होंने शिक्षा को केवल साक्षरता या डिग्री प्राप्त करने का ज़रिया नहीं, बल्कि सामाजिक गुलामी को काटने, जाति-आधारित भेदभाव को मिटाने और शोषितों को उनके मानवीय अधिकारों के प्रति जागरूक करने के अस्त्र के रूप में देखा। उन्होंने शिक्षा की तुलना ‘शेरनी के दूध’ से करते हुए स्पष्ट किया था कि इसे प्राप्त करने वाला समाज में हो रहे अन्याय के खिलाफ अवश्य दहाड़ेगा। उनका ऐतिहासिक त्रिसूत्रीय मंत्र – ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’– दिखाता है कि वे शिक्षा को चेतना जागृत करने और सामूहिक सामाजिक क्रांति लाने का पहला व्यावहारिक चरण मानते थे। वे समाज के सबसे कमजोर वर्ग और महिलाओं के लिए प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक को पूरी तरह निःशुल्क और अनिवार्य बनाने के प्रबल पक्षधर थे। बौद्ध विचारधारा (प्रज्ञा, करुणा, समता) और जॉन डेवी के व्यावहारिक सिद्धांतों से प्रेरित उनका यह दर्शन, ज्ञान के साथ-साथ नैतिक चरित्र, कौशल विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर बल देता था। संक्षेप में, अम्बेडकर की दृष्टि में शिक्षा का अंतिम लक्ष्य एक ऐसे प्रबुद्ध और उन्नत समाज का निर्माण करना था, जो स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और न्याय के संवैधानिक व मानवीय मूल्यों पर आधारित हो।
फ्रेरे का शिक्षा-दर्शन :
ब्राजील के शिक्षाविद् पॉलो फ्रेरे के सामने वे मज़दूर थे, जो अनपढ़ होने के कारण राजनीतिक रूप से बहिष्कृत तथा सामाजिक-राजनीतिक दमन का शिकार थे। इसीलिए उनकी नजर में उनकी मुक्ति का प्रश्न प्रमुख था। यही कारण था कि उनका शिक्षा-दर्शन मनुष्य को व्यवस्था की गुलामी से मुक्त कराने, उसकी आलोचनात्मक चेतना को जगाने और सामाजिक परिवर्तन लाने का एक अत्यंत क्रांतिकारी मार्ग बना। अपनी वैश्विक कृति ‘पेडागोजी ऑफ द ऑप्रेस्ड’ (Pedagogy of the Oppressed) में उन्होंने पारंपरिक शिक्षा की ‘बैंकिंग प्रणाली’ का कड़ा विरोध किया, जिसमें शिक्षक को ज्ञान का सर्वशक्तिमान स्रोत और छात्र को एक खाली बैंक खाता माना जाता है, जहाँ केवल सूचनाएँ जमा की जाती हैं। इसके विकल्प के रूप में फ्रेरे ने ‘समस्या-प्रस्तुतीकरण शिक्षा’ और ‘संवादपरक पद्धति’ को स्थापित किया, जहाँ शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों सह-यात्री बनकर संवाद के ज़रिए दुनिया को समझते हैं। उनका दर्शन ‘प्रैक्सिस’ (Praxis) पर आधारित था, जिसका अर्थ है- गहन चिंतन के साथ ठोस व्यावहारिक कर्म, ताकि समाज की दमनकारी संरचनाओं को बदला जा सके। फ्रेरे का मानना था कि शिक्षा कभी भी तटस्थ नहीं हो सकती; यह या तो प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों की रक्षा करने का साधन बनती है या फिर शोषितों को अपनी स्थिति के प्रति सजग कर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। वे ‘चेतनीकरण’ (Conscientization) पर विशेष बल देते थे, ताकि व्यक्ति अपनी सामाजिक-राजनैतिक वास्तविकता को आलोचनात्मक ढंग से देख सके और केवल एक मूक दर्शक बनने के बजाय इतिहास का निर्माता बन सके। संक्षेप में, फ्रेरे की दृष्टि में शिक्षा का अंतिम उद्देश्य एक न्यायपूर्ण, समतावादी और मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण करना था, जहाँ मनुष्य अपनी मौलिक आवाज़ पा सके।
गांधी और अम्बेडकर :
गांधी और अम्बेडकर के बीच संबंध भारतीय सामाजिक और राजनीतिक चिंतन का सबसे जटिल अध्याय है। दोनों अस्पृश्यता के विरोधी थे, दोनों सामाजिक परिवर्तन चाहते थे, दोनों शिक्षा को महत्वपूर्ण मानते थे; लेकिन जाति और सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न पर उनके रास्ते अलग थे। गांधी का जोर सामाजिक और नैतिक परिवर्तन पर था। आंबेडकर का जोर सामाजिक संरचना के मूल परिवर्तन पर। यहीं शिक्षा के प्रश्न पर भी अंतर स्पष्ट होता है।
गांधी के लिए शिक्षा व्यक्ति में नैतिकता और सहयोग की भावना विकसित कर सकती है। अम्बेडकर के लिए केवल नैतिक अपील पर्याप्त नहीं है। यदि सामाजिक संस्थाएँ असमानता को पुनरुत्पादित करती रहें, तो व्यक्ति के नैतिक परिवर्तन से व्यवस्था नहीं बदलेगी। अर्थात् गांधी शिक्षा के माध्यम से मनुष्य के नैतिक विवेक को जगाना चाहते हैं, जो हृदय-परिवर्तन के द्वारा सामाजिक परिवर्तन कर सके; अम्बेडकर ऐसे संरचनात्मक परिवर्तन के पक्षधर थे, जिसमें सबको समान रूप से शिक्षा मिले, जिससे असमानता की व्यवस्था को बदलने की बौद्धिक शक्ति प्राप्त हो।
यहाँ ‘हृदय-परिवर्तन’ और ‘संरचनात्मक परिवर्तन’ अलग-अलग क्रियाएँ हैं। व्यक्ति का हृदय-परिवर्तन संरचनात्मक परिवर्तन का कारण नहीं हो सकता। वह किसी की व्यक्तिगत विशेषता हो सकती है, समाज की सामान्य विशेषता नहीं। इसीलिए अम्बेडकर यह स्पष्ट करते हैं कि नैतिक सद्भाव की अपील सामाजिक सत्ता की असमान संरचनाओं का विकल्प नहीं बन सकती।
जाति के प्रश्न पर यही अंतर और ज़्यादा निर्णायक हो जाता है। गांधी सामाजिक संबंधों में नैतिक परिवर्तन और अस्पृश्यता के उन्मूलन पर बल देते हैं। अम्बेडकर जाति-व्यवस्था की बुनियादी संरचना को ही चुनौती देते हैं। उनके लिए सामाजिक न्याय का अर्थ केवल ऊँची जातियों के हृदय में परिवर्तन नहीं, बल्कि दलितों और वंचितों की समान सामाजिक, राजनीतिक और संस्थागत शक्ति सुनिश्चित करना है। इस तरह अम्बेडकर शिक्षा को स्कूलिंग के अवसर से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय के प्रश्न में बदल देते हैं।
अम्बेडकर और फ्रेरे :
अम्बेडकर और फ्रेरे का तुलनात्मक अध्ययन शायद इन तीनों में सबसे अधिक संभावनाशील है। दोनों ही यह मानते हैं कि दमन केवल बाहरी शक्ति नहीं है। वह व्यक्ति की चेतना, आत्म-छवि और सामाजिक संबंधों में भी प्रवेश कर सकता है। वंचित व्यक्ति कभी-कभी उस व्यवस्था को स्वाभाविक मानने लगता है, जिसने उसे वंचित किया है। यहीं शिक्षा की भूमिका सामने आती है।
अम्बेडकर के अनुसार शिक्षा व्यक्ति को यह समझने की क्षमता देती है कि उसकी सामाजिक स्थिति ‘प्राकृतिक’ नहीं है। जाति कोई अपरिवर्तनीय सत्य नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक व्यवस्था है। फ्रेरे के लिए भी शिक्षा व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों को ‘दिए हुए तथ्य’ के रूप में स्वीकार करने के बजाय उनके ऐतिहासिक और राजनीतिक निर्माण को समझने की क्षमता देती है। इस तरह दोनों के बीच यह समानता अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मुक्ति की शुरुआत उस क्षण से होती है, जब मनुष्य अपनी स्थिति को नियति नहीं, बल्कि परिवर्तन योग्य सामाजिक वास्तविकता के रूप में देखना शुरू करता है।
लेकिन महत्वपूर्ण अंतर यह है कि फ्रेरे का विश्लेषण दमन के व्यापक अनुभवों पर लागू होता है, आंबेडकर का चिंतन जाति की विशिष्टता को केंद्र में रखता है। फ्रेरे से अम्बेडकर के चिंतन को पढ़ने पर हम शिक्षा और चेतना के संबंध को नए ढंग से समझ सकते हैं। अम्बेडकर से फ्रेरे को पढ़ने पर यह समझ गहरी होती है कि हर दमन की अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक संरचना होती है और मुक्ति की राजनीति को उन विशिष्टताओं को पहचानना आवश्यक है।
गांधी और फ्रेरे :
पहली दृष्टि में गांधी और फ्रेरे काफी अलग दिखाई देते हैं। एक ओर गांधी का नैतिक और आध्यात्मिक आग्रह है; दूसरी ओर फ्रेरे का आलोचनात्मक और राजनीतिक शिक्षाशास्त्र। लेकिन गहराई से देखने पर दोनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण समानताएँ भी हैं। वह यह कि दोनों शिक्षा को जीवन से जोड़ते हैं, दोनों समुदाय को महत्वपूर्ण मानते हैं, दोनों निष्क्रिय शिक्षार्थी की धारणा को अस्वीकार करते हैं, दोनों अनुभव और वास्तविक जीवन को सीखने का महत्वपूर्ण स्रोत मानते हैं और दोनों शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ते हैं।
लेकिन उनकी परिवर्तन-दृष्टि में पर्याप्त अंतर है। गांधी परिवर्तन को सत्य, अहिंसा और आत्मसंयम के नैतिक अनुशासन से जोड़ते हैं। फ्रेरे परिवर्तन को दमनकारी संरचनाओं की आलोचना और सामूहिक प्रैक्सिस से जोड़ते हैं। गांधी अहिंसा को साधन बनाकर समाज के संबंधों की वैकल्पिक नैतिकता की अवधारणा गढ़ते हैं। फ्रेरे के लिए मुक्ति की प्रक्रिया में संघर्ष अनिवार्य है, लेकिन वह संघर्ष भी मनुष्य की मानवीयता को पुनर्स्थापित करने की दिशा में होना चाहिए।
तुलना :
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि गांधी की शिक्षा व्यवहारिक जीवन से जोड़कर स्वावलंबी और नैतिक नागरिक बनाना चाहती है। वहीं अंबेडकर की शिक्षा बराबरी और अधिकार की आवाज उठाती है। लेकिन फ्रेरे की शिक्षा दुनिया को पढ़ने और बदलने की शक्ति देती है। गांधी के सम्मुख केंद्रीय समस्या औपनिवेशिकता और नैतिक विघटन थी, अम्बेडकर के सम्मुख जाति और सामाजिक असमानता और फ्रेरे के सम्मुख प्रमुख समस्या दमन और चेतना का अवरोध थी। गांधी के सम्मुख शिक्षा का लक्ष्य स्वावलंबन, स्वराज और समग्र मनुष्य था, अम्बेडकर का लक्ष्य समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय था, वहीं फ्रेरे का लक्ष्य आलोचनात्मक चेतना और मुक्ति था। गांधी ज्ञान को जीवन और श्रम से जुड़ा हुआ देखना चाहते थे, अम्बेडकर सामाजिक शक्ति और अधिकार के रूप में तथा फ्रेरे उसे परस्पर संवाद से निर्मित होते हुए देखना चाहते थे। गांधी छात्र को स्वावलंबी और नैतिक व्यक्ति के रूप में देखना चाहते थे, अम्बेडकर उसे अधिकार-संपन्न नागरिक के रूप में देखना चाहते थे और फ्रेरे उसे सामाजिक विषयों में सक्रिय भूमिका अदा करते हुए। गांधी की दृष्टि में शिक्षक मार्गदर्शक और आदर्श है, अम्बेडकर की दृष्टि में ज्ञान और चेतना का माध्यम है और फ्रेरे की दृष्टि में वह सह-शिक्षार्थी है। गांधी शिक्षा के परिणाम के रूप में नैतिक परिवर्तन चाहते हैं, अम्बेडकर सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के रूप में और फ्रेरे प्रैक्सिस के रूप में देखते हैं। गांधी के शिक्षा-दर्शन का केंद्रीय मूल्य सत्य, अहिंसा और स्वराज है, अम्बेडकर के शिक्षा-दर्शन का केंद्रीय मूल्य समानता और बंधुत्व है और फ्रेरे के शिक्षा-दर्शन का केंद्रीय मूल्य संवाद, चेतना और मुक्ति है।
यदि शिक्षा का उद्देश्य स्वावलंबन और नैतिकता है तो हम गांधी की राह अपना सकते हैं। यदि शिक्षा का उद्देश्य जातीय और सामाजिक समानता है तो हम अम्बेडकर की राह अपना सकते हैं। लेकिन शिक्षा का उद्देश्य यदि चेतना की जागृति और मुक्ति है तो फ्रेरे की राह अपनानी होगी। यह रास्ता गांधी और अम्बेडकर दोनों के उद्देश्यों को मजबूती प्रदान करते हुए आगे मुक्ति तक जाता है। आलोचनात्मक चेतना की मुक्ति-यात्रा में गांधी का स्वावलंबन भी समाहित हो जाता है और अम्बेडकर के सामाजिक असमानता का प्रश्न भी। भारतीय ज्ञान-परंपरा में भी माना गया है कि जो विद्या मुक्ति नहीं दिलाये, वह कुछ और हो सकती है, विद्या नहीं। विष्णुपुराण की बहुश्रुत पंक्ति है – तत्कर्म यन्न बंधनाय सा विद्या या विमुक्तये। आयासायापरम् कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्।। अर्थात् कर्म वही है, जो बंधन का कारण न बने और विद्या वही है, जो मुक्ति दिलाये। इसके अलावा किए जाने वाले सभी कर्म केवल थकान हैं और सभी विद्याएँ केवल शिल्प-नैपुण्य है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







