बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय तक भारतीय राजनीति में ऐसे नेता के रूप में पहचाने जाते रहे हैं, जिन्होंने परिवारवाद के विरुद्ध स्पष्ट और मुखर रुख अपनाया। उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण आधार यह रहा कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कई बार कहा कि लोकतंत्र में नेतृत्व का आधार व्यक्ति की योग्यता, अनुभव और जनसेवा होना चाहिए, न कि पारिवारिक पृष्ठभूमि। यही कारण था कि वे अक्सर उन राजनीतिक दलों और नेताओं की आलोचना करते रहे, जिनकी राजनीति परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। लेकिन हाल की घटनाओं ने उनकी इसी स्थापित छवि को नए सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। उनके पुत्र निशांत कुमार ने आठ मार्च को जनता दल (यूनाइटेड) की सदस्यता ग्रहण कर सक्रिय राजनीति में प्रवेश कर लिया। इस कदम के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या नीतीश कुमार भी अंततः उसी परिवारवादी राजनीति की ओर बढ़ गए हैं, जिसकी वे लंबे समय से आलोचना करते रहे थे?
नीतीश कुमार स्वयं को समाजवादी परंपरा का नेता मानते रहे हैं। वे अक्सर बिहार के महान समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर को अपना राजनीतिक आदर्श बताते हैं। कर्पूरी ठाकुर का नाम भारतीय राजनीति में सादगी और सिद्धांतों के प्रति दृढ़ता के लिए लिया जाता है। उनकी एक बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया। नीतीश कुमार कई मौकों पर यह कहते रहे हैं कि उन्होंने भी उसी आदर्श का पालन किया है। जनवरी 2024 में कर्पूरी ठाकुर की जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि कर्पूरी जी ने कभी अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाया और उनकी प्रेरणा से उन्होंने भी अपने परिवार को राजनीति से दूर रखा। यह बयान केवल श्रद्धांजलि भर नहीं था, बल्कि उनकी राजनीतिक पहचान का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। परिवारवाद के मुद्दे पर नीतीश कुमार के कई बयान राजनीति में चर्चा का विषय बने। पाँच जून 2018 को उन्होंने कहा था कि आज के समय में कई युवा अपनी क्षमता के आधार पर राजनीति में नहीं आते, बल्कि परिवार के कारण आगे बढ़ते हैं। यह टिप्पणी उस समय बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव के उभार के संदर्भ में देखी गई थी।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने राजद की राजनीति पर हमला करते हुए कहा था कि वे पूरे बिहार को अपना परिवार मानते हैं, जबकि कुछ लोग केवल अपने खून के रिश्तों को ही परिवार समझते हैं। यह बयान सीधे तौर पर लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार पर राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देखा गया।
दरअसल बिहार की राजनीति में परिवारवाद की चर्चा आते ही सबसे अधिक उदाहरण लालू प्रसाद यादव के परिवार का दिया जाता है। राजद में उनके परिवार के कई सदस्य सक्रिय राजनीति में हैं—पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव तथा बेटी मीसा भारती। यही कारण है कि नीतीश कुमार अक्सर राजद को परिवार केंद्रित पार्टी बताते रहे हैं और अपनी पार्टी को उससे अलग बताते रहे हैं।
परिवारवाद पर उनकी आलोचना केवल क्षेत्रीय दलों तक सीमित नहीं रही। 2017 में जब राहुल गाँधी ने अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि भारत की राजनीति में परिवारवाद एक सामान्य बात है और उन्होंने कुछ नेताओं के उदाहरण भी दिए थे, तब नीतीश कुमार ने इस बयान का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि परिवारवाद को सामान्य मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही नहीं है। उनके अनुसार किसी राजनीतिक परिवार में जन्म लेने से कोई व्यक्ति स्वतः शासन करने के योग्य नहीं हो जाता।
इसी पृष्ठभूमि में अब निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री को देखा जा रहा है। पिछले लगभग एक वर्ष से यह चर्चा चल रही थी कि वे राजनीति में आ सकते हैं। इस चर्चा की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने अपने पैतृक गाँव में एक कार्यक्रम के दौरान लोगों से अपील की कि उनके पिता के कामों के आधार पर उन्हें समर्थन दिया जाए। यह पहली बार था जब वे सार्वजनिक रूप से राजनीतिक रूप से सक्रिय दिखाई दिए। इसके बाद जदयू के कुछ नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से यह कहना शुरू किया कि पार्टी के कार्यकर्ता चाहते हैं कि निशांत कुमार राजनीति में आएं। धीरे-धीरे यह संकेत स्पष्ट होता गया कि पार्टी के भीतर उनके लिए जगह बनाई जा रही है। अंततः 8 मार्च को उन्होंने औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। इस निर्णय के बाद विपक्षी दलों को स्वाभाविक रूप से नीतीश कुमार की आलोचना का अवसर मिल गया है। उनके विरोधियों का कहना है कि जो नेता वर्षों तक परिवारवाद के खिलाफ बोलते रहे, उन्होंने अंततः उसी रास्ते को स्वीकार कर लिया। इससे उनकी नैतिक और वैचारिक स्थिति कमजोर होती दिखाई देती है।
हालाँकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस घटना को अलग दृष्टि से भी देखते हैं। उनका मानना है कि यह निर्णय केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। बिहार की राजनीति में पिछले लगभग दो दशकों से नीतीश कुमार केंद्रीय भूमिका में रहे हैं। लेकिन उनकी उम्र और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह सवाल उठने लगा था कि जनता दल (यू) का भविष्य का नेतृत्व कौन करेगा? ऐसे में संभव है कि निशांत कुमार की एंट्री को पार्टी के भविष्य की रणनीति के रूप में देखा जा रहा हो।
फिर भी यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि नीतीश कुमार की राजनीति का एक बड़ा नैतिक आधार यह रहा है कि उन्होंने अपने परिवार को सत्ता से दूर रखा। इसी कारण वे परिवारवादी राजनीति के विरोध में नैतिक बढ़त हासिल करते रहे। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदलती दिखाई दे रही हैं। भारतीय राजनीति में आदर्श और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष नया नहीं है। अनेक नेता सिद्धांतों की बात करते रहे हैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के दबाव में उनके निर्णय बदलते रहे हैं। नीतीश कुमार का हालिया कदम भी शायद इसी राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा है। फिर भी यह सवाल आने वाले समय में बार-बार उठेगा कि क्या अब नीतीश कुमार उसी दृढ़ता के साथ परिवारवाद के खिलाफ बोल पाएंगे, जैसा वे पहले बोलते रहे हैं। क्योंकि राजनीति में केवल निर्णय ही नहीं, बल्कि उन निर्णयों से बनने वाली छवि भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री से बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। लेकिन साथ ही यह घटना उस बहस को भी फिर से जीवित करती है कि लोकतंत्र में परिवारवाद को लेकर नेताओं की कही गई बातों और उनके व्यवहार के बीच कितना अंतर होता है। यही अंतर किसी भी राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता को तय करता है।

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







