
"उम्मीद है कि सरकारी विश्वविद्यालयों को अपदस्थ कर जल्द ही गलगोटिया विश्वविद्यालय हमारे सिर पर नाचेगा और हमें अपार प्रसन्नता होगी कि अब हमारे बच्चे गलगोटिया-चेतना से लैस होंगे।" इसी आलेख से

"देश के सिस्टम में भी अंग्रेजी का बोलबाला है और बिहार के बच्चों को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति बेवकूफ बना रही है। अगर पूरे सिस्टम में भारतीय भाषाओं का वर्चस्व हो तो आप अंग्रेजी के बिना भी काम चला सकते हैं, लेकिन जब कुएं में ही भंग पड़ी हो तो भंग से परहेज़ करना मुश्किल है।" - इसी आलेख से

"राजभवन को लोकभवन बना दिया गया, मगर उसकी कार्यशैली में क्या अंतर आया? अंग्रेजों के ये लाट साहब आजादी के बाद भी लाट ही बने रहे।" - इसी आलेख से

"शिक्षा बीच बाजार में खड़ी है। हर स्तर की डिग्री का मोल भाव हो रहा है। यहाँ तक कि सरकारी विश्वविद्यालयों की हालत कम खराब नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ नारों में सिमट गई है।" - इसी आलेख से

"मोदी जी का सपना है कि 6G कि अगुवाई भारत करेगा। साथ ही 5G भारत में सबसे तेजी से फैल रहा है। सरकार क्या यह अपनी उपलब्धि बता रही है? पूरा का पूरा टेलीकॉम सेक्टर निजी हाथों में है।" - इसी आलेख से

शिक्षा, जो ऐतिहासिक रूप से सामाजिक पुनरुत्पादन और नागरिक चेतना के निर्माण का माध्यम रही है, नवउदारवादी पूँजीवाद के चरण में एक ऐसी वस्तु में रूपांतरित की जा रही है जिसे बाज़ार में खरीदा–बेचा जा सकता है। राज्य, जो शिक्षा के माध्यम से सामाजिक समानता और पुनर्वितरणकारी न्याय की भूमिका निभाने वाला कारक था, अब पूँजी के हितों के अनुरूप अपनी जिम्मेदारियों का स्थानांतरण कर रहा है। इस प्रक्रिया में नागरिक श्रम–शक्ति के वाहक और ऋणग्रस्त उपभोक्ता में बदलता जा रहा है, जबकि कॉर्पोरेट शिक्षा के क्षेत्र में मूल्य–अधिशेष के नए स्रोत के रूप में स्थापित हो रहा है।

"हम एक आर्थिक इकाई का गठन करते हैं। मान लीजिए हम उसे नाम देते हैं — आदर्शपुर पब्लिक पालिका।------- इस इकाई के पास अब बजट बनाने की क्षमता और पैसे दोनों होंगे। पब्लिक इस इकाई से स्कूल और हॉस्पिटल माँगेगी। जन-प्रतिनिधि आदर्शपुर नगर पालिका के साथ मिलकर सरकारी स्कूलों में हर जरूरी संसाधन की आपूर्ति करेगी। इस स्कूल में पढ़ रहे हर बच्चे का पिता इस संस्था का स्टेकहोल्डर होगा। ---।" - इसी आलेख से

"अगर शिक्षा का निजीकरण इसी रफ़्तार से चलता रहा तो डिग्री सब के पास होगी, पर पढ़ा-लिखा, शिक्षित-दीक्षित कोई नहीं होगा।" - इसी आलेख से

"विक्रमशिला हो, या तक्षशिला, उस समय के अनुसार उत्तम शिक्षा दे रही थे। धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति फल-फूल रही थी। इसलिए नहीं कि किसी देवी-देवता का वरदान था। हम ही थे जो मंदिर को सुंदर बना रहे थे। कला समृद्ध हो रही थी। संगीत की शाला थे मंदिर, मधुर भजन मन को शांत करती थी।" इसी आलेख से

"हम सबको मिलकर शिक्षा के बारे में सोचना ही होगा। एक ऐसी शिक्षा, जो जानवरों को ऐसा इंसान बना सके, जिसे जानवरों से भी सहानुभूति हो। यहाँ तो जानवरों के नाम पर भी भ्रष्टाचार चल रहा है, और नारे लग रहे हैं कि धर्म ख़तरे में है। होगा ही। जहाँ जीवन ख़तरे में हो, वहाँ धर्म पर दुधारी तलवार तो लटकती ही रहेगी।" - इसी आलेख से