सुबह से ही पसीना जारी है। सूरज और मौसम कुछ ज़्यादा ही गर्म है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल में कैमरा लेकर नौका विहार कर रहे हैं। उधर उनके गहरे मित्र डोनाल्ड ट्रंप भारत को नर्क बता रहे हैं। नौका विहार के आनंद में डोनाल्ड ट्रंप की गाली भी सुहानी लगती है। इस देश का नेतृत्व कितना नीचे गिर चुका है कि ट्रंप कुछ भी कह दे, लेकिन इनके होंठ सिले रहते हैं।
वैसे प्रधानमंत्री का नौका विहार भी सुमित्रानंदन पंत का नौका विहार नहीं है। वे यहाँ भी वोट का व्यापार कर रहे हैं। बेचारे को कितना काम करना पड़ता है। मजा के लिए थोड़ा-सा जो भी वक़्त होता है, वह भी व्यापार की भेंट चढ़ जाता है। उन्हें बार-बार रूप परिवर्तन करना पड़ता है। पूर्वी भारत में वे गोरे हो जाते हैं, तो दक्षिण भारत में साँवले। वोट के लिए उन्हें मुँह रंगाना पड़ता है। जिसके पास करने के लिए कुछ न रह जाए, उनके लिए रूप-परिवर्तन बहुत ज़रूरी है। संसद में वे ओबीसी हो जाते हैं। संसद से बाहर कट्टर हिन्दू बन जाते हैं। देश के बाहर वे बुद्ध और गांधी को पुकारने लगते हैं। क्या युग आया है?
गृह मंत्री अमित शाह फ़ुरसतिया आदमी हैं। उन्होंने अपना लंगर बंगाल में खोल दिया है। वहाँ वे निहायत गुंडे की भाषा बोल रहे हैं- ‘अगर अमुक जगह पर बदमाशी की तो उल्टा लटका दूँगा।’ गृह मंत्री को जब क़ानून पर भरोसा नहीं है, तो आम लोग क़ानून पर क्यों विश्वास करे? गृह मंत्री का काम उल्टा लटकाने का है? किसी ने लिखा कि इस देश को न प्रधानमंत्री की ज़रूरत है और न गृह मंत्री की। यह देश अपने आप चलेगा। दोनों के पास दो काम रह गया है कि एक – विपक्षी सरकार को कैसे गिराया जाए और विपक्षी नेताओं को कैसे ईडी की गिरफ़्त में लाया जाय? और दूसरे डरा-धमका कर या देश का संसाधन पूँजीपतियों के हवाले कर पैसा कैसे बीजेपी के ख़ज़ाने में जमा किया जाय?
गोरे-चिट्टे, चिकने-चुपड़े राघव चड्ढा को आम आदमी पार्टी ने सांसद बनाया। संसद में उप नेता बनाया। फिर केजरीवाल और चड्ढा के रिश्ते बेमेल हो गए। चड्ढा को हटा कर अशोक कुमार मित्तल को उप नेता बनाया। उप नेता बनते ही ईडी उनके घर पहुँच गई। चड्ढा, मित्तल और अन्य पाँच सांसदों ने बीजेपी की चड्डी पहन ली। केजरीवाल की होशियारी और धूर्तता काम न आई ।
आरएसएस ने इनका खूब इस्तेमाल किया। केजरीवाल, अन्ना हजारे बीजेपी-आरएसएस कीं सीढ़ियाँ थे। दीवार पर वे चढ़ चुके हैं। अब सीढ़ियों को गिराने में कोई हानि नहीं है। केजरीवाल ने संसद में ज़्यादातर रसूखदार आदमी को सांसद बनाया। नाम आम आदमी का और काम ख़ास आदमी का। वैसे सातों सांसदों में ग़ैरत होती तो वे इस्तीफ़ा देकर बीजेपी में शामिल होते। राजनीति के शब्दकोश में ग़ैरत और नैतिकता जैसे शब्द रहे नहीं।
राघव चड्ढा ने भगवा चड्डी तो पहन ली है। पहले बीजेपी को गाली देते थे। अब उनकी शरण में हैं। एक गाना है- ‘ ना ना करते, प्यार तुम्हीं से कर बैठे । करना था इंकार, मगर इकरार तुम्हीं से कर बैठे।’ चड्ढा के गोरे चेहरे पर कालिख तो लग ही गई है। चड्ढा जैसे लोगों को ‘आनंद’ फ़िल्म का डायलॉग याद रखना चाहिए- ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं।’

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






