
सड़कों के किनारे बसे हुए लोग केवल झुग्गी-झोपड़ियाँ ही नहीं खड़ी करते, बल्कि अपने लिए रोज़ी-रोजगार भी खड़े करते हैं। जब सरकार शहर की सफाई के नाम पर झोपड़ियों को उजाड़ती है तो केवल झोपड़ी नहीं उजड़ती है, बल्कि उन ग़रीबों का रोज़गार भी उजड़ता है।

"आजादी के बाद जनता कमजोर हुई है और तंत्र मजबूत हुआ है। लोकतंत्र के लिए यह बड़ा खतरा है। तंत्र की मजबूती के बाद शक्तियों का केंद्रीकरण होता है और यह शक्तियां एक व्यक्ति में निहित हो जाती हैं । इस प्रक्रिया में जनता पीछे छूटती जाती है।" - इसी आलेख से

"यह भयावह वक्त है, जब मृत्यु से भी मुनाफा कमाया जा रहा है और मजा यह है कि देश में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो मृत्योत्सव का समर्थन भी करते हैं और जयकारे भी लगाते हैं।" - इसी लेख से

"डॉ लोहिया ने कहा था कि पांच सालों तक जिंदा कौमें इंतजार नहीं करतीं। सच पूछिए तो जिंदा कौमें की एक शमां तो बननी चाहिए।" - इसी लेख से
प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक 2024 के द्वारा अभिव्यक्ति के अधिकार पर शिकंजा

यही लोकतंत्र है. राजतंत्र और लोकतंत्र में बहुत फर्क नहीं है. प्रवृत्ति वही है, प्रक्रिया में थोडा-सा बदलाव करके झाँसा उत्पन्न किया गया है. राजतंत्र में जहाँ सामंतों और सैनिकों के बल पर जनता में दहशत उत्पन्न करके सिंहासन पर काबिज हुआ जाता है, वहीँ लोकतंत्र में पूँजीपतियों, अपराधियों के बल पर जनता की भावनाओं और संवेदनाओं को नियंत्रित करके समर्थन प्राप्त कर लिया जाता है.