हमारी शिक्षा-व्यवस्था कैसी हो?

"भारत की शिक्षा को केवल ‘स्मार्ट क्लास’ नहीं चाहिए, बल्कि मानवीयता, वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक संस्कृति, सामाजिक न्याय और बौद्धिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है।" - इसी आलेख से

शिक्षा का अर्थ किताब देखकर पढ़ लेना, याद करके निबंध लिख लेना या पहाड़ा रट लेना मात्र नहीं है। दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा-पद्धति इतना भी नहीं कर पा रही है। जब दुनिया एआई, ऑटोमेशन, डिजिटल मीडिया आदि पर शिफ्ट हो रही है; जब जॉब मार्केट में सर्टिफिकेट के बदले ज्ञान की आवश्यकता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है; जब दुनिया में जलवायु संकट, मानसिक स्वास्थ्य, फेक न्यूज़, असमानता, लोकतांत्रिक संकट, सांप्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण, युद्ध आदि बढ़ते जा रहे हैं; तब भी हमारे अच्छे-से-अच्छे स्कूल बच्चों को प्रश्नोत्तर रटना सिखा रहे हैं, परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं और नौकरी के लिए ही तैयार कर पा रहे हैं। हमने शिक्षा का इतना ही अर्थ समझा है। हमारी व्यवस्था इसके आगे नहीं देख पा रही है, जबकि दुनिया के विकसित देशों की शिक्षा-पद्धति इससे आगे जा चुकी है। इसलिए यदि हमने जल्दी नहीं की तो फिर बहुत देर हो जाएगी।

शिक्षा में सुधार के नाम पर हम पुस्तकों के नाम और उसके कुछ पाठों को बदलते हैं (अधिकतर मामलों में जिसका उद्देश्य अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति भर होता है); मैट्रिक या स्नातक कितने वर्षों में किया जा सकता है, यह निर्धारित करते हैं; ऐसे आयोग या समितियाँ गठित करते हैं, जिनकी अनुशंसाएँ उनके गठन के पूर्व ही निर्धारित कर ली जाती हैं; किताबों को छोड़कर मोबाइल या टेबलेट पर छलाँग लगाने को आमूल-चूल परिवर्तन समझते हैं; नीतियों के नाम  पर निजीकरण, सांप्रदायिकता और केन्द्रीकरण का छद्म खड़ा करते हैं और सुधार के नाम पर प्रशासनिक भाग-दौड़ बढ़ा देते है। बेकार की इन क़वायदों से न तो शिक्षा का उद्देश्य बदलता है और न ही प्रक्रिया। यह सब पुरानी व्यवस्था को ही नए शब्दों में प्रस्तुत करना है, जैसे पुराने मकान को नए रंग से रंग देना। हमें वस्तुतः इन सतही, दिखावटी और राजनीतिक हितों की पूर्ति के उद्देश्य से किए गए बदलावों के बदले शैक्षिक संस्कृति में परिवर्तन के बारे में सोचना होगा। 

शैक्षिक संस्कृति के निर्माण के अभियान को हम निम्नलिखित बिंदुओं में देख-समझ सकते हैं –

हमारी वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था को राजसत्ता ने अपने अनुकूल गढ़ा है। इसलिए यह उसके कार्यालयी और व्यावसायिक हितों की पूर्ति करते हुए मुख्य रूप से तीन चीजें पैदा करती हैं – 1. परीक्षा देने वाले विद्यार्थी, 2. प्रतिस्पर्धा में उलझे हुए नौजवान और 3. आदेश मानने वाले कर्मचारी।

पंद्रह या इससे अधिक वर्षों तक पढ़ने-पढ़ाने का उद्देश्य एक ‘योग्य’ कर्मचारी पैदा कर लेना, बहुत ही सतही है। रोजगार-प्राप्ति के अतिरिक्त हमें ऐसे नागरिक तैयार करने पर बल देना चाहिए, जो सोच सकें, प्रश्न पूछ सकें, सह-अस्तित्व में समायोज्य हों, जिनमें लोकतांत्रिक चेतना हो, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न हों और जिनमें जीवन की वास्तविक समस्याओं को हल करने का कौशल हो। अर्थात् शिक्षा ऐसी हो, जो रोजगार-सृजन की क्षमता के साथ ही मानवीय, सामाजिक, लोकतांत्रिक मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न हो।

(क) रटंत शिक्षा कम करनी होगी 

जीवन में याद रखने का अपना महत्व है। परंतु हमारे बच्चे समझने से ज़्यादा रटकर याद कर लेने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं। वे विज्ञान की परिभाषाएँ रटते हैं, गणित के सूत्र रटते हैं, समाज विज्ञान और साहित्य के उत्तर रटते हैं, कोचिंग के नोट्स रटते हैं। वे उन परिभाषाओं, सूत्रों और उत्तरों को न तो समझ पाते हैं, न उसके लिए तर्क कर सकते हैं, न बहस करने की उन्हें अनुमति होती है और न ही उन्हें उसे जीवन से जोड़कर देखना सिखाया जाता है। 

शिक्षा की इस प्रचलित प्रक्रिया को बदलने के लिए हमें अपने पाठ्यक्रम में कम विषय रखने होंगे। आज हमारे बच्चे ‘बस्ते के बोझ’ से पीड़ित हैं। वे पढ़ते ज़्यादा हैं, समझते कम हैं। इसलिए ‘बस्ते के बोझ’ को उतारकर उन्हें इत्मीनान से विषय की गहराई में जाना सिखाना होगा। शिक्षकों के सिर पर समयबद्ध रूप से मोटी किताबों के सारे अध्यायों को पढ़ा देने का बोझ रहता है। इसलिए वे कक्षा को सरपट दौड़ाते हुए अंतिम अध्याय तक पहुँचा देते हैं। इसके ठीक उलट ‘कितना पढ़ाया’ के बदले बच्चे ‘कितना और क्या समझे’ पर ज़ोर देने की आवश्यकता है। इसके साथ ही हरेक अध्याय में चार बातें अनिवार्य रूप से जोड़ी जानी चाहिए – 

1. प्रोजेक्ट – हरेक अध्याय के अंत में बच्चों से उस पाठ पर प्रोजेक्ट बनवाना चाहिए, जिससे उस पाठ के बारे में बच्चों की समझ भी स्पष्ट हो और शिक्षक को भी पता चल सके कि बच्चा उस पाठ को कितना समझ सका है। 

2. स्थानीय उदाहरण – बच्चा जब तक पठित पाठ को स्थानीयता से जोड़कर देखना नहीं सीखता है, तब तक वह सतही जानकारी भर होता है, उसके जीवन का व्यावहारिक भाग नहीं हो पता।

3. चर्चा – प्रत्येक पाठ को पढ़ते-पढ़ाते समय उस विषय पर सामूहिक चर्चा आवश्यक होनी चाहिए। इससे बच्चा सीखता भी है, सोचता भी है और उसकी समझ भी विकसित होती है।

4. समस्या समाधान शामिल हो – प्रत्येक पाठ के अंत में समस्या-समाधान आवश्यक रूप से जुड़ा हो। इससे बच्चे की बौद्धिक क्षमता भी विकसित होती है और जीवन-कौशल का भी विकास होता है।

(ख) स्थानीय जीवन को पाठ्यक्रम में लाना होगा 

भारत में शिक्षा ऊपर से नीचे थोपी जाती है। स्थानीयता की तो बात ही नहीं करें, शिक्षा के समवर्ती सूची में रहने के बावजूद राज्यों की स्वायत्तता को भी धत्ता दिखा दिया जाता है। ‘एक देश, एक शिक्षा’ के राजनीतिक ग़ैर-शैक्षणिक एजेंडे पर पाठ्यक्रम को केन्द्रीकृत कर दिया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किए गए पाठ्यक्रम में स्थानीयता उपेक्षित हो जाती है। इसके कारण एक ओर तो बच्चे जीवन के साथ अपनी जानकारी का तादात्म्य स्थापित करने की क्षमता-संवर्धन से वंचित रह जाते हैं, दूसरी ओर अपने जीवन को समझने में असमर्थ रह जाते हैं। उदाहरणस्वरूप बिहार के गाँव के बच्चों को यूरोप की नदियों के नाम तो रटा दिए जाते हैं, लेकिन अपने गाँव या जिले की सिंचाई समस्या को समझने से वे आजीवन वंचित रह जाते हैं। 

इसमें परिवर्तन के लिए पहली आवश्यकता तो यह है कि पाठ्यक्रम स्थानीय स्तर पर, अर्थात् जिला स्तर पर बनाया जाना चाहिए। उस पाठ्यक्रम का 30 से 40% भाग स्थानीय हो। उस स्थानीयता में स्थानीय इतिहास, स्थानीय लोकभाषा, स्थानीय खेती, स्थानीय कौशल, जल संकट, स्थानीय उद्योग, लोककला, स्थानीय संस्कृति, स्थानीय भूगोल एवं जलवायु, स्थानीय संघर्ष आदि विषय-वस्तु में शामिल किया जाना चाहिए। इससे शिक्षा का जीवन के साथ जुड़ाव बढ़ेगा।

(ग) इतिहास और समाजशास्त्र को राजनीतिक प्रचार से बचना होगा 

इतिहास और समाजशास्त्र विषयों का उद्देश्य बच्चों में अपने अतीत और अपने समाज के प्रति आलोचनात्मक समझ विकसित करना है। इन विषयों का उपयोग किसी के महिमामंडन, घृणा के प्रसार, अतीत की पुनर्वापसी और संकुचित राष्ट्रवाद के लिए नहीं होना चाहिए। इसके बदले इन विषयों को पढ़ाए जाने का उद्देश्य बच्चों में विभिन्न दृष्टिकोणों का विकास, स्रोतों का विश्लेषण, सामाजिक संघर्षों के कारण और स्वरूप, संवैधानिक और लोकतांत्रिक अवधारणा, श्रम की महत्ता, धर्मों और जातियों का उदय और उनका ऐतिहासिक महत्व, सामाजिक और लैंगिक समानता आदि का बोध विकसित करना होना चाहिए।

(घ) पाठ्यक्रम में भविष्य के विषय जोड़ने होंगे 

हमारे विद्यालयों में एआई साक्षरता, मीडिया लिटरेसी, जलवायु शिक्षा, इमोशनल इंटेलिजेंस, डिजिटल नैतिकता आदि लगभग अछूते हैं, जबकि आने वाले समय में इनका महत्व लगातार बढ़ता जाएगा। इस तरह हमारी शिक्षा भविष्य के लिए सक्षम नागरिक तैयार करने की चिंता से लगभग बेपरवाह है। इसलिए भविष्य की परवाह करते हुए हमारे पाठ्यक्रमों में भविष्य को निर्धारित करने वाले विषय, जैसे इंटरनेट सुरक्षा, फेक न्यूज़ की पहचान, मानसिक स्वास्थ्य, वित्तीय साक्षरता, लैंगिक संवेदनशीलता, पर्यावरणीय जागरूकता, श्रम और काम की बदलती दुनिया आदि जरूरी विषयों का समावेश किया जाना चाहिए।

भारतीय शिक्षा-पद्धति में शिक्षक की भूमिका ‘कुंजी’ की तरह है। इसके बावजूद वे असमान वेतन, अस्थायी नियुक्तियाँ, पंजियों के संधारण और रिपोर्टिंग की व्यस्तता, राजनीतिक हस्तक्षेप, ग़ैर-शैक्षिक काम, अपमानजनक प्रशासनिक दबाव, उचित प्रशिक्षण का अभाव, असम्मानजनक परिस्थितियाँ, अनुत्प्रेरक वातावरण और रचनात्मक अवसर की गुंजाइश के अभाव में काम करने के लिए विवश होते हैं। ऐसे शिक्षकों से रचनात्मक शिक्षा की अपेक्षा करना कठिन है। दूसरी बात कि प्रशासनिक पदों पर प्रोन्नति के दरवाजे शिक्षकों के लिए प्रायः बंद रहते हैं। उन पदों पर ऐसे लोग बैठाए जाते हैं, जिनमें शिक्षा का व्यावहारिक अनुभव नहीं होता है। यह एक ऐसी स्थिति है कि काम करने आनेवाले को काम करने न आने वाले के निर्देशन में काम करना पड़ता है। शैक्षिक नीतियों और पाठ्यक्रमों के निर्धारण में भी धरातल पर काम करनेवाले शिक्षकों से प्रायः कोई राय नहीं ली जाती है, बल्कि वह ऊपर से थोपा जाता है। पाठ्यक्रम के मामले में तो शिक्षक की भूमिका ‘डाकिया’ से अधिक नहीं रहने दी गयी है। एक बेहतर शैक्षिक व्यवस्था के लिए शिक्षक व्यवस्था में हमें क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है। इसके लिए –

(क) शिक्षक को ‘क्लर्क’ बनाना बंद करना होगा 

सर्वे, चुनाव, डेटा इंट्री, जनगणना आदि कार्यों में भागीदारी से शिक्षा का कार्य नष्ट होता है। इसके बदले पढ़ाने, तैयारी करने, बच्चों को समझने और समझाने, अभिभावकों के साथ संवाद करने, शोध-कार्य करने आदि में शिक्षकों का समय लगना चाहिए।

(ख) शिक्षक प्रशिक्षण पूरी तरह बदलना होगा 

शिक्षक प्रशिक्षण औपचारिक, वास्तविकता से कटा हुआ और कई बार तो नक़ली होता है। इसे रोकने और बदलने की जरूरत है। प्रशिक्षण में किताबी जानकारी और व्यवहारिक प्रशिक्षण का असंतुलन दूर करना होगा। प्रत्येक पाठ का क्लासरूम प्रशिक्षण आवश्यक हो। प्रशिक्षण में देखा जाना चाहिए कि सैद्धांतिक ज्ञान का व्यावहारिक रूपांतरण हो सका है या नहीं और शिक्षार्थी बाल मनोविज्ञान, बहुभाषी शिक्षा, समावेशी शिक्षा, तकनीक के विवेकपूर्ण प्रयोग, संवाद, कला, खेल आदि आधारित शिक्षण, छात्रों की शैक्षिक समस्याओं के निवारण और विद्यालय की प्रशासनिक समस्याओं को सुलझाने में दक्ष हो सका है या नहीं।

(ग) शिक्षक की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ानी होगी

फिनलैंड आदि देशों में शिक्षक उच्च प्रतिष्ठित, सम्मानित और स्वायत्त होते हैं। इसके ठीक उलट हमारे यहाँ शिक्षक राजनीतिक दबाव में काम करते हैं, अफसरशाही के नियंत्रण में रहते हैं और सामाजिक अविश्वास का शिकार बनते हैं। जब तक शिक्षक को, भाषण में, ‘राष्ट्र निर्माता’ और व्यवहार में ‘निम्न कर्मचारी’ माना जाता रहेगा, तब तक सुधार के सारे प्रयास अधूरे रहेंगे

(घ) वेतन और संवर्गीय असमानता 

शिक्षक राष्ट्र के निर्माता होते हैं। यह राष्ट्र सामाजिक आर्थिक असमानता से पीड़ित रहा है। उसी तरह शिक्षकों का वर्ग भी वेतन और संवर्गीय असमानता से पीड़ित है। तो जो शिक्षक स्वयं असमानता के दंश झेल रहा हो, वह सामाजिक समानता लाने के औजार की तरह काम करेगा, यह अपेक्षा ही बेमानी है। इससे शैक्षणिक वातावरण पर बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भारत में शिक्षा का वास्तविक नियंत्रक पाठ्यक्रम नहीं, परीक्षा है। जब तक परीक्षा रटंत, स्पीड और नंबर पर आधारित रहेगी, तब तक शिक्षा नहीं बदलेगी। इसके लिए निम्न बदलाव आवश्यक हैं –

(क) बोर्ड परीक्षा का स्वरूप बदले – केवल तीन घंटे की परीक्षा से बच्चे का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। इसके लिए साल भर का पोर्टफोलियो तैयार करना चाहिए। बच्चों का आकलन प्रोजेक्ट, प्रस्तुति, समूह कार्य, व्यावहारिक कार्य आदि के आधार पर होना चाहिए।

(ख) ‘फेल’ संस्कृति ख़त्म हो – बच्चे असफल नहीं होते हैं, बल्कि प्रणाली असफल होती है। लेकिन प्रणाली अपनी कमी को बच्चे के ऊपर डालती है। इससे बच्चों में भय, हीनता का बोध घर कर जाता है तथा इससे छीजन में भी वृद्धि होती है। इसलिए मूल्यांकन का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, अपमान नहीं।

(ग) कोचिंग संस्कृति को नियंत्रित करना होगा – भारत में शिक्षा, धीरे-धीरे, स्कूल से कोचिंग मॉडल बनती जा रही है। इससे अवसर की असमानता, आर्थिक असमानता और मानसिक दबाव बढ़ता है तथा बच्चे की रचनात्मकता का विनाश हो जाता है।

(क) भयमुक्त वातावरण – अनेक विद्यालयों में डाँट, अपमान, हिंसा, तुलना आदि का वातावरण होता है। ऐसे भयजनक वातावरण में सीखना नामुमकिन होता है।

(ख) प्रश्न पूछने की संस्कृति – हमारे अधिकांश बच्चे प्रश्न नहीं पूछते हैं। क्लासरूम शिक्षण प्रायः एकतरफा होता है। इसका कारण बचपन से ही उन्हें ‘चुप रहो’, ‘बहुत बोलते हो’, ‘बहस मत करो’ आदि सिखाकर जिज्ञासा की प्रवृत्ति का अंत कर देते हैं और उनके भीतर भय उत्पन्न कर देते हैं। यह बच्चे के सीखने में बाधक तो बनता ही है, एक कमजोर लोकतंत्र को भी विकसित करता है; क्योंकि ज्ञान और लोकतंत्र का विकास प्रश्नों पर ही टिका होता है

(ग) समग्र विकास और हरदम सीखने का वातावरण – विद्यालय का पाठ्यक्रम इस तरह निर्धारित किया जाना चाहिए, जिससे बच्चे का सर्वांगीण शारीरिक-मानसिक विकास संभव हो। इसके लिए विद्यालय में, कक्षाओं की व्यवस्था किए जाने की तरह ही, इंडोर और आउटडोर गतिविधियों के लिए पर्याप्त संसाधन और स्थान उपलब्ध हो। विद्यालय की सभी गतिविधियों का उद्देश्य बच्चों का सीखना हो। खेल, संगीत, कला, हस्तकला आदि समस्त सह-पाठ्यक्रमों में भाग लेने के बाद बच्चे अपने अनुभव बतायें।

(घ) पुस्तकालय संस्कृति विकसित करनी होगी

पढ़ने की आदत शिक्षा की आत्मा है। परंतु अधिकांश स्कूलों में पुस्तकालय या तो नहीं हैं या बंद पड़े हैं। इसलिए प्रत्येक स्कूल में खुला पुस्तकालय हो, जिसमें कहानी, विज्ञान, जीवनी, कविता, कॉमिक,स्थानीय साहित्य आदि की पुस्तकें आवश्यक रूप से हों। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बच्चे उन किताबों को पढ़ रहे हैं और उस पर बातचीत भी कर रहे हैं।

भारत में अंग्रेज़ी को ‘प्रतिष्ठा’ और मातृभाषा को ‘हीनता’ से जोड़ दिया गया है। इससे बच्चे न अपनी भाषा में दक्ष हो पाते हैं और न ही अंग्रेज़ी में। इसलिए प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा/स्थानीय भाषा हो। बाद में उच्च गुणवत्ता वाली अंग्रेजी को भी विषय के रूप में पढ़ाया जा सकता है।

शिक्षा को तकनीक बेहतर बना सकती है, लेकिन केवल टैबलेट बाँट देने से शिक्षा आधुनिक नहीं होती। तकनीकी शिक्षा के लिए  विद्यालयों में डिजिटल लैब, ओपन एजुकेशनल रिसोर्स, AI आधारित व्यक्तिगत सहायता, वर्चुअल प्रयोगशाला, ऑनलाइन पुस्तकालय आदि होने चाहिए। लेकिन इसके लिए स्क्रीन समय नियंत्रण, डिजिटल आलोचनात्मक सोच, डेटा गोपनीयता आदि भी सिखानी होगी।

हमारी शिक्षा-व्यवस्था में अजीब विरोधाभासी विडंबना है कि गरीब का बच्चा भूखा रहता है, कुपोषित होता है, उसके घर में पढ़ाई का वातावरण नहीं होता है, वह ख़ुद भी श्रम करता है, जातीय अपमान झेलता है; फिर हम उससे उस ‘प्रतिस्पर्धा’ में सफल होने की अपेक्षा करते हैं, जिसमें साधन-संपन्न परिवारों के बच्चे शामिल होते हैं। इसलिए शिक्षा सुधार का मतलब केवल स्कूल सुधार नहीं है। बल्कि इसके साथ ही पोषण, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय, लैंगिक सुरक्षा, समान अवसर, सार्वजनिक परिवहन, इंटरनेट पहुँच जैसे मसले भी जुड़े हुए हैं।

आज कई जगह वास्तविक शिक्षा से अधिक रिपोर्टिंग और ऐप अपडेट महत्वपूर्ण हो गया है। शिक्षक उसी में अधिक उलझे रहते हैं। यह रिपोर्टिंग और ऐप आद्यतनीकरण उनके कैरियर और प्रशासनिक दंड से जुड़ा होता है। इसलिए वह उनकी प्राथमिकता हो जाती है और उस डेटा को अच्छा बनाना उनका उद्देश्य हो जाता है। लेकिन डेटा का अच्छा होना शिक्षा अच्छी होने की गारंटी नहीं होती

भारत में कला ‘एक्स्ट्रा’, खेल ‘समय की बर्बादी’,और श्रम ‘निम्न’ समझा जाता है। यह दृष्टि बदलनी होगी। बच्चों को बागवानी, स्थानीय शिल्प, नाटक, संगीत, सामुदायिक कार्य से जोड़ा जाना चाहिए। इससे हाथ, दिमाग और समाज तीनों का संबंध बनेगा।

भारत की शिक्षा बच्चों को जल्दी ‘अनुकूल’ बना देती है। छोटा बच्चा हर चीज़ पूछता है, कल्पना करता है और प्रयोग करता है। लेकिन कुछ वर्षों के बाद वही बच्चा चुप रहता है, डरा हुआ रहता है और परीक्षा-केंद्रित हो जाता है। इस तरह हम बच्चों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति का अंत कर देते हैं। यह केवल शैक्षिक समस्या नहीं, सभ्यता (व्यवस्था) की समस्या है।

पड़ोस के विद्यालय से अभिप्राय बस्ती के एक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक विद्यालय और तीन किलोमीटर के दायरे में माध्यमिक विद्यालय हो और उस दायरे में निवास करने वाले सभी अभिभावकों के बच्चे उसी स्कूल में पढ़ें। यह नियम केवल राज्य सरकार के विद्यालयों पर ही लागू नहीं हो, वरन् केन्द्रीय एवं निजी विद्यालयों पर भी सख्ती से लागू हो। इससे असमानता के प्रश्न का हल होने के साथ ही विद्यालय का वातावरण और पठन-पाठन भी बेहतर हो सकेगा।

अधिकांश विद्यालयों में संसाधनों एवं मैदान का बेतरह अभाव है। वास्तव में उन्हें विद्यालय कहना ही नहीं चाहिए। ऐसे विद्यालयों में बच्चों का बेहतर विकास असंभव है। समान स्कूल प्रणाली का अभिप्राय है कि सभी विद्यालयों में शिक्षा अधिकार में चिह्नित किए गए संसाधन न्यूनतम रूप से उपलब्ध हो। ऐसा नहीं करना शिक्षा अधिकार, समानाधिकार, मानवाधिकार और मानव गरिमा के संवैधानिक निर्देशों को ठेंगा दिखाना है।

बच्चा स्कूल न आता है, नहीं सीखता है या उसका छीजन हो गया है – शिक्षा व्यवस्था में इन बातों के लिए कोई उत्तरदायी नहीं है। शिक्षा में जवाबदेही (Accountability) का घोर अभाव है। यह जवाबदेही कई स्तरों पर निर्धारित की जानी चाहिए।

भविष्य की आदर्श शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें विद्यालय सभी आवश्यक साधनों से संपन्न हों, सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की व्यवस्था हो, छीजन नगण्य हो, समाज का अपने विद्यालय पर विश्वास हो, जीवंत शैक्षिक वातावरण हो, शिक्षक आदेशपालक मशीन न हों, पुस्तकालय जीवित हो, विज्ञान प्रयोग से पढ़ाया जाए, इतिहास बहस से, भाषा साहित्य संवाद से, गणित जीवन से जुड़कर, तकनीक विवेक के साथ और शिक्षा मनुष्य को ‘अधिक मनुष्य’ बनाए। 

भारत की शिक्षा को केवल ‘स्मार्ट क्लास’ नहीं चाहिए, बल्कि मानवीयता, वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक संस्कृति, सामाजिक न्याय और बौद्धिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है।

यदि शिक्षा केवल बाज़ार के लिए मनुष्य तैयार करेगी, तो समाज तकनीकी रूप से आधुनिक, लेकिन नैतिक रूप से खोखला हो सकता है। लेकिन यदि शिक्षा सोचने और न्याय की क्षमता विकसित करेगी, तो वही भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनेगी।

यहाँ कहीं गयी अनेक बातें शिक्षाशास्त्र की पुस्तकों और सरकारी क़ानूनों में लिखी हुई हैं। जरूरत, वर्तमान और भविष्य को दृष्टि में रखते हुए, उन्हें जीवंत करने की है।

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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
Dr. Anil Kumar Roy

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डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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