खबर आई है कि इसरो का लगातार दूसरा मिशन असफल रहा। जाना था जापान, पहुँच गए चीन, समझ गए ना। भारत का एक भी विश्वविद्यालय विश्व के श्रेष्ठ ५०० संस्थाओं में नहीं आता है। समझे! मिशन फेल क्यों हुए जा रहे हैं? जब कोई अच्छा से पढ़ेगा ही नहीं तो अच्छी तकनीक कैसे बनाएगा। घंटा बजाने से भूत भाग जाएगा?
अजीब विडंबना है। जहाँ परिकल्पना करनी है, वहाँ हम कल्पना कर रहे हैं। जहाँ सपने बुनने हैं, वहाँ हम विज्ञान ढूँढ रहे हैं। देश के सांसद कहते हैं कि हनुमान जी दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री थे। राइट्स ब्रदर से पहले ही हमारे पास पुष्पक विमान था। आदिकाल में नहीं, ये लोग काल्पनिक-काल में जी रहे हैं। मैं तो जब बच्चा था, तब भी मुझ से पूछा जाता था कि भारत के दो सबसे बड़े महाकाव्यों का नाम बताओ। और मैं कहता था — महाभारत और रामायण। सामान्य ज्ञान के मास्टर साहब मुझे शाबाशी देते थे। कभी इतिहास की कक्षा वाली मैडम ने हमें राम के बारे में नहीं पढ़ाया। हाँ! उन्होंने बाबरी कांड के बारे में यह जरूर पढ़ाया था कि धर्म की लड़ाई में मरते बस लोग ही हैं। अपने भी, पराए भी। यही तो हर युद्ध में होता है। मेरी तो समझ यही नहीं आता कि लोग लड़ते क्यों है?
गीता में कृष्ण कहते हैं कि जो भी तुम्हारे कर्म हो, सब मुझे अर्पित कर दो। गीता तो महाभारत का दर्शन मात्र है, कृष्ण क्या व्यास मुनि की रचना नहीं हैं? गीता भी तो मुनि ने लिखी होगी। पहली बार जब मैंने गीता पढ़ी तो कृष्ण का किरदार मुझे बड़ा स्वार्थी लगा। जो मैं करूँ, सब उन्हें क्यों दे दूँ? मेरा बुरा भी वे लेंगे क्या? फिर मैंने गांधी को पढ़ा, पहली बार में लगा वे भी बड़े स्वार्थी थे। जो उन्हें सही लगता, वही सही। उनकी जिद्द में उनका अपना परिवार झुलस गया। बड़ा विवाद है नेहरू का परिवार गांधी कैसे हो गया। हो गया तो हो गया। आप भी अपने बच्चे का सरनाम गांधी रख लो। आख़िर वे देश के पिता हैं। हर किरदार में कुछ कमी तो होती ही है। मुझमें भी हैं।
अपनी कमियों को तलाशता में वापस व्यास मुनि और गांधी जी की शरण में पहुँचा। गीता को मैंने लगातार कई बार पढ़ा। गांधी की जीवनी को भी दुबारा पढ़ा। तब बात कुछ कुछ समझ आई। फिर धम्मपद भी पढ़ा। जो समझ आया उसे मैंने एक कविता में लिख डाला। कविता का शीर्षक है —
नया कुरुक्षेत्र
कुरुक्षेत्र में अर्जुन निहत्था आया,
गांडीव वह घर भूल आया,
कृष्ण ने कहा चल बाण उठा,
निशाना लगा,
धर्म कहता है,
अपने परायों में भेद ना कर,
तू जा कुरुक्षेत्र में प्रियजनों का भी संहार कर,
यही धर्म है तेरा,
जा लड़ मर,
तू क्षत्रिय है, भूल मत!
वह शूद्र है,
जो धर्म नहीं निभाता,
नरक जाता है,
देख इस भारत की रणभूमि में,
तू धर्म की रक्षा कर,
जीत से अपना श्रृंगार कर,
योद्धा है तू मत भूल!
गीता का सार है,
तू कर्म कर,
फल की ना तू चिंता कर,
ना ही उस पर कोई चिंतन कर,
सामने जो है,
वही तेरा दुश्मन है,
तू जा उसका वध कर।
अफ़सोस! इस भारत में अर्जुन निहत्था आया,
उसे क्या पता था,
वह गीता या द्रौपदी की नहीं,
सीता की रक्षा करने आया है,
राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,
बाक़ी सब क्या मर्द भी नहीं हैं?
फिर भी राम राज्य में,
सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी?
आज तो माँ-बहनों का सरेआम चीरहरण चालू है।
अब राम तो आए नहीं,
आग से सीता को बचाने,
अर्जुन बेचारा नए कुरुक्षेत्र में क्या उखाड़ लेता?
तो उसने बाबरी मस्जिद गिरा डाली,
सीता की परीक्षा तो महाभारत से पहले ही हो चुकी थी,
द्रौपदी को भी कौन बचा पाया?
गीता कैसी है?
कौन पढ़ता है?
धर्म क्या है?
कौन जानता है?
राम के राज्य में जब सीता सुरक्षित नहीं थी,
इस भारत में कौन बचेगा?
ना गीता के सार से,
ना कृष्ण की पुकार से,
ना कौरवों की ललकार से,
ना ही कुरुक्षेत्र के हाहाकर से,
अर्जुन मजबूर है,
वह गांडीव ही घर भूल आया,
कैसे लड़ेगा?
कैसे अब वह धर्म निभाएगा?
क्या वह अपनी ही रक्षा कर पाएगा?
कृष्ण को समझ पाये,
इसके लायक़ वह है भी कहाँ?
द्रोणाचार्य को अंगूठा पसंद था,
भीष्म कैसे पितामह थे?
भाइयों की लड़ाई में पक्षपात करते,
कैसे मर्यादा बची है?
जिसकी रक्षा अब संभव है?
जब हर घर बेटियों से पहले,
तो बेटों की विदाई हो रही है,
जीत गया तो ठीक,
वरना कुंती का क्या?
सुना है कर्ण भी उसी की संतान है।
अब बेचारे कृष्ण!
किसे उपदेश देंगे?
देकर भी क्या उखाड़ लेंगे?
अर्जुन तो गांडीव ही घर भूल आया।
मैंने बहुत सुना कि कभी भारत सोने की चिड़िया था। वक्त में लौटकर कोई देख तो सकता नहीं हैं। जितना पढ़ा-लिखा है, चलिए! उस पर ही अनुमान लगाते हैं। क्या सोने का मंदिर था, इसलिए सोनचिड़िया था भारत? लगता तो नहीं है। क्यों मंदिरों का महत्व इतना है? हर धर्म के लिए उसका धर्मस्थल बहुत मूल्यवान होता है। कभी सोचा है क्यों? क्यूंकि ये वे गढ़ थे जहाँ शिक्षा का आदान-प्रदान होते थे। तब कोई सीबीएसई या बिहार बोर्ड तो था नहीं। बुद्ध के मठ थे, देवी-देवताओं का मंदिर। विक्रमशिला हो, या तक्षशिला, उस समय के अनुसार उत्तम शिक्षा दे रही थे। धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति फल-फूल रही थी। इसलिए नहीं कि किसी देवी-देवता का वरदान था। हम ही थे जो मंदिर को सुंदर बना रहे थे। कला समृद्ध हो रही थी। संगीत की शाला थे मंदिर, मधुर भजन मन को शांत करती थी।
आज हर चौक-चौराहे पर मंदिर खोले जा रहे हैं, कोई ख़ुद को बाबा घोषित कर दुकान खोले जा रहा है। लाला रामदेव, धीरेंद्र शास्त्री आदि-अनादि तो इनके सरगना लगते हैं। और उन सब के उस्ताद आज कल बजरंगबली की पतंग उड़ा रहे हैं। मेडिकल कॉलेज बंद हो रहे हैं, सोच लीजिए! आने वाले समय में दवा कम और दारू-दुआ से ज़्यादा काम चलाना पड़ सकता है।
आज भी समय है, शिक्षा व्यस्था पूरी तरह से चरमरा चुकी है। सबसे पहले देश के बुद्धिजीवियों को एक नई परिकल्पना करने को कमर कसना ही होगा।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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