एक सवाल लंबे समय से दिमाग में कौंध रहा है कि आखिर ईरान और इजरायल (ईरान और अमेरिका ) के बीच युद्ध क्यों हो रहा है? क्या यह सच में लोकतंत्र बचाने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने की लड़ाई है जैसा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश दुनिया को बताते हैं? या यह तेल के विशाल भंडार पर कब्जा करने की लड़ाई है जैसा कि दुनिया भर के साम्राज्यवाद विरोधी विचारक कहते हैं? क्या यह विश्व बाजार पर प्रभुत्व की लड़ाई है? क्या यह सैन्य ताकत का प्रदर्शन है? या यह पूरी दुनिया को दिया गया एक संदेश है — अमेरिका के खिलाफ मत जाओ।
ये सवाल इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि दुनिया बदल रही है। जिस भूमंडलीकरण के दौर में हमें बताया गया था कि अब दुनिया “मुक्त बाजार” से चलेगी, विश्व में सह-अस्तित्व संभव है द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतराष्ट्रीय कानून और UNO के गठन का उद्देश्य भी यही बताया गया था लेकिन वह भ्रम धीरे-धीरे टूट रहा है। यह तर्क दिया गया था कि भूमंडलीकरण के बाद राष्ट्रों के बीच संघर्ष का स्वरूप बदल जाएगा—सामरिक युद्धों की जगह आर्थिक प्रतिस्पर्धा ले लेगी और आपसी विवाद मिल-बैठ कर सुलझा लिया जाएगा। लेकिन आज की दुनिया को देखें तो यह दावा अब एक भ्रम जैसा प्रतीत होता है।
दरअसल इतिहास गवाह है कि अधिकांश युद्धों के मूल में दो ही कारण होते हैं—आर्थिक हित और राजनीतिक प्रभुत्व। आज भी यह नियम बदला नहीं है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते ही शक्तिशाली देश अपने हितों की रक्षा के लिए सीधे या परोक्ष रूप से युद्ध का रास्ता अपना लेते हैं।
सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया में अमेरिका का लगभग एकछत्र प्रभाव स्थापित हो गया था। इसी दौर में अमेरिका ने भूमंडलीकरण को सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया। इसके पीछे एक स्पष्ट कारण था—उत्पादन और तकनीक में अमेरिका की जबरदस्त बढ़त। उच्च तकनीक और पूंजी आधारित उत्पादन पर अमेरिका और उसके सहयोगियों का प्रभुत्व था। लेकिन पिछले दो दशकों में यह स्थिति तेजी से बदली है। विश्व बाजार में नए शक्तिशाली खिलाड़ी उभरे हैं, जो अमेरिकी प्रभुत्व को खुली चुनौती दे रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम हैं चीन और रूस। इनके साथ-साथ युरोपीय यूनियन के देश भी अब अपने स्वतंत्र आर्थिक हित और बाजार की तलाश में हैं।
इस बदलती आर्थिक संरचना का सीधा परिणाम यह हुआ कि वैश्विक बाजार में अमेरिका की हिस्सेदारी और प्रभाव पर दबाव बढ़ने लगा। इसी पृष्ठभूमि में रूस युक्रेन युद्ध को भी समझा जा सकता है। उस समय अमेरिका और उसके सहयोगियों को उम्मीद थी कि रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध उसे कमजोर कर देंगे और वह लंबे समय तक युद्ध नहीं लड़ पाएगा या अगर लड़ाई लंबी चली तो भारी आर्थिक नुकसान में रहेगा। साथ ही यह संदेश भी जाएगा कि दुनिया में अभी भी सबसे बड़ी शक्ति अमेरिका ही है। लेकिन घटनाएँ अपेक्षा से अलग दिशा में गईं। प्रतिबंधों के बावजूद रूस न केवल युद्ध जारी रखने में सफल रहा, बल्कि उसने नए आर्थिक और सामरिक साझेदार भी खोज लिए। इस प्रक्रिया ने दुनिया को यह संकेत दिया कि अमेरिकी प्रभुत्व से बाहर भी एक बड़ा आर्थिक और राजनीतिक खेमे का निर्माण संभव है। आज यह रेखा थोड़ी अधिक स्पष्ट हो गयी है
अमेरिका दुनिया के सामने खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक बताता है और इस लड़ाई के कई कारणों में से एक लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करना भी बताता रहा है लेकिन इतिहास के पन्ने कुछ और कहानी कहते हैं। 1953 में 1953 Iranian coup d’état के जरिए ईरान की चुनी हुई सरकार को गिराने में अमेरिकी खुफिया एजेंसी की भूमिका रही। कारण क्या था? क्योंकि उस सरकार ने तेल संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण की बात की थी। इसके बाद दशकों तक एक ऐसा शासन स्थापित रहा जो पश्चिमी शक्तियों के हितों के अनुकूल था। यानी जब तक कोई शासन अमेरिकी हितों के अनुकूल हो — तब तक वह स्वीकार्य है, चाहे वह कितना भी अलोकतांत्रिक क्यों न हो। लेकिन जैसे ही कोई देश स्वतंत्र नीति अपनाने की कोशिश करता है, अचानक “लोकतंत्र” खतरे में पड़ जाता है।
अमेरिकी विद्वान Lindsey A. O’Rourke ने अपने प्रसिद्ध शोध में लिखा था कि अमेरिका ने 1947 से 1989 के बीच कम से कम 64 गुप्त ऑपरेशन किए, जिनका उद्देश्य दूसरे देशों की सरकार को हटाना था। बाद के वर्षों को जोड़ें तो यह संख्या और बढ़ जाती है
अब बात ईरान की करते हैं। इस लड़ाई के जरिए भी अमेरीका चाहता था कि ईरान सरकार को बदल दिया जाए, जैसे वेनेजुएला में किया गया। इसलिए समझौते के बीच में ही एकाएक हमला कर दिया कारण था।
मध्य पूर्व केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, यह दुनिया की ऊर्जा राजनीति का केंद्र है।
ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार वाले देशों में से एक है। Strait of Hormuz समुद्री मार्ग जहां से विश्व का 20 से 30 % तैल गुजराता है ईरान इस पर आसानी से नियंत्रण कर सकता है
ऊर्जा पर नियंत्रण का मतलब है: उद्योगों पर नियंत्रण, वैश्विक बाजारों पर प्रभाव और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव
इसलिए तेल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि वैश्विक सत्ता की चाबी है। अर्थात ईरान पर अमेरिका का नियंत्रण होने का अर्थ है तो तेल के भंडार पर नियंत्रण यानी विश्व बाजार पर प्रभुत्व। शीत युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरा।
उस दौर में एक विचार फैलाया गया कि अमेरिकी नेतृत्व ही वैश्विक व्यवस्था तय करेगा। लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है। कई देश इस व्यवस्था को चुनौती देने लगे। ईरान भी उन्हीं देशों में से एक है, जो यह कहता है कि उसकी विदेश नीति किसी दूसरे देश के आदेश से तय नहीं होगी।
यहीं से टकराव पैदा होता है।
आज अमेरिका के भीतर बेचैनी बढ़ती दिखाई देती है। जो देश कभी वैश्विक बाजार और मुक्त व्यापार का सबसे बड़ा समर्थक था, वही अब America First का नारा दे रहा है। इस नई परिस्थिति में अमेरिका को तीन स्तरों पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना आवश्यक लग रहा है:
दुनिया को यह संदेश देना कि अमेरिकी हितों के खिलाफ जाने की कीमत चुकानी पड़ेगी। वैश्विक पेट्रोलियम संसाधनों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना। विशेष रूप से Strait of Hormuz जैसे समुद्री मार्गों पर रणनीतिक पकड़ मजबूत करना, जहाँ से विश्व के लगभग 20–30% तेल व्यापार का आवागमन होता है।
इसी व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में ईरान इजरायल युद्ध या ट्रंप की टैरिफ नीति को भी देखा जाना चाहिए साथ-ही-साथ यह भी कि यह अंतिम लड़ाई नहीं है। कोई भी देश जो अमेरिका की बात मानकर उसकी शर्तों पर काम नहीं करेगा, उसे एक युद्ध झेलना होगा यानी देश आपका नीति उनकी । यह हमें अंग्रेजों और मीर जाफर के बीच समझौता की याद दिलाता है।
इतिहास शायद एक बार फिर उसी पुराने सत्य की ओर लौट रहा है कि बाजार और शक्ति की लड़ाई अंततः राजनीति और युद्ध के मैदान में ही तय होती है। इसलिए ईरान और इजरायल युद्ध न तो परमाणु हथियार को रोकने के लिए है, न लोकतंत्र के लिए, न सिर्फ तेल के लिए। यह सिर्फ अमेरिका के वर्चस्व के लिए जरूरी था और अभी अमेरिका इसी तरह के कई और लड़ाई की तैयारी कर रहा है
संदेश साफ है कि जो देश अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देंगे या स्वतंत्र नीति अपनाने की कोशिश करेंगे, उन्हें भारी दबाव और अलगाव का सामना करना पड़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ ईरान भी यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
लेकिन असल सवाल यह नहीं है कि ईरान और अमेरिका में कौन जीतेगा या किसने किस देश का कितना नुक्सान किया या कौन किसके साथ खड़ा है। असल सवाल यह है कि दुनिया किस दिशा में जाएगी। क्या दुनिया एक ऐसी व्यवस्था में रहेगी, जहाँ एक महाशक्ति तय करेगी कि कौन-सा देश क्या करेगा किसी देश की विदेश नीति क्या होगी उसके यहाँ किस देश का माल बिकेगा और उस देश के अंदर किस तरह की व्यवस्था होगी? या फिर दुनिया कई स्वतंत्र शक्तियों के संतुलन से चलेगी? जहाँ उस देश की अपनी संप्रभुता होगी।
यही कारण है कि ईरान-अमेरिका का यह टकराव केवल दो देशों का विवाद नहीं है। यह उस बड़ी लड़ाई का हिस्सा है, जिसमें तय हो रहा है कि दुनिया पर प्रभुत्व किसका होगा, साम्राज्यवादी ताकतों का या स्वतंत्र राष्ट्रों का। अगले एक दशक में आप दुनिया को तेजी से बदलते देखेंगे, जिसकी शुरुआत हो गई है यानी भूमंडलीकरण का अंत। यह नई व्यवस्था के उदय का संक्रमण काल है। प्रत्येक देश, जो अपने को संप्रभुत्व राष्ट्र कहता है, उसे अपना पक्ष साफ-साफ रखना पड़ेगा कि साम्राज्यवादी शक्ति के आगे झुकना है या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना है।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक









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