इन दिनों : बदजुबानी की राजनीतिक संस्कृति

"नेताओं की बदज़ुबानी के पीछे कुशिक्षा ही है। पहले के नेताओं की औपचारिक शिक्षा बहुत नहीं भी होती थी तो भी किताबें पढ़ते थे और बौद्धिक जनों से जीवंत रिश्ता बनाए रखते थे। आजकल के नेताओं की तरक़्क़ी बदज़ुबानी से होती है, इसलिए वे एक-से-एक बयान देते हैं।" - इसी आलेख से

आजकल के नेता जितने मुँहफट हैं, उतने तो गाँव के टपोरी भी नहीं होते। लगता है कि बदज़ुबानी उनके संस्कृति में बस गया है। भोजपुरी फ़िल्मों में दोयम दर्जे के गायक और अभिनेता मौजूदा बीजेपी सांसद मनोज तिवारी कहते हैं कि राहुल गांधी राष्ट्रद्रोही हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं कि लगातार हारने के कारण राहुल गांधी विक्षिप्त हो गए हैं। वे अपने पैर के नीचे की ज़मीन नहीं देखते। उनको काम मिला है शिक्षा का। मुझे तो लगता है कि सबसे ज़रूरी विभाग उनको मिला है। उनके नेतृत्व में पेपर-लीक आम बात है। नब्बे हज़ार से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। भारत में कोई एक विश्वविद्यालय नहीं है जो विश्व रैंकिंग में सौ के अंदर आ सके। ज़्यादातर निजी विश्वविद्यालय पीएच-डी तक का सर्टिफ़िकेट बेच रहे हैं। पढ़ाई ठप्प हो गई है।

नई शिक्षा नीति के नाम पर एक तरह से शिक्षा की नींव खोद दी गई है। शिक्षा को व्यक्ति, देश और समाज की ज़रूरतों के अनुसार गढ़नी चाहिए थी तो नई शिक्षा नीति जो भी शिक्षा की बसी-बसाई बस्तियाँ थीं, उसे भी उजाड़ रही है। शिक्षा के तरीक़े भी अलग-अलग हैं । निजी शिक्षा के लिए नयी शिक्षा नीति नहीं है। वह अपनी शिक्षा नीति चलायेगी। सरकारी महकमों के भी अलग-अलग स्टैंडर्ड हैं। यहाँ विभिन्नता में एकता नहीं है, बल्कि विभिन्नता के माध्यम से अलग-अलग दिमाग़ और चेतना पैदा करना है। विभिन्नता बुरी चीज़ नहीं होती। लेकिन उसके पीछे का उद्देश्य मानवीय और इंसानी चेतना पैदा करना होना चाहिए। हम विभिन्नता के माध्यम से अजीब तरह की अमानवीय सभ्यता पैदा कर रहे हैं। हालात इतने बुरे हैं कि जो छात्र सही  सवाल करने की हिम्मत रखते हैं, उसे तुरंत पाकिस्तानी घोषित कर दिया जाता है। क्या  देश की शिक्षा तर्कहीनता से पल्लवित-पुष्पित होगी? 

नेताओं की बदज़ुबानी के पीछे कुशिक्षा ही है। पहले के नेताओं की औपचारिक शिक्षा बहुत नहीं भी होती थी तो भी किताबें पढ़ते थे और बौद्धिक जनों से जीवंत रिश्ता बनाए रखते थे। आजकल के नेताओं की तरक़्क़ी बदज़ुबानी से होती है, इसलिए वे एक-से-एक बयान देते हैं। उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि ऊपरवाला उससे नाराज़ न हो जाए। उन्हें अपनी अकूत संपत्ति सुरक्षित रखनी है। जिसे संपत्ति कम है, उसे लूटने का जुगाड़ करना है।

नेताओं के जमावड़े में छँटे हुए बदमाश, हत्यारे, बलात्कारी, दुष्ट आदि आसानी से उपलब्ध हैं। देश के धनपशु इन पर सवारी कसते हैं। जस्टिस सूर्यकांत इनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं कहते। वे उस समाज से आते हैं, जिन्हें परंपरा से ही निम्न वर्गों से नफ़रत करने का अधिकार प्राप्त है। हज़ारों वर्षों से विपन्न लोगों को जीने का हक़ नहीं है। करोड़ों करोड़ भारतीयों के पास इंसानी जीवन फटकता तक नहीं। लाखों लोग समाज में बह्मराक्षस बने बैठे हैं। मुक्तिबोध की एक कविता है- बह्मराक्षस। उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं-  ‘ब्रह्मराक्षस/घिस रहा है देह/ हाथ के पंजे,बराबर,/ बाँह-छाती-मुँह छपाछप/ख़ूब करते साफ़,/फिर भी मैल/ फिर भी मैल!!’

बह्मराक्षसों की टोलियाँ देश के बड़े बड़े पदों पर क़ाबिज़ है। वे उदंड भाषा में ठहाके लगा रहे हैं। दुनिया की पहली पुस्तक रचने का सौभाग्य भारत को प्राप्त है। चमचमाती सभ्यता के दावे ही नहीं करते, बल्कि विश्वगुरु बनने चाहते हैं। क्या यह देश विश्वगुरु बदज़ुबानी से बनेगा? निर्भयता, संकल्प, साहस, संवेदना और सम्मान अगर हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं है तो कोई कुछ कर ले, न समाज विकसित होगा, न देश। देश ईंट, पत्थर और चूना से बनी कोई प्रतिमा नहीं है। वह जीवंत है। धड़कन और गति उसका स्वभाव है ।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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