सड़क किनारे कौन लोग हैं, जो ठेला लगाते हैं, टीन के पटरे से घर बनाकर रहते हैं, परिवार पालने के छोटे-छोटे सपने देखते हैं? क्या वे इसी देश के नागरिक हैं, जहाँ एक तरफ़ अकूत संपत्ति इकट्ठी हो रही है और दूसरी ओर अस्सी प्रतिशत नागरिक पाँच किलो अनाज पर जीवन जीने को अभिशप्त हैं? पाँच किलो अनाज पर जीते हुए नागरिक अपने और राष्ट्र के बारे में कौन-सा सपना देखते होंगे? क्या यह एक ख़ुशहाल देश के लक्षण हैं? मध्यम और उच्च वर्ग को चमचमाती सड़कें चाहिए, जिस पर उनकी गाड़ी और मन दौड़ सके। उन्हें ऐसे लोगों से घिन आती है जो सड़क किनारे रहते हैं। नागार्जुन की एक कविता है- ‘घिन तो नहीं आती है।’ यह कविता कोलकाता पर ही आधारित है, जहाँ ग़रीबों की झुग्गियों पर बुलडोज़र चल रहा है।
नागार्जुन ने कविता के माध्यम से मध्यवर्गीय और उच्चवर्गीय लोगों से पूछा था कि जब तुम ट्राम में चलते हो, दचकै पर दचकै खाते हो, तुम्हारे बदन से पसीने से लथपथ कोई बदन टकराता है, तो तुम सच-सच बतलाना कि तुम्हें इससे घिन तो नहीं आती है? कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं-
“कुली मज़दूर हैं बोझा ढोते हैं, खींचते हैं ठेला धूल धुआँ भाप से पड़ता है साबका थके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे में बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर आपस मैं उनकी बतकही सच सच बतलाओ जी तो नहीं कुढ़ता है? घिन तो नहीं आती है?”
यह कविता 1975 के आसपास लिखी गई। कवि की आँखें बहुत कुछ देख लेती हैं। पचास वर्ष पुरानी कविता की पंक्तियाँ कितनी सत्य हैं! ऊँची अट्टालिकाओं के ज़्यादातर बाशिंदे घिन से भरे हुए हैं। उनके अंदर सड़क पर बसे लोगों के लिए कम ही संवेदना बची है।
आज़ादी सिर्फ़ खाये-पीये-अघाये लोगों के लिए नहीं थी। सड़कों पर आज़ादी के लिए जिन्होंने रक्त बहाया, उनमें ऐसे धनपशु तो नहीं थे। युवाओं ने रक्त बहाया, किसान-मज़दूरों ने लाठियाँ खाई, जेल गये। मौक़ा आया तो मृत्यु को वरण किया। औरतें घरों से निकलीं। देश के लिए आवाज़ें बुलंद कीं। मगर आज़ादी के बाद इन्हें किनारे कर दिया गया। पूँजीपतियों का विकास शुरू हुआ। देश क़र्ज़े में डूबता गया। बैंक में जनता का पैसा जमा हुआ। विकास के नाम पर पूँजीपतियों को कम ब्याज पर करोड़ों-करोड़ रुपये लोन के नाम पर दिए गए। अनेक पूँजीपति लोन का करोड़ों-करोड़ डकार गए। चंदाखोर नेताओं ने माफ़ कर दिया। अनेक पूँजीपति बैंकों का करोड़ों-करोड़ लेकर विदेश भाग गये। विकास की धारा उल्टी बह गई। नतीजा किसान आत्महत्या कर रहे हैं और पढ़े- लिखे युवाओं को काम नहीं मिल रहा। औरतों पर जुल्म बढ़ते जा रहे हैं। आज़ादी इसलिए नहीं मिली थी कि जिनके पूर्वजों ने ख़ून बहाया, उनकी नागरिकता पर ही सवाल उठने लगे। उन्हें ‘परजीवी’ और ‘कॉकरोच’ कहा जाने लगे। ऐसे ही वक़्त में रणभेरी बजती है। संकल्प, साहस और निडरता की ज़रूरत होती है। इतिहास में हरेक के लिए अवसर आता है। उन्हें गाना पड़ता है-
“झुके न जो, मिटे न जो, दबे न जो, हम वो इंकलाब हैं, ज़ुल्म का जवाब हैं हर शहीद, हर गरीब का, हमीं तो ख्वाब हैं ।”
ऐसे वक्त में तराने पर उड़ान भरने की तमन्ना होती है। आकाश में मुक्ति के निनाद गूँज उठते हैं। वक्त पुकारता है। लोगों की चेतना बदलाव के मचलने लगती है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







