परीक्षा बनाम उन्मूलन : भारत में भय का उत्सव और असफलता का दंड

"एक वैज्ञानिक सार्वभौमिक शिक्षा प्रणाली- सामान्य, सुवित्तपोषित, निरंतर मूल्यांकित तथा उच्च-जोखिम से पूर्ण परीक्षाएँ लीक व रैकेटों से मुक्त- कोई काल्पनिक स्वप्न नहीं, बल्कि ठोस, पहले से परखे जा चुके तत्वों का एक समुच्चय है, जिसे मिलाने के लिए बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की प्रतीक्षा है।" - इस आलेख की स्थापना

स्वतंत्रता के अस्सीवें वर्ष में भी भारत की शिक्षा व्यवस्था मानव क्षमता के सार्वभौमिक विकास के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि एक प्रतिस्पर्धी छंटाई तंत्र के इर्द-गिर्द संचरित है। यह भय का उत्सव मनाती है और असफलता को दंडित करती है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में बहुपरती प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक क्रमशः व्यवसायीकरण, बाज़ारीकरण और वस्तुकरण से गुजरती हुई भारतीय शिक्षा एक ऐसी उपव्यवस्था संचालित करती है, जिसमें परीक्षाएँ सीखने को प्रमाणित करने से कहीं अधिक बाहर करने –‘उन्मूलन’ करने- का कार्य करती हैं। सार्वभौमिक समतापूर्ण शिक्षा के संवैधानिक वादों और वहिष्करण, बंधन, चयन तथा वंचना की सुदृढ़ संरचना का सहअस्तित्व कार्यान्वयन की कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय पूँजीवाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में निहित एक संरचनात्मक अंतर्विरोध है। दुनिया के प्रयोगों की रोशनी में इस सवाल की पड़ताल की जरूरत है कि क्या चयन, अस्वीकृति और असफलता पर आधारित व्यवस्था कभी ‘सबके लिए शिक्षा’ दे सकती है और संगीन के साये में भ्रष्टाचार व घोटाले से मुक्त एक वैज्ञानिक, गैर-चयनात्मक, गैर-दंडात्मक सार्वभौमिक शिक्षा प्रणाली की बात की जा सकती है। 

1. अंतर्विभाजित प्रणाली:

आज की भारतीय शिक्षा एक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक-दूसरे के ऊपर परतों में खड़ी अनेक व्यवस्थाएँ  हैं। सरकारी विद्यालय, सरकारी-सहायता प्राप्त विद्यालय, कम शुल्कवाले निजी विद्यालय, संभ्रांत गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालय और अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड की संस्थाएँ एक ही शहर में साथ-साथ अस्तित्व में हैं और इनमें से हर एक बच्चे को उसके माता-पिता की आय के आधार पर गुणात्मक रूप से भिन्न शिक्षा देती है। यह स्तरीकरण आंगनवाड़ी से विश्वविद्यालय तक फैला है- प्रवेश द्वार पर कैपिटेशन शुल्क और दान, प्रवेश से जुड़े कोचिंग-केंद्र फ्रेंचाईजी, चिंता को मुद्रीकृत करता एडटेक उद्योग और एक विश्वविद्यालय क्षेत्र जो निरंतर रैंक, ग्रेड और मूल्यांकित उपभोक्ता वस्तु की तरह मूल्य निर्धारित होता जा रहा है। व्यवसायीकरण (लाभ बतौर उद्देश्य), बाज़ारीकरण (प्रतिस्पर्धा और रैंकिंग बतौर पद्धति) और वस्तुकरण (डिग्रियों व अंकों का उत्पाद के रूप में पैकेजिंग व बिक्री) इस व्यवस्था की विकृतियाँ नहीं, बल्कि इसकी संगठनात्मक तर्कसंगति हैं। परिणामस्वरूप समानान्तर, असमान पथों का एक जाल बनता है, जिसे ‘सबके लिए शिक्षा’ की अलंकारिता सुलझाती नहीं, बल्कि छिपा देती है। 

2. शिक्षा सबके लिए नहीं: एक संस्थापक मिथक का पर्दाफाश 

‘सर्व शिक्षा’ जैसे नारे उस आकांक्षा का वर्णन करते करते हैं, जिसे यह व्यवस्था, वास्तव में, कभी पूरा करने के लिए बनी ही नहीं थी। प्राथमिक स्तर पर नामांकन लगभग सार्वभौमिक है, किन्तु उसके बाद क्षरण तीव्र गति से बढ़ता है- बहुत छोटा समूह उच्च माध्यमिक तक पहुँचता है, उससे से भी छोटा समूह उच्च शिक्षा में प्रवेश करता है और उसका भी एक अंश किसी वास्तविक श्रम-बाज़ार मूल्य वाली डिग्री तक पहुँचता है। यह कीप यादृच्छिक नहीं है- यह असमान रूप से ग्रामीण गरीबों, दलित, आदिवासी, ओबीसी और मुस्लिम बच्चों, लड़कियों तथा विकलांग बच्चों पर पड़ती है। जिस व्यवस्था के परिणाम इस प्रकार पूर्वानुमेय रूप से असमान हों, उसे सार्वभौमिक शिक्षा की खोज में असफल व्यवस्था के रूप में नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसे एक ऐसी वयवस्था के रूप में समझना होगा जिसका वास्तविक कार्य एक छोटा, प्रमाणपत्रधारी आभिजात वर्ग और निम्न-वेतन, अनौपचारिक श्रम में धकेला गया कहीं बड़ा त्यक्त बहुसंख्यक वर्ग उत्पन्न करना है। 

3. चतुर्विध तंत्र: बहिष्करण, बंधन, चयन, वंचना 

3.1 बहिष्करण 

बहिष्करण ड्रॉप-आउट/पुश-आउट, गैर-नामांकन, अंग्रेजीभाषी न होनेवाले बच्चों के लिए माध्यम-संबंधी बाधाओं, विकलांग बच्चों के लिए दुर्गम अवसंरचना और महामारी काल के ऑनलाइन शिक्षण से उजागर हुई बढ़ती डिजिटल खाई के माध्यम से संचालित होता है। महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षा के अधिकार कानून की कानूनी सुरक्षाएँ कक्षा 8 पर समाप्त हो जाती हैं, ठीक वहीं जहाँ बोर्ड परीक्षाओं का छँटाई-तंत्र शुरू होता है। कानून अपनी गारंटी ठीक तभी वापस लेता है, जब व्यवस्था के द्वारा उन्मूलन आरंभ होता है। 

3.2 बंधन 

एक विशाल कोचिंग-औद्योगिक परिसर- जिसका सबसे स्पष्ट उदाहरण प्रवेश-परीक्षा तैयारी के इर्द-गिर्द ही बसे नगर हैं- किशोरावस्था को एक ही परीक्षा के नाम गिरवी रख देता है। परिवार वर्षों की कोचिंग के वित्तपोषण के लिए कर्ज़ लेते हैं; विद्या और समझ का स्थान रटना ले लेती है; विद्यार्थी, शिक्षक और अभिभावक- सभी जिज्ञासा की संस्कृति के बजाय भय के अनुशासन में बँध जाते हैं। यह सही अर्थों में बंधन है। एक युवा के जीवन के वर्ष और परिवार की वित्तीय स्थिति पहले से ही एक ऐसी परीक्षा के नाम गिरवी रख दी जाती है जिसका परिणाम अनिश्चित है और जिसकी संरचना पर अधिकांश का कोई नियंत्रण नहीं। 

3.3 चयन 

हर संक्रमण-विंदु पर चयन की प्रक्रिया अपनायी जाती है और एक ही अंक-आधारित रैंकिंग विद्यार्थियों को अच्छी और बुरी संस्थाओं में भिन्न-भिन्न जीवन पथों में बाँट देती है। चयन स्वयं को तटस्थ और योग्यता-आधारित बताता है, जबकि यह पहले से ही असमान पूर्व-शिक्षा, कोचिंग तक पहुँच और शिक्षा-माध्यम से झुके हुये फ़लक पर कार्य करता है। 

3.4 वंचना 

अधिकांश बच्चों को अपने अंदर समाहित करने वाले सरकारी विद्यालय दीर्घकालिक रूप से अल्प-वित्तपोषित बने हुए हैं। भारत का शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय 1966 में कोठारी आयोग द्वारा अनुशंसित जीडीपी के 6% के लक्ष्य से लगातार छह दशकों से पीछे रहा है। शिक्षकों की रिक्तियाँ, अनुपस्थित अवसंरचना और भीड़भरी कक्षाएँ उन्हीं बच्चों की रोज़मर्रा की वास्तविकता हैं, जिन्हें संविधान शिक्षित करने का वादा करता है। जबकि निजी पूँजी उन लोगों की आकांक्षाओं को अपने कब्जे में लेती जा रही है, जो भुगतान करने में सक्षम हैं। 

4. अस्सी वर्ष बाद संविधान की रोशनी में 

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 45 के अनुसार संविधान लागू होने के दस वर्षों के भीतर चौदह वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का वादा किया गया था। यह कभी पूरा न हो सका। मौलिक अधिकार के रूप में शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21ए) 2009 में आया और इसे 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों तक सीमित रखा गया। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा, जहाँ वास्तविक छँटाई आरंभ होती है, संवैधानिक गारंटी से बिल्कुल बाहर रह गई। अनुच्छेद 46 का अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य दुर्बल वर्गों की शैक्षिक उन्नति का वादा अब भी काफी हद तक आकांक्षा मात्र है। सीखने की दरिद्रता सर्वविदित है। कक्षा 8 के बच्चे कक्षा 2 के लायक भी ज्ञान नहीं रखते हैं। स्नातक डिग्रिधारी उसी स्तर की प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता प्राप्ति के लिए वर्षों श्रम व धन लगाते हैं, फिर भी सफलता की कोई गारंटी नहीं होती और वे हताशा और निराशा के भँवर में कश्मकश करते रहते हैं। सीखने-सिखाने की यह दरिद्रता भारतीय व्यवस्था में सर्वव्यापी है। यह प्रतिमान बहुत कुछ कहता है – संवैधानिक गारंटी ठीक वहीं थम जाती है जहाँ परीक्षा-चालित छँटाई तंत्र तीव्र होता है। 

5. एक छँटाई-यंत्र के भीतर ‘चयन’: शब्दों में ही अंतर्विरोध 

क्या मौजूदा भारतीय व्यवस्था सभी बच्चों को उनकी पसंद के अनुसार शिक्षित कर सकती है, जबकि यही व्यवस्था चयन, अस्वीकृति और असफलता के इर्द-गिर्द संगठित है? भारतीय व्यवस्था वास्तव में जो देती है, वह है औपचारिक पसंद- विषयों, स्ट्रीमों, महाविद्यालयों की एक सूची- किन्तु पसंद की भौतिक पूर्वशर्त के बिना: समान प्रारम्भिक क्षमता, समान विद्यालय-गुणवत्ता, समान पारिवारिक संसाधन। इस संदर्भ में ‘पसंद’ वैचारिक रूप से कार्य करती है- यह व्यक्तिगत निर्णय को उस परिणाम का श्रेय देती है, जो वास्तव में विद्यालय-गुणवत्ता, कोचिंग तक पहुँच, अङ्ग्रेज़ी-माध्यम अनुभव और अभिभावकीय शिक्षा की पूर्व असमानता से पहले ही काफी हद तक निर्धारित हो चुका होता है। वास्तविक ‘पसंद’ के लिए विकल्पों में प्रचुरता और समता चाहिए; भारतीय व्यवस्था इसके विपरीत अभाव उत्पन्न करती है और फिर उस तक पहुँच के लिए आवेदकों की रैंकिंग करती है। 

6. पूर्व सोवियत संघ, जर्मनी और फ़िनलैंड के प्रयोग

6.1 पूर्व सोवियत संघ 

सोवियत संघ ने संवैधानिक रूप से निःशुल्क, सार्वभौमिक शिक्षा की गारंटी दी और सैद्धान्तिक व व्यावसायिक शिक्षण को जोड़ने वाले पौलिटेकनिक सिद्धान्त का अनुसरण किया। उसके साक्षरता अभियान (लिकबेज़) ने सामूहिक निरक्षरता वाले समाज को एक ही पीढ़ी में लगभग सार्वभौमिक साक्षरता तक पहुँचा दिया। इस व्यवस्था की वैचारिक कठोरता और सीमित शैक्षणिक स्वतन्त्रता के लिए न्यायसंगत आलोचना होती है, परंतु यह इस बात का सशक्त प्रमाण है कि सतत राजकीय संसाधन-आवंटन और राजनीतिक इच्छाशक्ति एक छोटी ऐतिहासिक अवधि में सार्वभौमिक पहुँच के लिए क्या हासिल कर सकते हैं। 

6.2 जर्मनी 

जर्मनी की दोहरी व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रणाली व्यावसायिक मार्गों को अकादमिक जिमनेज़ियम-आबिटूर मार्ग के समतुल्य सामाजिक और आर्थिक सम्मान देती है। साथ ही संचरित नियोक्ता-साझेदारियाँ वास्तविक करियर-गतिशीलता प्रदान करती हैं। लगभग दस वर्ष की आयु में की जाने वाली प्रारम्भिक स्ट्रीमिंग की- वर्ग-पृष्ठभूमि को पुनरुत्पादित करने के आरोप में – न्यासंगत आलोचना होती है। फिर भी, जर्मन प्रतिमान यह दर्शाता है कि अकादमिक मार्ग में प्रवेश न कर पाना गरिमापूर्ण, सुवेतन आजीविका से बहिष्करण के समान नहीं होना चाहिए- एक विलगाव जिसका भारतीय व्यवस्था में स्पष्ट अभाव है। 

6.3 फ़िनलैंड 

फ़िनलैंड ने उच्च माध्यमिक शिक्षा के बिल्कुल अंत तक उच्च-दांव मानकीकृत परीक्षण को समाप्त कर दिया है। इसका व्यापक ‘पेरुस्कूलू’(सात से सोलह वर्ष आयु) जानबूझकर हर क्षमता-स्तर के विद्यार्थियों को एक ही कक्षा में साथ रखता है, स्ट्रीमिंग व कक्षा-पुनरावृति से बचाता है, अध्यापक शिक्षा में भारी निवेश करता है, शिक्षकों को पाठ्यचर्या स्वायत्तता पर भरोसा देता है और विद्यालय के स्थान के बावजूद प्रति-विद्यार्थी वित्त-पोषण को समान करता है। परिणामस्वरूप, विद्यालयों के बीच असामान्य रूप से छोटे प्रदर्शन अंतराल के साथ विश्व की सर्वाधिक समतापूर्ण उपलब्धियों में से एक प्राप्त होती है। 

इनमें से कोई भी व्यवस्था भारत के आकार, विविधता या राजनीतिक अर्थव्यवस्था में सीधे प्रत्यारोपित नहीं की जा सकती। किन्तु समूहिक रूप से यह दर्शाती हैं कि भय-आधारित, एक-मौका चयन एक नीतिगत विकल्प है, शैक्षणिक अनिवार्यता नहीं- एक तथ्य, जिसे भारत की परीक्षा संस्कृति की निरंतरता प्रायः धूमिल कर देती है।

7. पूँजीवाद के भीतर व्यवस्था

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में  सेमेस्टर प्रणाली मूल्यांकन की ओर बढ़ने का प्रस्ताव है; किन्तु मौजूदा ढाँचे के भीतर सतत नीतिगत सुधार संभव प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इसके लिए प्रक्रिया-आधारित संरचना की आवश्यकता है और यह पूर्णतः उपेक्षित है। 

कोचिंग उद्योग, शिक्षा में निजी पूँजी, श्रम-बाज़ार की प्रमाणपत्र-केन्द्रीयता और राज्य का सार्वजनिक वित्त-पोषण से हाथ खींच लेना- ये आकस्मिक नहीं, बल्कि एक ऐसी पूँजीवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं, जिसे श्रम का स्तरीकृत पदानुक्रम चाहिए- सस्ते, अल्प-प्रमाणित श्रम का विशाल आधार और शीर्ष पर उच्च-प्रमाणित श्रम की एक पतली परत। जब तक पूँजी को यह पदानुक्रम चाहिए, तब तक परीक्षा व्यवस्था केवल एक शैक्षणिक नहीं, बल्कि एक आर्थिक छँटाई कार्य करती है। इस छँटाई कार्य को चुनौती देनेवाले सुधार प्रस्तावों को कोचिंग-पूँजी से, अपनी विशिष्टता की रक्षा करती आभिजात संस्थाओं से तथा उस मध्यम वर्ग से प्रतिरोध मिलता है, जिसकी अपनी गतिशीलता की रणनीति ही प्रमाणपत्रों की सापेक्ष दुर्लभता पर टिकी है। 

विस्तारित एवं प्रभावी शिक्षा का अधिकार, सामान्य-विद्यालय के प्रयोगिक मोडेल एवं सतत व व्यापक मूल्यांकन ऐसे वास्तविक लाभ हैं, जो पूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन से पहले भी प्राप्त किए जा सकते हैं और आगे के परिवर्तन के लिए क्षेत्र को विस्तृत करते हैं। 

8. एक नई व्यवस्था की ओर :        

उपर्युक्त तथ्यों की रोशनी में एक वैज्ञानिक और गैर-दंडात्मक विकल्प का प्रस्ताव रखा जा सकता है:

8.1 सामान्य विद्यालय-पड़ोस प्रणाली 

परिवार की आय से निरपेक्ष, सभी बच्चों के लिए एक तुलनीय- गुणवत्ता वाला सामान्य पड़ोस-विद्यालय हों । इसके परिणामस्वरूप, सीखने के आरंभ से पहले ही बच्चों को पूर्व-छाँटनेवाले समानान्तर मार्ग समाप्त होंगे। 

8.2 निरंतर और न्यूनतम जोखिम वाला मूल्यांकन 

एकल उच्च जोखिम परीक्षाओं के स्थान पर पूरे शैक्षणिक वर्ष में वितरित, पोर्टफोलियो- व योग्यता-आधारित निरंतर मूल्यांकन को अपनाना। इससे भय का शिक्षा शास्त्र समाप्त होगा और अब  कोई एक पर्चा किसी का जीवन परिणाम तय नहीं करेगा- पर्चा-लीक व परीक्षा-रैकेट को बनाए रखने वाला आर्थिक प्रोत्साहन भी काफी तक कमजोर पड़ेगा।

8.3 व्यावसायिक व अकादमिक मार्गों के बीच सम्मान की समता 

जर्मन उदाहरण का अनुसरण करते हुये व्यावसायिक, तकनीकी और पौलीटेकनीक मार्गों को अकादमिक मार्गों के समतुल्य सामाजिक व आर्थिक सम्मान मिलना चाहिए, ताकि किसी एक परीक्षा में कठिनाई गरिमापूर्ण आजीविका को अवरुद्ध न करे। 

8.4 पर्याप्त, समान सार्वजनिक वित्तपोषण 

न्यूनतम रूप से कोठारी आयोग के जीडीपी के 6% के मानदंड को पूरा करना तथा प्रति-विद्यार्थी वित्तपोषण को समान करना ताकि गुणवत्ता अब पारिवारिक आय के अनुरूप न रहे। 

8.5 कोचिंग को केवल नियमित करने के बजाय अनावश्यक बनाना 

कोचिंग उद्योग इसलिए फलता-फूलता है, क्योंकि विद्यालयों को पर्याप्त नहीं माना जाता। संसाधन-सम्पन्न,पारदर्शी, उच्च-गुणवत्ता वाला विद्यालय-आधारित शिक्षण, केवल आपूर्ति को नियंत्रित करने के बजाय, छाया शिक्षा-जैसी कोचिंग की मूल माँग को ही समाप्त करता है। 

8.6 उच्च शिक्षा और रोजगार में बहु-मान्यता प्राप्त मार्ग 

भर्ती और आगे की पढ़ाई को एकल प्रतिस्पर्धी फिल्टर से विलग करना ताकि किसी भी क्षेत्र में एक से अधिक विश्वसनीय मार्ग उपलब्ध हों। 

8.7 विकेंद्रीकृत, अंकेक्षित परीक्षा प्रशासन 

जहाँ किसी सार्थक परिणाम वाले मूल्यांकन की आवश्यकता बनी रहे, वहाँ विकेंद्रीकृत, प्रौद्योगिकी-अंकेक्षित प्रशासन उन विशिष्ट माध्यमों को बंद कर सकता है, जिनसे लीक व रैकेट संचालित होते हैं- इसे प्राथमिक सुधार नहीं, बल्कि द्वितीयक सुरक्षा-कवच के रूप में समझा जाना चाहिए।

9. निष्कर्ष :

80 वें स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर भी भारत की शिक्षा व्यवस्था भय का उत्साह मनाती और असफलता को दंडित कर रही है, क्योंकि इसके अंतर्निहित कार्य- एक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के लिए श्रम के स्तरीकृत पदानुक्रम की छँटाई – का द्वन्द्वात्मक सामना अब तक नहीं किया गया। संवैधानिक वादे और पूँजीवादी छँटाई कार्य के बीच का अंतर्विरोध इस समस्या को वास्तविक रूप से रेखांकित करता है। सोवियत संघ, जर्मनी और फ़िनलैंड का तुलनात्मक अनुभव दर्शाता है कि भय-आधारित चयन एक शैक्षणिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि एक नीतिगत विकल्प है; और आगे का मार्ग जितना शैक्षणिक है, उतना ही राजनीतिक और आर्थिक भी है। एक वैज्ञानिक सार्वभौमिक शिक्षा प्रणाली- सामान्य, सुवित्तपोषित, निरंतर मूल्यांकित तथा उच्च-जोखिम से पूर्ण परीक्षाएँ लीक व रैकेटों से मुक्त- कोई काल्पनिक स्वप्न नहीं, बल्कि ठोस, पहले से परखे जा चुके तत्वों का एक समुच्चय है, जिसे मिलाने के लिए बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की प्रतीक्षा है।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।

डॉ जी शंकर तीन दशकों से अधिक से अध्यापक शिक्षा और शैक्षिक अनुसंधान से जुड़े रहे हैं. अध्यापक शिक्षा में एएसयू, यूएसए में पूर्व सहायक संकाय। वह अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच(एआईएफआरटीई )के कार्यकारी परिषद के सदस्य और भारतीय सामाज विज्ञान अकादमी(आईएसएसए) के उपाध्यक्ष हैं।
ई- मेल: g.shankar.begusarai@gmail.com

डॉ. जी शंकर
डॉ. जी शंकर

डॉ जी शंकर तीन दशकों से अधिक से अध्यापक शिक्षा और शैक्षिक अनुसंधान से जुड़े रहे हैं. अध्यापक शिक्षा में एएसयू, यूएसए में पूर्व सहायक संकाय। वह अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच(एआईएफआरटीई )के कार्यकारी परिषद के सदस्य और भारतीय सामाज विज्ञान अकादमी(आईएसएसए) के उपाध्यक्ष हैं।
ई- मेल: g.shankar.begusarai@gmail.com

Articles: 1

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *