कॉकरोच आंदोलन को किस तरह देखना चाहिए?

कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को अक्सर जीत और हार के साँचे में विवेचित किया जाता है। जीत-हार की बहस से अलग इस आलेख में देश की राजनीति और नागरिक समाज पर इस आंदोलन के पड़ने वाले प्रभाव को विवेचित किया गया है।

भारतीय राजनीति के हालिया इतिहास में एक बेहद अप्रत्याशित और युगांतरकारी घटना घटी है। वर्षों से देश ने एक ऐसी सरकार देखी है, जो अपनी नीतियों, फैसलों और ‘लौह पुरुष’ वाली छवि को लेकर बेहद अडिग रही है। चाहे वह कितना भी बड़ा विरोध हो, सत्ता अमूमन अपने कदमों को पीछे खींचने के बजाय अपनी जिद पर अड़ी रहती थी। लेकिन परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे पर उपजे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के हालिया युवा आंदोलन के सामने जिस तरह सरकार ने घुटने टेके, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार किया और छात्रों की माँगें मानीं, वह भारत के राजनीतिक नैरेटिव में एक बहुत बड़ा प्रस्थान बिंदु है।

2014 के बाद से वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान ने अपनी एक ऐसी राजनीतिक छवि गढ़ी थी, जिसे ‘अजेय’ और ‘अपरिवर्तनीय’ माना जाता था। सरकार का यह संदेश था कि वह दबाव में कोई फैसला नहीं लेती। सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने तो स्पष्ट कह दिया था कि बीजेपी में इस्तीफ़े नहीं होते। यहाँ तक कि जब तीन कृषि कानूनों के खिलाफ एक साल से लंबा किसान आंदोलन चला, तब भी सरकार ने बहुत लंबे समय के बाद और एक विशेष चुनावी रणनीति के तहत कदम पीछे खींचे थे, लेकिन किसी मंत्री का सिर नहीं गिरने दिया।

सीजेपी के आंदोलन की सफलता ने पहली बार इस अभेद्य दुर्ग की दीवारों में एक स्पष्ट छेद बनायी है। किसी विरोधी या सड़क पर उतरी एक गैर-पारंपरिक ताकत की माँग को इस तरह तुरंत और सीधे स्वीकार कर लेना यह दर्शाता है कि अब सत्ता के भीतर चुनावी और सामाजिक समीकरणों को लेकर एक अनजाना डर बैठ चुका है। 2024 के आम चुनाव के बाद बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य और बैसाखियों पर टिकी गठबंधन सरकार की मजबूरियों ने सरकार को यह अहसास करा दिया है कि अब वह ‘एकतरफा संवाद’ के सहारे देश नहीं चला सकती। इस तरह यह जीत किसी एक मंत्री के हटने की नहीं है, बल्कि यह उस ‘तानाशाही संप्रभुता’ के भ्रम के टूटने की शुरुआत है।

पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता रही है विरोध को राजनीतिक संघर्ष के बजाय नैरेटिव के संघर्ष में बदल देना। अब तक किसी आंदोलन को विपक्ष-प्रायोजित, राजनीतिक षड्यंत्र, विदेशी प्रभाव, गलत सूचना, अराजकता या राष्ट्र-विरोध के फ्रेम में रख देना सत्ता के लिए एक प्रभावी रणनीति रही है। किसान आंदोलन पर भी इस तरह के आरोप खूब लगाए गए। वह इतना ज़्यादा था कि बहुत सारे लोगों के दिलो-दिमाग़ में देश के लिए सबसे अधिक कुर्बानी देने वाले पंजाबियों और सिखों के विरुद्ध नफ़रत पैदा कर दी गयी। यही सीएए और अन्य आंदोलनों के साथ भी हुआ। प्रारंभ में इस आंदोलन पर भी इसी तरह के आरोप लगाने की चेष्टा की गयी। मगर सीजेपी की शुरुआत ही इस नैरेटिव को उलटने से हुई। “कॉकरोच” शब्द, जिसे सत्ता के आलोचकों को नीचा दिखाने वाले संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था, आंदोलन ने अपने लिए पहचान बना लिया। इससे अपमान को ही राजनीतिक पहल में बदल देने की दिलचस्प राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हुई। The Diplomat ने भी इसी बात को आंदोलन की वैचारिक विशेषता के रूप में रेखांकित किया है।

दूसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यह है कि सत्ता ने पहली बार ‘विरोधी’ से सीधे बातचीत की। यहाँ एक बहुत सूक्ष्म बात है। भारत में विपक्ष और सरकार के बीच संघर्ष हमेशा रहा है। लेकिन सीजेपी का मामला पारंपरिक विपक्ष से अलग है। यह न तो कांग्रेस है, न कोई क्षेत्रीय दल, न कोई स्थापित किसान संगठन, न कोई ट्रेड यूनियन। एक व्यंग्यात्मक डिजिटल पहचान से पैदा हुआ आंदोलन सड़क पर आया और फिर सरकार के साथ बातचीत की मेज तक पहुँचा। इसका यह भी अर्थ है कि सरकार औपचारिक राजनीतिक या जन संगठनों की तो उपेक्षा करती है, लेकिन बिना किसी राजनीतिक या सांगठनिक पहचान के उभरे हुए जनांदोलनों से चिंतित हो गयी। फिर यह आंदोलन जंतर-मंतर की चौहद्दी तक सिमटा हुआ नहीं रहा, बल्कि इसकी लपटें शहर-शहर में फ़ैल गयीं। यत्र-तत्र इसका रूप हिंसक होने लगा था। बिहार इसका उदाहरण है। स्थितियाँ नियंत्रण से बाहर न हो जायें, दावानल की आँच ‘नरेंद्र’ तक न पहुँच जाये, जैसी कि शुरुआत हो चुकी थी, उसके पहले ही ‘धर्मेंद्र’ की बलि देकर काल भैरवी को संतुष्ट करने का प्रयास किया गया। यही भाँपते हुए 25 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ सीजेपी प्रतिनिधियों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। इससे पहले कुछ ही दिनों में तीन दौर की बातचीत हुई थी। The Week के अनुसार पाँच दिनों में बातचीत की मेज पर दोनों पक्षों की शक्ति-संबंधी स्थिति उल्लेखनीय रूप से बदली। यहाँ एक बड़ा लोकतांत्रिक संदेश निकलता है कि सरकार को केवल चुनाव में चुनौती नहीं दी जा सकती। उसे नागरिक समाज, छात्रों, पेशेवरों और असंगठित जनता द्वारा भी कुछ परिस्थितियों में राजनीतिक रूप से जवाबदेह बनाया जा सकता है। यही इस घटना का शायद सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव होगा। 

इस आंदोलन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने ‘माँग’ स्वीकार की है, इतना कहना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ‘नैरेटिव’ भी बदला है। सरकार के लिए सबसे बड़ा नुकसान शायद मंत्री का जाना नहीं है। वह है जवाबदेही  (accountability) का नैरेटिव जनता के हाथ में चला जाना। अब कोई अगला आंदोलन यह कह सकता है कि ‘सीजेपी ने किया तो हम क्यों नहीं कर सकते?’ यही ‘प्रदर्शन-प्रभाव’ (demonstration effect) है। किसी आंदोलन की सफलता दूसरे आंदोलनों की कल्पना-सीमा बदल देती है। आज शिक्षा मंत्री। कल कोई भर्ती परीक्षा, कोई विश्वविद्यालय, कोई प्रशासनिक भ्रष्टाचार, कोई पुलिस कार्रवाई, कोई भूमि अधिग्रहण, कोई कृषि समस्या, कोई पर्यावरणीय मामला उठ खड़ा हो और उसमें प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा या सरकार की बर्खास्तगी की माँग की जा सकती है। लोग पूछ सकते हैं कि ‘क्या हम सरकार से जवाब नहीं माँग सकते?’ यही वह बिंदु है, जहाँ एक स्थानीय घटना राजनीतिक संस्कृति में बदल सकती है।

यहीं से मोदी सरकार के लिए असली चुनौती शुरू होती है। ऐसा नहीं लगता कि सीजेपी के कारण बीजेपी का राजनीतिक चरित्र तत्काल बदल जाएगा। अभी भी बीजेपी उसी पुराने नैरेटिव और चरित्र को दुहरा रही है। ख़ुद धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे में लिखा कि विदेशी शक्तियाँ हावी न हो जायें, इसलिए देशहित में वे इस्तीफा दे रहे हैं। इसी बात को अन्य मंत्रियों ने, यहाँ तक कि राष्ट्रीय अध्यक्ष तक ने, दुहराया और धर्मेंद्र प्रधान को मुरैठा बाँधकर उनके इस्तीफ़े को सम्मानित किया गया। यह पूरा प्रकरण बिलकिस बानो के अपराधियों को जेल से छोड़े जाने के बाद सम्मानित किए जाने की याद दिला देता है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जिस प्रहलाद जोशी को शिक्षा विभाग का प्रभार दिया गया, उन पर सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोपियों को बेल देने का समर्थन करने का भद्दा आरोप लगाया जा रहा है। शिक्षा जैसे नैतिकता-प्रधान विभाग में ऐसी मानसिकता के व्यक्ति का प्रभारी बनना असहज करता है। इसलिए कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन ने न तो सरकार बदली और न ही सरकार का चरित्र बदला। इस घटना का निष्कर्ष वर्तमान सत्ता के चारित्रिक बदलाव के रूप में निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस घटना से राजनीतिक मनोविज्ञान बदल सकता है। मोदी युग की राजनीति का एक बड़ा आधार रहा है- नेता की मजबूत छवि, सरकार की निर्णायक क्षमता, विपक्ष की कमजोरी। सीजेपी ने स्वतंत्र नागरिक दबाव के रूप में एक चौथा तत्व दिखाया है। यदि यह बार-बार सफल होता है,तो सत्ता की निर्णायकता की धारणा कमजोर हो सकती है। तब एक मंत्री का इस्तीफा केवल एक इस्तीफा नहीं रहेगा। वह एक मिसाल बन जाएगा। इस तरह सरकार न बदलने के बावजूद उसने सत्ता के व्यवहार की एक सीमा बदल दी।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर स्वीकार किया गया। अर्थात अंतिम संवैधानिक निर्णय सरकार की अपनी प्रक्रिया के भीतर ही हुआ। इसलिए यह कहना गलत होगा कि सड़क ने सीधे सरकार को गिरा दिया। लेकिन यह कहना बिल्कुल उचित है कि सड़क ने सरकार को अपना राजनीतिक हिसाब फिर से करने के लिए मजबूर किया। और यह छोटी बात नहीं है। फिर भी इस आंदोलन की असली उपलब्धि ‘मंत्री हटाना’ नहीं, सरकार की जवाबदेही (accountability) को पुनर्जीवित करना है। यह इसलिए कि भारतीय लोकतंत्र में पिछले कुछ समय से जनता के सामने एक विचित्र अनुभव था कि ‘आप हमें अगली बार वोट से हटा सकते हैं।’ सीजेपी ने इसके सामने दूसरा प्रश्न खड़ा किया- ‘लेकिन तब तक हम आपको जवाबदेह कैसे बनाएँ?’ यही नागरिक राजनीति का मूल प्रश्न है। चुनाव लोकतंत्र का अंत नहीं है। चुनाव के बीच नागरिक का अधिकार समाप्त नहीं होता। इस आंदोलन ने शायद युवाओं की एक पीढ़ी को यह अनुभव दिया है कि सरकार से प्रश्न पूछना केवल विपक्ष का काम नहीं है। यह लोकतंत्र की दृष्टि से बहुत बड़ा परिवर्तन हो सकता है।

एक और बहुत महत्वपूर्ण बात। इस आंदोलन ने यह साबित किया है कि डिजिटल राजनीति अब सड़क की राजनीति को पैदा कर सकती है। यह घटना भारतीय राजनीति के लिए तकनीकी रूप से भी महत्वपूर्ण है। सीजेपी पहले एक ऑनलाइन मजाक/व्यंग्यात्मक राजनीतिक पहचान के रूप में उभरी और फिर सड़क पर पहुँची। AP/Washington Post की रिपोर्टिंग में भी इसे इसी तरह ऑनलाइन आंदोलन से वास्तविक राजनीतिक प्रदर्शन की ओर बढ़ते हुए वर्णित किया गया। इसका अर्थ यह भी है कि भविष्य में राजनीतिक आंदोलनों की शुरुआती सहमति शायद WhatsApp/Instagram/X/YouTube आदि समुदाय में हो सकती है। इसका यह मतलब नहीं है कि राजनीतिक या जन संगठनों का महत्व कमजोर या समाप्त हो गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म लाखों लोगों तक पहुँचने और अपने मुद्दे से जोड़ने का आसान माध्यम हो गया है, जो पारंपरिक तरीक़े में कठिन है। लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म के लाखों व्यूज़ और फॉलोअर्स वास्तविक आंदोलन नहीं बनाते। आंदोलन तब बनता है जब नाराज़गी, पहचान, संगठन, स्थानीय नेटवर्क, सड़क, बातचीत, संस्थागत परिवर्तन की श्रृंखला बनती है। सीजेपी इस श्रृंखला के बीच तक पहुँच गयी है। अभी अंतिम परिणाम नहीं आया है। 

इस आंदोलन को यदि गौर से देखते हैं तो इंस्टाग्राम, एक्स आदि पर लाखों फॉलोवर्स की बाढ़ देखकर अभिजीत दीपके को लगा कि आंदोलन को जमीन पर उतारने का यही सही वक़्त है। लेकिन आंदोलन जब डिजिटल मंच से जमीन पर उतरा तो बमुश्किल 100-50 छात्र और अन्य लोग शामिल हुए। वह तो सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल ले जाने की घटना और संसद में कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों द्वारा इस मुद्दे को सख्ती से उठाये जाने और प्रधानमंत्री के आवास का घेराव आदि राजनीतिक कार्रवाइयों से यह आंदोलन परवान चढ़ा और नतीजे तक पहुँचा। इन परिघटनाओं का यह स्पष्ट अर्थ निकलता है कि डिजिटल प्लेटफार्म पर मुद्दा तो बनाया जा सकता है, लेकिन सांगठनिक ढाँचे और राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना लक्ष्य हासिल करने में संशय है। भीड़ तहस-नहस तो कर सकती है, निर्माण नहीं करती। और, निर्माण के लिए एक मुद्दे पर तात्कालिक उत्तेजना भर काफ़ी नहीं है, बल्कि सर्वांगीण संरचना की स्पष्ट वैचारिकी आवश्यक है।

सीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी भी वही है, जो उसकी ताकत बनी- उसका व्यक्तिकेंद्रित स्वरूप। अभी तक आंदोलन का चेहरा बहुत हद तक अभिजीत दीपके रहे हैं। व्यक्तिकेंद्रित होने के कारण उन पर न आरोप गढ़े जा सके, न बदनाम किया जा सका। कोशिश की गयी, मगर वह चला नहीं। बल्कि राजनीतिक छल-छद्म से ऊबे हुए आम आदमी को उनमें सच्चाई दिखायी पड़ी। यह उनकी ताक़त हुई। लेकिन इतिहास बताता है कि व्यक्ति-केंद्रित आंदोलन सत्ता के लिए आसान होते हैं। क्योंकि सत्ता व्यक्ति को बदनाम कर सकती है, विभाजित कर सकती है, बातचीत में अलग कर सकती है, पद या प्रतिष्ठा दे सकती है, कानूनी दबाव डाल सकती है,या उसके स्थान पर किसी दूसरे चेहरे को खड़ा कर सकती है। लेकिन यदि आंदोलन में हजारों स्वतंत्र नेतृत्वकर्ता पैदा हो जाएँ तो स्थिति बदल जाती है। इसलिए सीजेपी का अगला चरण तय करेगा कि यह केवल “दीपके आंदोलन” है या वास्तव में “युवा नागरिक आंदोलन”।

इस पूरे घटनाक्रम को ‘मोदी सरकार झुक गयी’ या ‘सरकार की हार’ कहना अभी संपूर्ण सत्य नहीं होगा। बल्कि इसे सरकार का रणनीतिक रूप से पीछे हटना कहना ज़्यादा समीचीन होगा। इसलिए कि मोदी सरकार ने सरकार नहीं बदली, शिक्षा नीति नहीं बदली, परीक्षा व्यवस्था तत्काल नहीं बदली, सत्ता की संरचना नहीं बदली और न ही किसी व्यापक राजनीतिक जवाबदेही को स्वीकार किया। उसने अपना चरित्र भी नहीं बदला। केवल एक मंत्री को हटाया और कुछ ठोस रियायतें दीं। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। सरकार ने शायद यह आकलन किया कि एक मंत्री को बचाने की राजनीतिक लागत अब मंत्री को हटाने की लागत से अधिक हो गयी है। यही कारण है कि इसे सरकार की पराजय से ज्यादा लागत-लाभ पुनर्गणना (cost-benefit recalculation) के रूप में देखना चाहिए।

अनेक लोग इसे ‘मोदी युग के अंत की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं। ऐसा निष्कर्ष उत्साह के अतिरेक से अतिरंजित है। एक सरकार का मूल्यांकन किसी एक आंदोलन से नहीं होता। बीजेपी के पास अभी भी विशाल संगठन, मजबूत चुनावी मशीनरी, संसाधन, नेतृत्व, वैचारिक नेटवर्क, व्यापक मतदाता आधार है। इसलिए सीजेपी की जीत को सीधे चुनावी सत्ता-परिवर्तन में बदलना बहुत कठिन होगा। लेकिन राजनीति में कभी-कभी चुनाव हारने से पहले राजनीतिक मनोविज्ञान बदलता है। सीजेपी ने अभी वही किया है, या कम-से-कम उसकी संभावना पैदा की है।

यह सही है कि ‘एक व्यक्ति के बदल जाने से व्यवस्था नहीं बदल जाती।’ लेकिन इसमें एक वाक्य और जोड़ लें कि व्यवस्था को बदलने से पहले जनता को यह विश्वास होना जरूरी है कि व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है। सीजेपी ने शायद यही किया है। धर्मेंद्र प्रधान का जाना व्यवस्था-परिवर्तन नहीं है। लेकिन एक ऐसी व्यवस्था में, जहाँ लंबे समय तक यह धारणा मजबूत होती रही हो कि सत्ता के विरुद्ध सड़क का दबाव अंततः सत्ता को नहीं झुका सकता, वहाँ सरकार का पीछे हटना जनता की राजनीतिक कल्पना में एक नया वाक्य जोड़ता है- ‘सरकार को पीछे हटाया जा सकता है।’ लोकतंत्र में यह वाक्य बहुत शक्तिशाली होता है। इस तरह यह ‘सरकार की हार’ से अधिक ‘नागरिक राजनीति की वापसी’ है। बड़ा प्रश्न अब यह नहीं है कि धर्मेंद्र प्रधान क्यों गये, बल्कि यह है कि क्या भारत में अब ऐसी राजनीतिक संस्कृति बन सकती है, जिसमें किसी मंत्री का इस्तीफा किसी एक व्यक्ति की बलि न होकर संस्थागत जवाबदेही की शुरुआत बने?

यदि इसका उत्तर ‘हाँ’ होता है, तो सीजेपी भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना बन जाएगी। यदि उत्तर ‘नहीं’ होता है, तो कुछ महीनों बाद प्रधान की जगह जोशी होंगे, परीक्षा व्यवस्था वही होगी, युवाओं की बेचैनी वही होगी और अगला ‘कॉकरोच’ फिर किसी दूसरी जगह पैदा होगा। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गहरा राजनीतिक अर्थ है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
Dr. Anil Kumar Roy

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Articles: 61

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *