दो दिन पूर्व सुबह-सुबह आसमान से घना कुहरा उतर आया था, लेकिन दिन चढ़ते ही सूरज दीप्त हो उठा था। दो दिनों से हल्का कुहरा है, लेकिन इस कुहरे ने सूरज को घेर रखा है। सूरज महाराज उगना चाहते होंगे, मगर कुहरे से परेशान हैं। कभी हाथी भी चींटी के फेरे में अपनी औकात भूल जाता है। सूरज की हाथी वाली दशा है। घने कुहरे के दिन आम्र-पल्लवों से ओस टप टप कर गिर रहा था, अभी ओस पूरी तरह से गायब है। आसमान में हल्के कुहरे ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। वह आसमान को पिघलने भी नहीं दे रहा।
आदमी को लगता है कि वह ही धरती का नियंता है। एक दिन उसका शरीर अर्थी पर पड़ा रहता है। उसके लिए हल्के-फुल्के आँसू जरूर बहते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर इस बात की तैयारी हो रही होती है कि अर्थी कैसे जल्द-से-जल्द चिता बने। हम अनलिमिटेड नहीं हैं। संसार में रहने की एक लिमिट है। शरीर एक सीमा के बाद छीजने लगता है। जिंदगी की तमाम जीतें हार में तब्दील होने लगती हैं। अंतिम क्षण अफसोस करने से बेहतर है कि पहले से सावधान हो जायें।
पांडव को तेरह वर्ष का वनवास मिला था। वे वन-वन भटक रहे थे। उन्हें जोरों की प्यास लगी। नकुल पानी लाने एक सरोवर के पास गया। वहाँ एक यक्ष रहता था। उसने कहा कि पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, तब तुम सरोवर से पानी ले सकते हो। नकुल ने उसकी अवहेलना की और पानी लेने लगा। यक्ष ने उसे बेहोश कर दिया। इसी तरह की हालत सहदेव, अर्जुन और भीम की भी हुई। युधिष्ठिर जब पहुँचा, तब भी यक्ष ने अपने प्रश्नों का उनसे भी उत्तर माँगा। युधिष्ठिर से यक्ष ने कई प्रश्न पूछे थे, जिनमें से एक प्रश्न था कि संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि हर रोज आँखों के सामने कितने ही प्राणियों की मृत्यु हो जाती है । यह देखते हुए भी इंसान अमरता के सपने देखता है। यही महान आश्चर्य है।
सदियों से यह आश्चर्य हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा है, लेकिन हम चेत नहीं रहे। यहाँ तक कि धार्मिक लोग जो शरीर की नश्वरता की बात करते हैं, वे भी छल-कपट में लिप्त रहते हैं। वे इतने माहिर होते हैं कि धर्म से भी उगाही करते हैं। धर्म उनके लिए मुनाफे का धंधा है। वे युधिष्ठिर और यक्ष के चक्कर में क्यों पड़ें? वे तो संसार में ही मस्त हैं। संसार से परे की चीज मात्र प्रवचन के लिए है। प्रवचन देने के लिए बड़े बड़े मंच सजते हैं और गहमागहमी के बीच आत्मा और परमात्मा की बात होती है। मुनाफे का धंधा देख कर कुछ कामचोरों को तो काम मिल ही गया है।
इधर नेताओं ने जब देखा कि इससे लाभ ही लाभ है, तो उन्होंने भी प्रवचन करना शुरू किया। लोगों ने धर्म को धंधा बनाया। नेता एक कदम और आगे बढ़ गये। इन्होंने दावा किया कि वे इंदिरा आवास की तरह जगह-जगह परमात्मा को भी आवास बना कर देंगे। नतीजा यह हुआ है कि जगह-जगह परमात्मा के लिए छोटे, मंझोले और बड़े आवास बनाए जा रहे हैं। परमात्मा नये-नये आवास पाकर इस कदर खुश हैं कि उन्होंने प्रण ले लिया है कि भारत भूमि छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे।
भारत के दत्तक पुत्र बांग्लादेश आजकल फनफनाए हुए है। उसने अपने अल्लाह के लिए कसम खायी है कि यहाँ ईश्वर को टिकने नहीं देंगे। सो मंदिरों पर वे हमले कर रहे हैं। मनुष्य बड़ा चालाक है। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अल्लाह-ईश्वर को गढ़ लेता है और धमा-चौकड़ी मचाते रहता है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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