Category जन पत्रकारिता

असमानता और सार्वजनिक शिक्षा के बीच संबंध

shallow focus photo of girl holding newspaper
दुनिया के अलग-अलग देशों में गहरी आर्थिक असमानता है और यह असमानता एक देश के भीतर अलग-अलग-क्षेत्रों और समुदायों में भी चिंताजनक रूप से व्याप्त है। यह आर्थिक असमानता शैक्षिक अवसरों की असमानता सृजित करती है और शैक्षिक असमानता सामाजिक-आर्थिक असमानता को पुनर्स्थापित करती है।

इन दिनों : तर्क, ज्ञान और अंधश्रद्धा

"ज्ञान के विस्फोट हो जाने के बाद भी हमने सम्मान के साथ जीना नहीं सीखा है और न दूसरे को सम्मान के साथ जीने देना चाहते हैं। नफ़रत और हिंसा मूलमंत्र बन गई है।" - इसी आलेख से

वंदे मातरम् : राष्ट्रभाव का गीत या राजनीतिक विवाद?

"राष्ट्रवाद की विरासत को हथियाने की यह प्रवृत्ति असल में इतिहास के सरलीकरण और चयनात्मक स्मृति का परिणाम है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : तम का सागर लहराता है

"जिसे कोई काम न मिला, वह देश चला रहा है। घर भर रहा है। जिसे काम मिला, वह मजे कर रहा है। शहर-दर-शहर में अपार्टमेंट पीट रहा है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : फाइव ट्रिलियन का सपना और लोगों पर बुलडोजर

"संसद में भी काँव-काँव हो रहा है। मैं अपने गाँव में देखता था कि दो औरतों ने लड़ाई की शुरूआत की, फिर उनके साथ अन्य औरतें झींका देने आ गई।‌ खूब लड़ाई हुई। गर्जन भी और गालियाँ भी। सभी को मालूम है कि नतीजा कुछ नहीं आयेगा।‌ संसद की हालत गाँव की गली से बदतर है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : अपने शहर में एक सुबह

बात केवल शिक्षा के लिए समर्पित स्वतंत्रता सेनानी दीप नारायण सिंह के मकान में जिला जज का आवास बनाने और लाजपत पार्क में लाला लाजपत राय की कोई निशानी नहीं होने भर की नहीं है। बात है एक मुकम्मल इतिहास को दफ़न किए जाने की।

इन दिनों : कलियुग के अघोषित ईश्वर

"बहुत से लोग इन पर हंसते हैं। जो हंस नहीं पाते, वे विश्वास करते हैं। जो विश्वास नहीं करते, उन्हें भी लगता है कि क्या ठिकाना, जो कह रहे हैं, वही सच हो।" - इसी आलेख से

इन दिनों : लोकतंत्र पर मंडराते खतरे

संसद अब सवाल और जवाब नहीं, आरोप और प्रत्यारोप की जगह हो गयी है। राष्ट्र के अस्तित्व और लोकतंत्र की बुनियाद के जरूरी प्रश्न भी भद्दी बहसों में खो जाती है।

इन दिनों : वंदे मातरम और माता की रुलाई

"मान लिया कि उन्हें महात्मा गांधी और नेहरू पसंद नहीं है। उनकी तस्वीरें हिन्दू महासभा और आरएसएस के दफ्तरों में नहीं लगाती जा सकतीं। कम-से कम-सरदार पटेल, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीरें तो लगाते। मगर किसी आर एस एस के दफ्तर में इनकी तस्वीरें नहीं हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : पुनर्जागरण की जरूरत और पाखंडियों के स्वर

यह देश आज भी अस्त-व्यस्त, शंकालु और अरक्षित है। अनेक प्रयासों के बावजूद पुनर्जागरण के बदले प्रतिपुनर्जागरण हो रहा है। पढ़िए इस लेख में।