
"जहाँ सोचना बंद या अवरुद्ध हो जाय, वहाँ जंगलराज शुरू होता है। सत्ता को सोचने वालों से बहुत डर लगता है। जंगल का राजा सिंह होता है। वह भी सोचता कम है और अन्य जानवरों को भी सोचने नहीं देता और भयभीत रखता है।" - इसी आलेख से

"सवाल सीधा है और असहज करने वाला भी— भारत का लोकतंत्र किसके लिए काम कर रहा है? उस आम नागरिक के लिए, जो टैक्स देता है, वोट देता है और नियम मानता है? या फिर उन कॉरपोरेट कंपनियों के लिए, जो राजनीतिक दलों को हज़ारों करोड़ रुपये का चंदा देकर नीतियों तक सीधी पहुँच बना लेती हैं?" - इसी आलेख से

"विक्रमशिला हो, या तक्षशिला, उस समय के अनुसार उत्तम शिक्षा दे रही थे। धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति फल-फूल रही थी। इसलिए नहीं कि किसी देवी-देवता का वरदान था। हम ही थे जो मंदिर को सुंदर बना रहे थे। कला समृद्ध हो रही थी। संगीत की शाला थे मंदिर, मधुर भजन मन को शांत करती थी।" इसी आलेख से

"अमानवीयता में कुरूपता है और संवेदना में सौंदर्य है। मनुष्य प्रकृति को खदेड़ता जा रहा है। वह जिसके कारण जीवित है, उसके खिलाफ ही युद्ध ठान रखा है।" इसी आलेख से

"क्या है इहलोकतंत्र? मैंने पाया यह दुनिया मेरी है। मैं इसे लिख रहा हूँ, ना सिर्फ़ शब्दों में, बल्कि अपने कर्मों से। मैंने अपने कर्म लिख डाले।" - इसी आलेख से

"धर्म मनुष्य की एक कमजोर नस है, जिसे सहला कर सत्ता तो प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन बुनियादी समस्याओं को सुलझा नहीं सकते। जो देश धार्मिक बन गये हैं, उस देश की जनता लोकतांत्रिक शासन चाहती है। और, जो देश धार्मिक बन नहीं पाया, उस देश में धार्मिक कट्टरता सत्ता दिला रही है।" इसी आलेख से

"जीवन अर्थवान है। इस अर्थ के वितरण की एक परिकल्पना है, पब्लिक पालिका। इस लोकतंत्र को एक चौथा मजबूत खंभा चाहिए, वह खंभा आर्थिक हो सकता है। पत्रकारिता तो दर्शक मात्र है। कहीं से सुनकर ख़बरें सुनाती है। आर्थिक अगर कोई खंभा होता तो सोचिए!" - इसी आलेख से।

"अमेरिका और जापान जैसे देशों में एक प्रयोग हो रहा है, जिसमें युवा और बुजुर्ग दोनों साथ-साथ रहते हैं और दोनों एक दूसरे से सीखते हैं, जिसे ‘मिराबेला माडल' के नाम से पुकारा जा रहा है। न्यूयॉर्क की एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी ने यह प्रयोग किया है।" - कैसे? पढ़िए इस आलेख में।

"हम मूर्ख हैं, या बनाये जा रहे हैं? अब तो समझ भी नहीं आता। कॉलेज के खुलने नहीं, बंद हो जाने के ढोल पीटे जा रहे हैं, क्योंकि अधर्मियों का दाखिला हो गया था। लगता तो है, हम मूर्ख हैं भी, और बनाये भी जा रहे हैं।" - इसी आलेख से

"ज्ञानियों की एक जमात की हालत साँप-छुंछदर वाली है। जीना है तो सत्ता के चरण पखारने हैं। नतीजा है कि वे अपनी चंचल बुद्धि के बदौलत जैसे-जैसे सत्ता बदलती है, वे भी बदल जाते हैं। दल बदलू नेताओं की कोई कमी इस भारतभूमि पर पहले भी नहीं थी, अब विचार - बदलू नेताओं की कोई कमी नहीं है।" - इसी आलेख से