इन दिनों : वैचारिक उदात्तता और संकीर्णता

"अंदर गया तो एक शिक्षिका अकेली अपने कमरे में बैठी थी। मुझे देखते ही खड़ी हो गई। प्रणाम किया और हाल-चाल पूछा। मैंने उनसे पूछा कि कक्षाएँ ख़ाली क्यों हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि दोनों सत्र के छात्र सेंट अप हो चुके हैं। ...." इसी आलेख से

कल मैं हिंदी विभाग गया था। मैंने वहाँ एम ए की पढ़ाई भी की है और उसी विभाग के अध्यक्ष पद पर तीन वर्ष रहा। गर्मी की छुट्टियों के बाद विभाग खुल गया था। विभाग पहुँचा तो सूना-सूना-सा लगा। कोई छात्र नहीं था।

विभाग की सीढ़ियों पर चढ़ रहा था तो चतुर्थ वर्गीय एक कर्मचारी ने प्रणाम किया। मैं नोटिस करता रहा हूँ कि धूप हो या बारिश- यह कर्मचारी ज़रूर विभाग में रहता है। विभाग में दो ही कक्षाएँ हैं। एक को मैंने फणीश्वरनाथ रेणु जी के नाम कर दिया है और दूसरे को राधाकृष्ण सहाय के नाम पर। निगाहें कक्षाओं पर गईं। उन पर ताले लगे थे। अंदर गया तो एक शिक्षिका अकेली अपने कमरे में बैठी थी। मुझे देखते ही खड़ी हो गई। प्रणाम किया और हाल-चाल पूछा। मैंने उनसे पूछा कि कक्षाएँ ख़ाली क्यों हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि दोनों सत्र के छात्र सेंट अप हो चुके हैं।

हेड एक बार विभाग आकर विश्वविद्यालय गये थे। विश्वविद्यालय में शिक्षकों की प्रोन्नति की बैठकें चल रही हैं। मैंने उन्हें फ़ोन किया। उन्होंने कहा कि मैं दो मिनट में आता हूँ। वे आ भी गए। हेड और मेरी नियुक्ति साथ साथ हुई है। यों हम दोनों के विचारों में आकाश-ज़मीन का अंतर है, मगर विभागीय कार्यों में कभी कोई दिक़्क़त न उनकी तरफ़ से हुई, न मेरी तरफ़ से। धीरे धीरे पाँच-छह शोध छात्र-छात्राएँ भी आ गये।

यहाँ यह दर्ज करना ज़रूरी है कि विभाग के सूनापन की वजह विश्वविद्यालय की व्यवस्था है। पीजी में कार्यरत शिक्षक को नव निर्मित डिग्री कॉलेज में भेज दिया गया। विभाग में शिक्षकों की तीन या चार पद रिक्त हैं। जो बचे हैं, उन्हें इधर से उधर करने में देर नहीं लगती।

एम ए उच्चतर अध्ययन है। इसमें पढ़ाई के साथ छात्र-छात्राओं की शोध-बुद्धि को भी परिष्कृत किया जाता है। सेमेस्टर सिस्टम आने के बाद छात्र-छात्राओं को नंबर बहुत आने लगे, लेकिन ज्ञान का सिलसिला थम गया। पहले दो वर्षीय पाठ्यक्रम होता था। एक बार परीक्षा होती थी। दो वर्ष पढ़ाई का सिलसिला चलता था। मैं उसी दौर का छात्र था। विभाग में क्या रौनक थी? शिक्षक समय पर आते। पढ़ाई तो होती ही, छात्र-छात्राओं की अपनी दुनिया होती। किसी के पास मुक्तिबोध की किताबें होतीं तो किसी के पास धूमिल की। हँसी-मजाक, बहस-मुबाहिसे। नक्सल आंदोलन से लेकर वाहिनी द्वारा चलाए गये बोधगया भूमि मुक्ति आंदोलन तक की चर्चा होती।

विश्वविद्यालय नाम इसलिए है, इसलिए है कि वहाँ वैश्विक चर्चा हो, ज्ञान का आदान प्रदान हो। लेकिन अब विश्वविद्यालय सिर्फ़ डिग्रियों के आदान प्रदान का माध्यम है। अगर किसी शिक्षक ने कुलपति से सवाल कर दिया तो शिक्षक पर दंडात्मक कार्रवाई होने लगेगी। विश्वविद्यालय कैंपस में कोई वैचारिक गोष्ठी नहीं होगी। छात्र-छात्राओं तो डराया-धमकाया जाएगा। नामांकन से लेकर शोध तक में धाँधली होगी। ऐसे विश्वविद्यालय से जब छात्र डिग्री लेकर निकलेंगे तो देश की कितनी सेवा करेंगे और कैसी सेवा करेंगे?

नीट के प्रश्न पत्र पहुँचाने के लिए एयरफ़ोर्स की सेवा और प्रधानमंत्री की निगरानी ही बताती है कि भ्रष्टाचार शिष्टाचार में तब्दील हो गया है। किसी के शासन में विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों का नब्बे बार लीक हो जाना कोई मामूली घटना नहीं है, लेकिन ज़िम्मेदारी किसी की नहीं। असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है।

उच्चतर शिक्षा के प्रति लापरवाही बढ़ती ही जा रही है। हम यह कोशिश नहीं कर रहे कि देश की परिस्थितियों के अनुरूप उच्च शिक्षा का प्रबंधन किया जाए, न कि विदेशी विश्वविद्यालयों की देखादेखी उसकी सरंचना बनाई जाय। वैचारिक विमर्श हो, लेकिन हमारे अंदर ग़ुलामी मानसिकता न आये।

एक तो भारत आंतरिक ग़ुलामी से पीड़ित है। जाति व्यवस्था एक भ्रष्ट व्यवस्था है। उसकी मांस-मज्जा में भ्रष्टाचार है। आंतरिक ग़ुलामी से लड़े बिना और बाहरी विचारों को समझे बिना इस देश की पुनर्रचना संभव नहीं लगती ।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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