क्या आपको अभी भी न्यायपालिका, चुनाव आयोग, विधायिका और कार्यपालिका पर भरोसा है? न्यायपालिका जिस तरह से जज की नियुक्ति करती है, वह लोकतंत्र के लिए विश्वसनीय है? कॉलजियम सिस्टम तो साफ-साफ वंशवाद का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस सिस्टम से चुने हुए अधिकांश जज निष्पक्ष हो ही नहीं सकते। इसलिए हाल के वर्षों में दिए गये फैसलों से बहुत नहीं चौंकना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता आज पूरी तरह खतरे में है। वह न संविधान के प्रति ज़िम्मेदार रह गयी है, न जनता के प्रति।
किसी भी राज्य में चुनाव के पूर्व चुनाव आयोग लाखों नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल नहीं कर पाता है और सुप्रीम कोर्ट ऐसे बिगड़ैल चुनाव आयोग का समर्थन करता है तो यह एक संवैधानिक अपराध है। यह एक असाधारण दुर्घटना घट रही है, जिसका व्यापक असर लोकतंत्र पर पड़ेगा। चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति क्या पूर्वाग्रह मुक्त है? प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की टोली के एक मंत्री अगर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करे तो उसकी नियुक्ति निष्पक्ष कैसे होगी? उस पर मौजूदा सरकार ने क़ानून बनाया कि सेवानिवृत्ति के बाद भी चुनाव आयुक्त पर कोई मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता। यह क़ानून तो चुनाव आयोग को भ्रष्ट करने और मनमाने ढंग से इस्तेमाल करने का साफ-साफ़ रास्ता खोलता है। कई राज्यों के चुनाव में चुनाव आयोग की संदिग्ध भूमिका है। वह सरकार की न केवल तरफ़दारी कर रहा है,बल्कि वह संविधान को भी चुनौती दे रहा है ।
कार्यपालिका तो सरकार के गीत गाने के लिए मजबूर है। लोकतंत्र की कार्यपालिका को नये तरीक़े का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। उनके ठाट-बाट औपनिवेशिक राज के हैं और उनके चाल-ढाल भी। अंग्रेज़ों की बची संतानों में सर्वश्रेष्ठ संतानें हैं ये। उन्हें यह भ्रम रहता है कि वे सबकुछ के जानकार हैं और जनता बुद्ध नहीं, बुद्धू होती है। जिस जनता के पैसे पर ये संतानें पलती हैं, उन्हें दुत्कारने में जरा भी देर नहीं करतीं। इसलिए इन्हें नयी ट्रेनिंग की दरकार है।
विधायिका आज मजाक बन गई है। चुनाव प्रक्रिया के भ्रष्ट होने के बाद सही विधायिका का चुनाव असंभव हो गया है। पूँजीपतियों का पैसा, चुनाव आयोग का अपहरण और झूठे वादों ने विधायिका को तहस-नहस कर दिया है। उस पर भारतीय समाज की दो सर्वोत्तम बुराइयाँ- जाति और संप्रदाय। यानी कोढ़ में खाज। तो सवाल है कि रास्ता क्या है? देश जिस मुहाने पर खड़ा है, उससे निकलने का कोई तरीक़ा बचा है या नहीं?
जनता को लोग कहते हैं कि वह बहुत भुलक्कड़ होती है। जनता भुलक्कड़ नहीं होती, बल्कि उसकी चेतना में सरकार की एक-एक बदतमीज़ी जमा होती रहती है। जैसे शिशुपाल की गालियाँ कृष्ण के ज़ेहन में जमा होती रहीं। जब सौ पूरी हुई, तो शिशुपाल की गर्दन उड़ गई। सरकार को लगता है कि सब दिन ऐसे ही चलेंगे। वे सिस्टम ख़रीद कर या डरा कर या अपने लोगों को घुसा कर चलाते रहेंगे तो यह संभव नहीं है। बदलाव के लिए सिर्फ़ जनता का कोर्ट है। जिसे देश से प्यार है और देश बदलाव चाहता है तो जनता की कोर्ट में चले।
कॉकरोच जनता पार्टी से आप सहमत हों या असहमत, लेकिन उसने सरकार को डरा दिया है और बता भी दिया है कि असंतोष किसी दिन दावानल होगा। सरकार नहीं डरती तो सोशल मीडिया से कॉकरोच को ब्लैक आउट करने की कोशिश क्यों करती? कभी-कभी जिस भूत को आप अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए तैयार करते हैं, वह सीने पर चढ़कर तांडव भी करता है। इस सरकार को लाने में सोशल मीडिया ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई थी, अब यह मीडिया और भी लंबी-चौड़ी और घर-घर विस्तार पा गई है। एआई के इस युग में एक बदलाव संभव है। मौजूदा सरकार अपना विश्वास खो चुकी है और चतुर्दिक निराशा फैली है। और सरकार इतनी डरी हुई है कि महँगाई मार गई वाला वीडियो तक रोकने में लगी हुई है। बदलाव के साफ़-साफ़ एजेंडे को लेकर कूद पड़ने का वक़्त है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







