Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : रिश्तों की मृत्यु कहीं आदमी की मृत्यु तो नहीं!

"यह बात सही है कि आर्थिक तंगी भी कई समस्याओं को जन्म देती है। लेकिन आर्थिक तंगी खत्म होने के बाद भी आदमी संतुष्ट कहाँ रह पाता है? आखिर आदमी क्या ढूँढ रहा है?" - इसी आलेख से

इन दिनों : हर मर्ज की एक दवा- गोबर और गौ मूत्र

"पाखंड और अंधविश्वास परोस कर लोगों के कान, आँख और मुँह बंद कर दिए। ऐसी सीख और पट्टी पढ़ाई कि वे असत्य को सत्य मानने लगे। प्रधानमंत्री को देश को नये मुकाम पर ले जाना था तो चंदन टीका लगा कर सोलहवीं शताब्दी में खींच कर ले गए।" - इसी आलेख से

इन दिनों : सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है युधिष्ठिर?

"आदमी को लगता है कि वह ही धरती का नियंता है। एक दिन उसका शरीर अर्थी पर पड़ा रहता है। उसके लिए हल्के-फुल्के आँसू जरूर बहते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर इस बात की तैयारी हो रही होती है कि अर्थी कैसे जल्द-से-जल्द चिता बने।" - इसी आलेख से

ग्रामीण रोजगार की गारंटी का योजना में बदल जाना 

'मनरेगा' के बदले 'वीबी जी राम जी' लाया जाना केंद्र सरकार के कई उद्देश्यों की पूर्ति एक ही साथ करता है। इसीलिए उसने विपक्ष के भारी विरोध को बिल्कुल अनसुना कर दिया। कैसे? पढ़ें इस लेख में।

इन दिनों : शिक्षा में शस्त्र और शास्त्र का द्वंद्व

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"भीष्म ने कृपाचार्य से पूछा कि पांडव और कौरव को किस-किस चीज की शिक्षा दे रहे हैं? कृपाचार्य ने उल्लसित होकर उत्तर दिया कि इन्हें मल्ल युद्ध, धनुर्धर विद्या और शस्त्र संचालन की अनेक विद्याएँ दी जा रही हैं। भीष्म पितामह चिंतित हुए।" क्यों? पढ़िए इस आलेख में

इन दिनों : एलन मस्क, भीष्म और जूनियर ट्रंप

"डोनाल्ड ट्रम्प जूनियर और एलन मस्क की वैवाहिक कथा आधुनिक युग की है और शांतनु, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र और पांडु की पुरातन। दोनों ही स्थितियों में स्त्रियों की दशा क्या है?" - पढ़िए इस आलेख में

इन दिनों : कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए

"दरअसल सरकार समझने में असमर्थ है कि राज्य के विकास में काम चाहिए। भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी दफ्तर चाहिए। सम्मान से जीने के संसाधन चाहिए। पेट को अन्न चाहिए।" - इसी आलेख से

बुलडोज़र न्याय बनाम संवैधानिक नैतिकता

"झोपड़ियाँ इसलिए नहीं उगतीं कि लोग क़ानून तोड़ने का आनंद लेते हैं, बल्कि इसलिए कि शहर रोज़गार तो देता है, रहने की जगह नहीं। गाँवों से मजबूरी में हुआ पलायन, असंगठित श्रम, न्यूनतम मज़दूरी और महँगा शहरी आवास—ये सब मिलकर झोपड़ी को अपराध नहीं, बल्कि विकल्पहीनता का परिणाम बना देते हैं।" - इसी आलेख से।

इन दिनों : महात्मा गांधी की दृष्टि में वकील और डॉक्टर

चिकित्सा और वकालत - दोनों ऐसे पेशे हैं, जहाँ पीड़ित और परेशान लोग ही पहुँचते हैं। परंतु दोनों ही जगहों पर उनकी पीड़ा और परेशानी का लाभ उठाया जाता है। इन पेशों में किसी के दुख का इस्तेमाल लाभ पाने के साधन के रूप में किया जाता है।