डकैती क्या होती है, यह आपको डकैत नहीं बताता। डकैती का अर्थ आजकल सरकार बताती है। सरकार से बड़ा डकैत आपको कहीं नहीं मिलेगा। शाम 5 बजे से रात 11 बजे तक आपको बिजली की बहुत ज़रूरत है तो सरकार आपसे प्रति यूनिट दस प्रतिशत ज़्यादा वसूलेगी। सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक कम वसूलेगी। रात 11 बजे से 9 बजे सामान्य बिजली-दर लगेगी।
वैसे ही ट्रेन की भी हालत है। आपके पिता या बेटा या बेटी बीमार है, अचानक आपको दिल्ली या बंगलौर जाना है, सरकार गर्दन काटने के लिए तैयार बैठी है। तत्काल और प्रीमियम में टिकट लीजिए। डेढ गुना-दो गुना ज़्यादा। प्रधानमंत्री हवाई जहाज़ में चढ़ने के लिए चप्पल वाले को पान-फूल लेकर निमंत्रण देते रहे, इधर ज़रूरतमंद नेता को अचानक काम लगा, हवाई जहाज़ का टिकट दन्न-से चढ़ गया। मोटी चमड़ी वाले रेल मिनिस्टर बेशर्मी के साथ बताते हैं कि कितने घंटे पहले टिकट लौटाने के बाद पैसा लौटायेंगे, वरना पैसा ज़ब्त।
लगता है कि यह सिस्टम डकैतों के पास चला गया है। एक आदमी वोट के लिए बार-बार जन्म लेता रहा। यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ। गैस के सिलेंडर की तरह लुढ़कता रहा और सिलेंडर को भी लुढ़काता रहा। बेचारे सिलेंडर! कितनी बार बाज़ार में वोट का साधन बना। कहीं पाँच सौ में तो कहीं फ्री। जैसे ही चुनाव ख़त्म हुआ, सिलेंडर चढ़ गया। जब-जब जनता पर संकट में आता है, सरकार वसूली करने बैठ जाती है। क्या यह कल्याणकारी राज्य का लक्षण है? आपदा में अवसर का आनंद दो लोग उठाते हैं- सरकार और पूँजीपति। मरहूम कवि जानकी वल्लभ शास्त्री को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने वर्षों पूर्व ऐसे बेशर्मों के लिए कह गये- “कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो, पथ निर्देशक वह है। लाज लजाती जिसकी कृति से, धृति उपदेशक वह है।”
आप सबसे लड़ सकते हैं, लेकिन बहुरूपिये से कैसे लड़ियेगा? इंद्रजाल-सा फैला है चतुर्दिक। डकैत सभ्यता का वस्त्र पहन कर आया है। जिसने सधुआया कपड़ा पहन लिया, वह साधु। मैं नहीं जानता कि दुनिया के किसी कोने में ऐसा आदमी होता है या नहीं! यह देश देख रहा है। विष से भरे बाण कलेजे में चुभोए जा रहे हैं और जिसे चुभाया जा रहा है, वह उसे अमृत मान रहा है। बिहार में चुनाव था तो सवा सौ यूनिट बिजली फ्री की गई थी। सरकार को यह नहीं करना था। जो बिजली-दर वाजिब है, उसे लेना चाहिए था, लेकिन उसे को जीतना था। उसने जनता को घूस दिया। अब जीत गई है तो फिर जनता की घेंच पर लगाम लगा रही है।
शराबबंदी हुई। बढ़िया है। देश में शराब बनाना मत रोकिए। सिर्फ़ शराबबंदी कीजिए। नतीजा क्या है? ज़मीन की ख़रीद-बिक्री में बेशुमार टैक्स बढ़ाए गये। जनता से ही पैसा वसूला गया और शराब के अवैध धंधे खुल गए। हर गाँव में शराब उपलब्ध है। शराब ही नहीं, बल्कि हर तरह का सूखा नशा उपलब्ध है। आपको जो चाहिए, मिलेगा। मैं जहाँ घूमने जाता हूँ, वहाँ पेड़ के नीचे पंद्रह से बीस साल के बच्चे रहते हैं। मुझे अच्छा लगता था कि सुबह-सुबह बच्चे घूमने आते हैं। पत्नी ने एक दिन बताया कि ये नशा करते हैं और भद्दी-भद्दी बातें करते हैं। मैंने भी ध्यान दिया। वे हथेलियों पर कुछ रगड़ते और खाते।
पीरपैंती में अड़ानी थर्मल जब देखने गया था तो पाया कि जो पहाड़िया पीड़ित थे, उनमें से कम-से-कम दो ऐसे थे, जिन्होंने भरपूर नशा किया था। मुँह से भभके आ रहे थे। इस लोकतंत्र का कुल लब्बोलुबाब यह है कि जनता की देह में जो भी ख़ून दौड़ रहा है, उसे बूँद-बूँद कर खींच लिया जाए। और महान जनता यह महसूस करती रहे कि बाबाजी की अभूतपूर्व कृपा उस पर बरस रही है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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