इन दिनों : वक़्त का परिंदा रुका है कहाँ! 

"वतन के वास्ते मिट गए बिस्मिल जैसे हज़ारों लोग और अब के सत्ताधारी स्वार्थ के वास्ते वतन को ही चींथ रहे हैं।" - इसी आलेख से
“क्या हुआ ग़र मिट गये अपने वतन के वास्ते 
बुलबुलें क़ुर्बान होतीं हैं चमन के वास्ते।” 
“वक़्त का ये परिंदा रुका है कहाँ,
मैं था पागल जो इसको बुलाता रहा।”
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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