Category जन पत्रकारिता

इन दिनों : एलन मस्क, भीष्म और जूनियर ट्रंप

"डोनाल्ड ट्रम्प जूनियर और एलन मस्क की वैवाहिक कथा आधुनिक युग की है और शांतनु, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र और पांडु की पुरातन। दोनों ही स्थितियों में स्त्रियों की दशा क्या है?" - पढ़िए इस आलेख में

इन दिनों : कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए

"दरअसल सरकार समझने में असमर्थ है कि राज्य के विकास में काम चाहिए। भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी दफ्तर चाहिए। सम्मान से जीने के संसाधन चाहिए। पेट को अन्न चाहिए।" - इसी आलेख से

बुलडोज़र न्याय बनाम संवैधानिक नैतिकता

"झोपड़ियाँ इसलिए नहीं उगतीं कि लोग क़ानून तोड़ने का आनंद लेते हैं, बल्कि इसलिए कि शहर रोज़गार तो देता है, रहने की जगह नहीं। गाँवों से मजबूरी में हुआ पलायन, असंगठित श्रम, न्यूनतम मज़दूरी और महँगा शहरी आवास—ये सब मिलकर झोपड़ी को अपराध नहीं, बल्कि विकल्पहीनता का परिणाम बना देते हैं।" - इसी आलेख से।

इन दिनों : महात्मा गांधी की दृष्टि में वकील और डॉक्टर

चिकित्सा और वकालत - दोनों ऐसे पेशे हैं, जहाँ पीड़ित और परेशान लोग ही पहुँचते हैं। परंतु दोनों ही जगहों पर उनकी पीड़ा और परेशानी का लाभ उठाया जाता है। इन पेशों में किसी के दुख का इस्तेमाल लाभ पाने के साधन के रूप में किया जाता है।

असमानता और सार्वजनिक शिक्षा के बीच संबंध

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दुनिया के अलग-अलग देशों में गहरी आर्थिक असमानता है और यह असमानता एक देश के भीतर अलग-अलग-क्षेत्रों और समुदायों में भी चिंताजनक रूप से व्याप्त है। यह आर्थिक असमानता शैक्षिक अवसरों की असमानता सृजित करती है और शैक्षिक असमानता सामाजिक-आर्थिक असमानता को पुनर्स्थापित करती है।

इन दिनों : तर्क, ज्ञान और अंधश्रद्धा

"ज्ञान के विस्फोट हो जाने के बाद भी हमने सम्मान के साथ जीना नहीं सीखा है और न दूसरे को सम्मान के साथ जीने देना चाहते हैं। नफ़रत और हिंसा मूलमंत्र बन गई है।" - इसी आलेख से

वंदे मातरम् : राष्ट्रभाव का गीत या राजनीतिक विवाद?

"राष्ट्रवाद की विरासत को हथियाने की यह प्रवृत्ति असल में इतिहास के सरलीकरण और चयनात्मक स्मृति का परिणाम है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : तम का सागर लहराता है

"जिसे कोई काम न मिला, वह देश चला रहा है। घर भर रहा है। जिसे काम मिला, वह मजे कर रहा है। शहर-दर-शहर में अपार्टमेंट पीट रहा है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : फाइव ट्रिलियन का सपना और लोगों पर बुलडोजर

"संसद में भी काँव-काँव हो रहा है। मैं अपने गाँव में देखता था कि दो औरतों ने लड़ाई की शुरूआत की, फिर उनके साथ अन्य औरतें झींका देने आ गई।‌ खूब लड़ाई हुई। गर्जन भी और गालियाँ भी। सभी को मालूम है कि नतीजा कुछ नहीं आयेगा।‌ संसद की हालत गाँव की गली से बदतर है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : अपने शहर में एक सुबह

बात केवल शिक्षा के लिए समर्पित स्वतंत्रता सेनानी दीप नारायण सिंह के मकान में जिला जज का आवास बनाने और लाजपत पार्क में लाला लाजपत राय की कोई निशानी नहीं होने भर की नहीं है। बात है एक मुकम्मल इतिहास को दफ़न किए जाने की।