राजनीति में तांडव जारी है। केंद्र सरकार के पास ईडी है, वह वहाँ जरूर पहुँचती है, जहाँ चुनाव हो रहा होता है। पिछले दस वर्षों से ईडी ही ईडी है। सीबीआई लगभग गायब है। ईडी अगर निष्पक्ष ढंग से काम करे तो कोई बात नहीं है, लेकिन वह अगर केंद्र सरकार के इशारों पर नाचने लगे तो वह संदिग्ध हो जाती है। पिछले दस वर्षों में ईडी ने 5,297 मामले दर्ज किए, जिसमें 40 मामले में दोष सिद्ध हुए। इनमें से उसने डेढ़ हजार मामले में प्राथमिकी दर्ज की। ईडी को किसी भी बहाने से किसी के घर प्रवेश नहीं करना चाहिए। उसके पास पुख्ता प्रमाण हो तो वह जरूर कार्रवाई करे और कोर्ट में उसे सिद्ध करे। अधिकतर मामलों में वह प्राथमिकी तक दर्ज नहीं कर पा रही। कोर्ट में दोष सिद्धि का प्रतिशत तो बेहद कम है। क्या इस स्थिति में यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाय कि वह निष्पक्ष ढंग से काम नहीं कर रही और वह किसी अन्य के इशारों पर नाच रही है।
क्या ईडी के ऐसे अफसरों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो रेड डालते हैं और कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं कर पाते? क्या उनकी अफलातूनी कार्रवाई से सामान्य लोग परेशान नहीं होते और उनके मौलिक अधिकारों में क्या यह हस्तक्षेप नहीं है? ईडी की नासमझ कार्रवाई से ईडी पर गहरे सवाल हैं। बंगाल में जो कुछ हुआ, इसमें तरह-तरह के सवाल उठेंगे। एक ओर से कहा जायेगा कि ममता बनर्जी का हस्तक्षेप असंवैधानिक है तो दूसरी ओर से कहा जायेगा कि उसके चुनावी दस्तावेज ईडी चुरा रही थी। मामला कोर्ट में जायेगा और चुनाव तक बहस जारी रहेगी। ऐसी घटनाएँ बताती हैं कि पानी सिर से गुजर चुका है और अब कुछ भी हो सकता है।
महाभारत धर्म की रक्षा के लिए हुआ था। लेकिन यह भी सच है कि महाभारत में धर्म बार बार आहत हुआ। आंखों पर पट्टी बांधे गांधारी कहती है –
“लेकिन अन्धी नहीं थी मैं।
मैंने यह बाहर का वस्तु-जगत् अच्छी तरह जाना था
धर्म, नीति, मर्यादा, यह सब हैं केवल आडम्बर मात्र,
मैंने यह बार-बार देखा था।
निर्णय के क्षण में विवेक और मर्यादा
व्यर्थ सिद्ध होते आए हैं सदा
हम सब के मन में कहीं एक अन्य गह्वर है।
बर्बर पशु अन्धा पशु वास वहीं करता है,
स्वामी जो हमारे विवेक का,
नैतिकता, मर्यादा, अनासक्ति, कृष्णार्पण
यह सब हैं अन्धी प्रवृत्तियों की पोशाकें
जिनमें कटे कपड़ों की आँखें सिली रहती हैं
मुझको इस झूठे आडम्बर से नफ़रत थी
इसालिए स्वेच्छा से मैंने इन आँखों पर पट्टी चढ़ा रक्खी थी।”
देश में आज जो कुछ हो रहा है, उसमें यह बात एकदम सटीक बैठती है कि नैतिकता, मर्यादा, अनासक्ति , कृष्णार्पण – सब-के-सब अंधी प्रवृतियों की पोशाकें हैं। अगर सत्ता में बैठा आदमी मर्यादा और नैतिकता की बात करता है तो वह छल करता है। वह अगर अनासक्ति की बात करता है तो दुनिया को धोखा देता है और अगर कृष्णार्पण या रामार्पण की बात करता है तो पाखंड और फरेब रचता है।
अगर आप ईडी को निष्पक्ष ढंग से काम करने नहीं देते और इसका बेजा इस्तेमाल करते हैं तो दूसरे पक्ष को आप ललकारते हैं। दूसरा पक्ष कमजोर रहेगा तो बदतमीजी सह लेगा, नहीं तो अखाड़े में उतर जायेगा। ऐसे वक्त में दोनों के लिए जीत जरूरी है। चाहे, वह बिलो द बेल्ट तक हमला ही क्यों न करे? भीम के पक्ष में न्याय रहते हुए भी गदा युद्ध के नियमों का उसने उल्लंघन ही किया था। भीम ने कमर से नीचे वार किया जो गदा युद्ध में वर्जित था। अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री मंत्री नियम पालन नहीं करना चाहते तो ममता बनर्जी से उम्मीद क्यों करें?
उम्मीद तो सिर्फ उनसे है, जो लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं। जिन्हें नियम, नैतिकता और सत्य से प्यार है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





