मालवण में तीन समुद्री किनारे हैं – चिवला, सिंधु दुर्ग और एक और। मालवण है तो कस्बा ही, लेकिन शहर के तमाम स्वभाव यहाँ मौजूद हैं। सैकड़ों टैक्सियाँ और बसें आती हैं। कहीं दूर से पर्यटकों को ढो कर लाती हैं। पर्यटक पूरे कस्बे पर छा जाते हैं। उनकी मौज मस्ती का किराया वसूलता है यह कस्बा। समुद्र निरंतर किनारों पर पछाड़ें मारता रहता है। मराठी की एक कविता का भावार्थ है – ‘नदियां प्रेमवश समुद्र से मिलती हैं। महीनों बाद उसे अपने मैके की याद आती है और तब वह बादल बन कर मैके पर बरसती हैं।‘
पाँच-छह दिनों में कई बार समुद्र के पास गया। समुद्र की डेह (लहरें) छोटी-बड़ी होती रहीं, लेकिन उसकी निरंतरता में कोई कमी नहीं आयी। यही समुद्र जब गुस्साता है तो सृष्टि को लील जाता है। जयशंकर प्रसाद ने समुद्र द्वारा सृष्टि को लीलने के बाद की कथा अपने महान काव्य ‘कामायनी’ में कहीं है। जयशंकर प्रसाद के इस काव्य ‘कामायनी ‘ का पहला सर्ग ही ‘चिंता’ सर्ग है। उसकी पहली पंक्ति है – ‘हिम गिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह’। हिमालय के उत्तुंग शिखर पर कौन बैठा हुआ है? बैठा हुआ है मनु। उसका संसार लुट-पिट गया है। सागर उमड़ा और सब-कुछ स्वाहा गया। उसके स्वर्गिक सुविधाएँ और भवन ध्वस्त हो गये। वह हताश, निराश और उदास है। उसके नयन भींगे हैं। कवि ने लिखा है – ‘एक पुरुष, भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।’
समुद्र ने तो नष्ट कर दिया, लेकिन मनु को नीड़ बसाना है। मगर कैसे? कोई है नहीं पास। अकेला मनु क्या करे? जीवन का ओर-छोर समझ में नहीं आ रहा, तो फिर चिंता करता है। धरती पर कदम रखते ही चिंता घेरने लगती है। चिंता होती है, तभी चिंतन होता है। चिंता तात्कालिक स्थितियों से जुड़ी होती है और चिंतन चिंता की एक समझ है और है चिंता से उबरने के लिए रास्ते की तलाश। अगर चिंता न हो, तो चिन्तन संभव ही नहीं है। चिंता सिर्फ नकारात्मकता को ही जन्म नहीं देती, वह समस्याओं से उबरने के लिए प्रेरित भी करती है। व्यक्तिगत चिंता में डर और घबराहट रहती है, लेकिन सामाजिक चिंता हमें चिन्तन की ओर अग्रसर करती है। चिंतन चिंता की मानसिक विवेचना है।
उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, दिल्ली, गुजरात, मध्यप्रदेश के साथी मालवण ( महाराष्ट्र) में इकट्ठे हुए। मालवण में समुद्र की लहरें और साथियों की वैचारिक लहरें। वैचारिक लहरों के केंद्र में राष्ट्र और लोकतंत्र। अंधेरा जो गाढ़ा होता जा रहा है और उस अंधेरे में सरकार नागरिक को उत्पाद में बदलने के लिए तत्पर। साथियों की बहसों में उनकी चिंता और चिंतन परिलक्षित होती रही। कैसे करें और क्या करें?
एक मनु हरेक साथी के अंदर है। यह मनु मनुस्मृति लिखने वाला नहीं है। यह मनुष्य है नव संस्कृति का संदेश देने वाला। हाथों में तूलिका है। हजारों रंग भरने हैं। काले के साथ हरे, नीले, पीले, बैंगनी, गुलाबी। कोई है जो राष्ट्र को रौंद रहा है और लोकतंत्र पर बरछे बरसा रहा है। उसके प्रलय-रथ को थामना है और उसे सीख देनी है – नाश नहीं, सृजन करो। रचने का नाम जीवन है, ध्वंस का नहीं। सात दिनों की यह यात्रा यादगार रही। प्रकृति के नवोन्मेष रूपों से मुलाकात। साथियों का साथ, संवाद और नये सपने। डर में चिंता है, निर्भयता में चिन्तन। यह यात्रा इसलिए भी याद आयेगी, क्योंकि यह डर से निर्भयता की भी यात्रा है – धीर तुम बढ़े चलो, वीर तुम बढ़े चलो। सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो। कदम कभी रूके नहीं। वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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