भारत का शैक्षिक दृश्य सामाजिक पृथक्करण की अति घिनौनी तस्वीर पेश कर रहा है। उच्च और मध्यम वर्ग के लगभग सभी बच्चे अंग्रेजी माध्यम निजी स्कूलों में जा रहे हैं और साधनविहीन पूरे भारतीय बच्चे (जो भारत का दो तिहाई से भी बहुत बड़ा हिस्सा हैं) वित्तीय कारणों से सरकारी स्कूलों में जाने को मजबूर हैं, जहाँ कुछेक स्कूलों को छोड़ कर शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएँ हैं। इस सामाजिक विभाजन के कारण भारतीय सरकारों ने सरकारी शिक्षा प्रणाली से हर तरह से हाथ खींच लिए है और अंग्रेजी माध्यम और भारतीय भाषा माध्यम के स्कूलों की शिक्षा के स्तर में और आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चरित्र में इतना आधारभूत अंतर आ गया है कि इन दो तरह के स्कूलों के बच्चों को एक देश के बच्चे कहना अनुचित ही नहीं, हास्यास्पद भी लगता है।
भारतीय स्कूलों के इस विभाजन को फैसलाकुन वैचारिक आधार अंग्रेजी भाषा माध्यम ने प्रदान किया है, क्योंकि अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की ओर आरम्भ में आकर्षण का सबसे बड़ा कारण अंग्रेजी भाषा माध्यम ही रहा है। (अंग्रेजी भाषा की ओर आकर्षण का कारण भारत में लाभप्रद और सत्ताशाली स्थानों का अंग्रेजी आधारित होना (जो कार्य-कुशलता के आधार पर भी मूर्खतापूर्ण है) और अंग्रेजी भाषा से जुड़े अति हानिकारक भ्रम हैं, जो भारत के हर वर्ग के दिमाग में गहरे बैठे हुए हैं)। इस भयावह विभाजन को दूर करने का सही तरीका क्या है, यह जानने के लिए निम्न तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है।
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शिक्षा-सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के आधारों पर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अच्छे स्कूल नहीं कहा जा सकता। इस सम्बन्ध में कुछ तथ्यों पर नज़र डालना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी मुल्यांकन कार्यक्रम (PISA) के पिछले अध्ययनों के अनुसार (यह अध्ययन हर तीन साल बाद होता है) स्कूल स्तर पर विज्ञान की शिक्षा में शिखर पर वो देश रहे हैं, जो मातृ-भाषाओं में शिक्षा दे रहे हैं। २०१२ में विज्ञानों के स्कूल स्तर की शिक्षा में पहले ५० स्थान हासिल करने वाले देशों में अंग्रेजी में शिक्षा देने वाले देशों का स्थान तीसरा (सिंगापुर), दसवाँ (कनाडा), चौदहवाँ (आयरलैंड) सोलहवाँ (आस्ट्रेलिया), अठारहवाँ (न्यूजीलैंड) और अठाईसवाँ (अमेरिका) थे। इन अंग्रेजी भाषी देशों में शिक्षा अंग्रेजी के साथ-साथ दूसरी मातृ-भाषाओं में भी दी जाती है। २००३, २००६ और २००९ में भी यही रुझान थे। एशिया के प्रथम ५० विश्वविद्यालयों में एकाध ही अंग्रेजी में शिक्षा देता है और भारत का एक भी विश्वविद्यालय इन ५० में शामिल नहीं है। यूनेस्को की एक पुस्तक से निम्न कथन भी यही दर्शाता है कि शिक्षा सफलतापूर्वक केवल और केवल मातृ-भाषा में ही दी जा सकती है: “यह स्वतःसिद्व है कि बच्चे के लिए शिक्षा का सबसे बढि़या माध्यम उसकी मातृ भाषा है। मनोवैज्ञानिक आधार पर यह सार्थक चिन्हों की ऐसी प्रणाली है, जो प्रकटावे और समझ के लिए उसके दिमाग में स्वयंचालक रूप में काम करती है, सामाजिक आधार पर जिस जनसमूह के सदस्यों से उसका सम्बन्ध होता है, उसके साथ एकात्मक होने का साधन है, शैक्षिक आधार पर वह मातृ-भाषा के माध्यम से एक अनजाने माध्यम की अपेक्षा तेज़ी से सीखता है।” (The Use of Vernacular Languages in Education, 1953:11)। यूनेस्को का यह कथन गंभीर अन्वेषणों और विशेषज्ञों की राय पर आधारित था। शिक्षा और भाषा के संबंधों पर दुनिया भर में हुए आज तक के अन्वेषण यही नतीजा दर्शाते हैं। और तो और, यूनेस्को के एक विश्वस्तरीय अध्ययन (Improvement in the Mother Tongue Based Learning and Literacy, 2008:12) से निम्न सारांशात्मक टूक दर्शाती है कि अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा अंग्रेजी सीखने के लिए भी सही विधि नहीं है: “हमारे रास्ते में बड़ी रुकावट भाषा एवं शिक्षा के बारे में कुछ अंधविश्वास हैं और लोगों की आँखें खोलने के लिए इन अंधविश्वासों का भंडा फोड़ना चाहिए। ऐसा ही एक अन्धविश्वास यह है कि विदेशी भाषा सीखने का अच्छा तरीका इसका शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग है (दरअसल, अन्य भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ना ज्यादा कारगर होता है)। दूसरा अंधविश्वास यह है कि विदेशी भाषा सीखना जितनी जल्दी शुरू किया जाए, उतना बेहतर है (जल्दी शुरू करने से लहजा तो बेहतर हो सकता है, पर लाभ की स्थिति में वह सीखने वाला होता है, जो मातृ-भाषा में अच्छी मुहारत हासिल कर चुका हो)। तीसरा अंधविश्वास यह है कि मातृ-भाषा विदेशी भाषा सीखने की राह में रुकावट है (मातृ-भाषा में मजबूत नींव से विदेशी भाषा बेहतर सीखी जा सकती है)। स्पष्ट है कि ये अंधविश्वास हैं और सत्य नहीं। लेकिन फिर भी यह नीतिकारों की इस प्रश्न पर अगुवाई करते हैं कि प्रभुत्वशाली (हमारे संदर्भ में अंग्रेज़ी – ज.स.) भाषा कैसे सीखी जाए।” विदेशी भाषा सीखने की सही विधि के बारे में हुई और खोजें भी यही दर्शाती हैं। अंग्रेजी भ्रमों में से एक भ्रम अंग्रेजी और अंतरराष्ट्रीय कारोबार से जुड़ा है। इस क्षेत्र से भी कुछ तथ्य प्रासंगिक हैं। सत्रहवीं सदी में (जब एकाध भारतीय ही अंग्रेजी जानता होगा) दुनिया के सकल उत्पाद में भारत का हिस्सा २२ (बाईस) प्रतिशत था, जो अब ५ (पाँच) प्रतिशत है। प्रति व्यक्ति निर्यात में दुनिया में भारत का स्थान १५०वाँ है। सो, स्पष्ट है कि विदेशी भाषा में शिक्षा देना आर्थिक विकास के आधारों पर भी राष्ट्रीय हत्या है।
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शिक्षा और मातृ-भाषा के सम्बन्ध में पीछे वर्णित तथ्य यह इंगित करते हैं कि विदेशी भाषा माध्यम में किसी बच्चे को भी शिक्षा देना असैद्धांतिक और हानिकारक है। दूसरे, शिक्षा केवल दिमागों में जानकारी भरना मात्र नहीं है। शिक्षा सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया भी है और बच्चे के संतुलित सामाजिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक विकास के लिए बच्चे का अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, और एतिहासिक परिवेश से अंतरंग सम्बन्ध बना सकना अति महत्तवपूर्ण है, जो मातृ-भाषा के ज़रिये ही संभव है। इन मायनों में देखें तो अंग्रेजी माध्यम में पढने वाले बच्चों के साथ भी अंग्रेजी माध्यम के कारण बहुत बड़ा शैक्षिक अन्याय और गहरा भेद-भाव हो रहा है। वो अंग्रेजी माध्यम से पीड़ित तो हैं ही, इससे वो अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और एतिहासिक परिवेश और स्रोतों से भी टूट रहे हैं। यह एक अपनी तरह की अपंगता पैदा करता है। सो स्कूल के शैक्षिक स्तर के बाकी कारकों के एक जैसा होते हुए भी यदि शिक्षा का माध्यम मातृ-भाषा नहीं है, तो न तो शिक्षा सफलता से दी जा सकती है और न ही शैक्षिक समानता पैदा हो सकती है।
जो लोग भारत के लिए मातृभाषाओं की जगह अंग्रेजी भाषा की वकालत करते हैं और अंग्रेजी के बारे में ऐसे कुतर्क देते हैं कि अंग्रेजी ही उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, कारोबार, रोजगार आदि की भाषा है, उनके बारे में कुछ बातें निश्चय रूप में कही जा सकती हैं: वो शिक्षा, उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, कारोबार, रोजगार आदि के भाषा से सम्बन्ध के बारे में पूरी तरह अज्ञानी हैं; वो इस विषय के बारे में कुछ सीखने की इच्छा भी नहीं रखते, क्योंकि उनकी समझ है कि जो चार अक्षर अंग्रेजी के सीख जाता है, वो सर्वज्ञाता हो जाता है; उन्हें अफवाहें फैलाने में कोई झिझक नहीं है, क्योंकि वो किसी बात का तथ्यगत अध्ययन किये बिना और बिना कोई प्रमाण जाने या बताये किसी बात को सत्य कहकर प्रसारित कर सकते हैं; उनकी भाषा के मामलों के बारे में समझ कम-से-कम पाँच सौ साल पुरानी है; उन्हें यह भी मालूम नहीं है कि किसी भी तरह का ज्ञान या जानकारी उसी भाषा में दी जा सकती है, जिस भाषा को प्राप्तकर्ता समझता हो; उन्हें यह भी मालूम नहीं कि किसी तरह के काम को करने के लिए-जैसे दफ्तर आदि में, सेवा देने वाले और सेवा प्राप्त करने वाले को काम-दफ्तर आदि की भाषा का ज्ञान आवश्यक है; शायद वो यह समझते हैं कि यह सारा काम इशारों मात्र से निपटाया जा सकता है; वो ज्ञान और जानकारी की सदी कही जाने वाली सदी में भी यह नहीं जानते कि भारत की सीमारेखा से बाहर क्या हो रहा है; और तो और, जिससे वो सबसे अधिक सम्मोहित होते हैं (यानि अमेरिका) वहाँ के बारे में भी नहीं जानते कि वहाँ शालाओं में क्या हो रहा है; देश के १२० करोड़ लोगों के दुःख-सुख, पीड़ा आदि से उनका कुछ लेना-देना नहीं है और वो कुछ चंद अंग्रेजीदां लोगों को छोड़कर बाकी सबको हिन्द महासागर में फेंक देना चाहते हैं; वो यह भी नहीं जानते कि भारत की दर्जनों भाषाएँ अंग्रेजी से सदियों पहले अंग्रेजी से अधिक विकसित हो चुकी थीं और कुछ तो हज़ारों साल पहले; वो यह भी नहीं जानते कि मनुष्य के सर में दिमाग नाम की चीज़ हज़ारों साल पहले की है और यह पन्द्रवीं-सोलहवीं सदी में ही पैदा नहीं हुई है; उनका अपने पुरखों से कुछ लेना-देना नहीं है और न वे उनकी कोई बात सुनना चाहते हैं; उनका देश के १२० करोड़ लोगों से भी कुछ वास्ता नहीं है, उनसे चाहे बात हो पाए, चाहे नहीं, इससे उनको कुछ फर्क नहीं पड़ता; वो ये समझते हैं कि गीत, साहित्य, कथाएँ, कलाएँ आदि सब फिजूल की चीजें हैं और आदमी को बस नए-नए सामान की जरूरत होती है; मनुष्यों के बीच अन्तरंग सबंध जैसी किसी चीज़ की वो कोई जरूरत नहीं समझते हैं, और यदि समझते भी हैं तो वो यह समझते हैं कि इसके लिए केवल इशारे मात्र काफी हैं; वे नहीं चाहते कि देश के लोग अच्छी तरह से कुछ सीख जाएँ, सो इनका देश से भी कुछ लेना-देना नहीं है; बातें तो बहुत हैं, पर इनके बारे में यह भी सत्य है कि आज के वैश्वीकरण के युग में भी वो नहीं चाहते कि कोई भारतीय कोई विदेशी भाषा या अंग्रेजी अच्छी तरह से सीख जाए।
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यदि चाहते होते तो वे सबको अंग्रेजी सीखने का सही ढंग बताते। यहाँ बस ब्रिटिश काउंसिल की २०१७ में छपी पुस्तक से एक उद्धरण देता हूँ (इंग्लिश लैंगुएज एंड मीडियम आफ़ इंस्ट्रक्शन इन बेसिक एजुकेशन …पन्ना ३): ‘चारों ओर यह समझ फैली हुई है कि अंग्रेजी भाषा पर मुहारत के लिए अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढ़ने से अंग्रेजी माध्यम में पढ़ना बेहतर तरीका है, पर इस समझ के लिए कोई प्रमाण हासिल नहीं है’। ब्रिटिश काऊंसिल की इसी पुस्तक में अंग्रेजी माध्यम से नुकसानों के बारे में भी यह दर्ज है (पन्ना ३): ‘छ: से आठ साल लगते हैं कि कोई बच्चा इतनी-एक अंग्रेजी सीख ले कि उसे पाठ्यक्रम में शामिल विषय-वस्तु की समझ आ सके। इतने साल लगाकर भी वह अंग्रेजी इतनी अच्छी तरह नहीं सीख सकता कि वह उच्च श्रेणियों के पाठ्यक्रम को अच्छी तरह समझ सके’।
आशा कर सकता था कि ये अंग्रेजी वाले सज्जन अंग्रेज़ की बात तो मान ही लेंगे, पर समस्या यह है कि समझदार बताते हैं कि ‘मैं न मानूँ’ वाला किसी की नहीं मानता, अंग्रेज़ की भी नहीं, फिर भी भला हो इनका।

पूर्व प्रमुख, भाषाविज्ञान और पंजाबी लेक्सोग्राफी विभाग; पूर्व निदेशक, सेंटर फॉर डायस्पोरा स्टडीज, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला
प्रो. जोगा सिंह एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद हैं, जिनके शोध और शिक्षण ने भाषाविज्ञान और प्रवासी अध्ययन के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।







