कल रात को ओला, आँधी और बारिश। नये पत्ते भी टूट कर गिरे, हज़ारों नन्हीं अमौरियॉं भी और टहनियाँ भी उखड़ गईं। अभी काले मेघ हैं। हल्की फूहियाँ भी गिर रही हैं। कभी-कभी काले मेघ के छिद्रों से सूरज भी चमक उठता है। हल्की ठंडी हवा है। पेड़ अब शांत हैं। जितनी अमौरियाँ बच गई हैं, पेड़ उन्हें सीने से लगाए संत बन गए हैं। जो चले गए, उन पर क्यों आँसू बहाए! पेड़ प्रकृति के रहस्य को जानता है। प्रकृति के दंश को भी और प्रकृति के प्रेम को भी। वर्षों की कहानियाँ उसके सीने में दफ़्न हैं। कितनी आँधियाँ आयीं होंगी, ताड़ लड़खड़ाये होंगे, कटहल अपनी धुन में मस्त होगा, लीची फुसफुसाती होगी, बड़हड अनसुने गीत गुनगुनायें होंगे- ओ जानेवाले, लौट कर आना। कितनी अँधेरी रातें और कितनी सफ़ेद चादर-सी चाँदनी भरी रातें। चिड़ियाँ-चुनमुन की पुकार भी क्या कम ख़ुशी या नैराश्य भरती होगी। अनकही कहानियाँ सीख देती हैं- कुछ भी हो, अविचल खड़े रहो। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी याद आते हैं-
“सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो तुम निडर डरो नहीं, तुम निडर डटो वहीं। वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!”
मनुष्य-मन बहुत डरता है। आजकल तो और। विश्व में घटी किसी कोने की घटना आशंका में डाल देती है। कारवाँ गुज़रने और ग़ुबार देखते रहने के दरम्यान मन कम बेचैन नहीं रहता। कभी गुलज़ार ने लिखा और मोहम्मद रफ़ी ने गाया। –
स्वप्न झड़े फूल से, मीत चुभे शूल से लुट गए श्रृंगार सभी, बाग़ के बबूल से और हम खड़े खड़े, बहार देखते रहे कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे।
हम उस युग के साक्षी हैं, जिसमें ग़ुबार ही ग़ुबार है। बड़े पद पर बैठा हुआ है। उसके कहने का स्वाभाविक असर पड़ता है। लेकिन वह सावधान नहीं रहता। इतिहास की ऐसी-तैसी कर देता है। देश के सबसे ताक़तवर कुर्सी पर बैठा आदमी कहता है कि सिकंदर बिहार के गंगा तट पर आया था, जहाँ बिहारियों ने उसे हरा दिया। इतिहास को उदरस्थ कर नयी-नयी कल्पनाओं से वे उसका साज-श्रृंगार करते हैं। कभी कहते हैं कि तक्षशिला बिहार में था।
इधर हाल में बिहार के उप मुख्यमंत्री अतिरिक्त उत्साह में आ गए और कहा कि सम्राट अशोक की मुलाक़ात महात्मा बुद्ध से हुई थी। ऐसे-ऐसे नवज्ञानियों से देश भर गया है। “अरे भाई- सत्ता में जैसे-तैसे कर पहुँचे हो। गोरखधंधे में दीक्षित हो। सत्ता का मज़ा लूटो। जनता जात-पात के नाम पर सपोर्ट कर ही रही है। इतिहास के सीने पर चढ़ कर उससे ख़ून क्यों बोकरवा रहे हो।”
लेकिन ये लोग मानेंगे नहीं। अधजल गगरी बहुत छलकती है। बिहार से दिल्ली तक एक ही कहानी है। कोई मान नहीं रहा। मजा यह कि जनता भी अद्भुत है। मुल्ला मस्जिद में देश का सपना देख रहा है। एक लड़की ने कहा कि मैं हिंदू राष्ट्र के लिए अपने कपड़े तक उतार दूँगी। हिन्दू राष्ट्र बने, न बने। जब तक ये रहेंग , कपड़े यों ही उतरते रहेंगे।
मैं सोचता हूँ कि क्या आगे आनेवाले दिनों में जो इतिहास पढ़ाया जाएगा, वह इतिहासकारों द्वारा लिखा होगा या ऐसे महाज्ञानियों की उक्तियाँ पढ़ायी जायेंगीं।’ हे मेरे देश, आपको यह दिन भी देखना था! सच यह है कि आँधी-तूफ़ान तो यहाँ आया हुआ है, जिसमें देश की बौद्धिक क्षमता चुक गई है और अबौद्धिक मेंढक की तरह टर्रा रहा है।
कैफी आज़मी ने लिखा-
‘वक़्त ने किया, क्या हँसी सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम।'

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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