बुझता हुआ चिराग़ है संविधान की प्रस्तावना

जिस उदात्त सोच के साथ इस देश की संवैधानिक बुनियाद रखी गई थी, समय बीतने के साथ ही लगातार वह जर्जर होती गई। और, अब तो यकीन करना भी मुश्किल है कि यह वही देश है, स्वतन्त्रता के संघर्ष से निकले हुए तप:पूतों ने जिसका प्रस्ताव पास किया था।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
Dr. Anil Kumar Roy

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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2 Comments

  1. बहुत जरूरी लेख है। संविधान के भूल भावना और नागरिकों के अधिकार का जिस तेजी से क्षरण हो रहा है उससे उपजे ज्वलंत सवालों से रूबरू कराता यह लेख है। बहुत बड़े खतरों से न केवल सावधान करने की कोशिश है बल्कि फिर से आजादी बचाने का आह्वान भी है। डॉ अनिल जी का आभार!

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