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मुख्य न्यायाधीश के 15 मई के ‘कॉकरोच’ वाले सतही बयान के अगले ही दिन बोस्टन विश्वविद्यालय से पब्लिक रिलेशन में मास्टर्स कर रहे अभिजीत दीपके के द्वारा ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से एक्स और इंस्टाग्राम पर डिजिटल विरोध के रूप में बने अकाउंट से लोगों के विस्फोटक जुड़ाव पर अनेक तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। कई बुद्धिजीवियों ने, किसी-किसी दल का नाम लेकर, इसे उसका ‘प्रोपेगंडा विंग’ बताया, किसी ने अन्ना आंदोलन से इसकी तुलना की, किसी ने ‘देशद्रोह’ कहा, किसी ने कहा कि आंदोलन सड़क पर होता है, सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर नहीं तो किसी ने इसे सोवियत संघ, फ्रांस, चीन जैसी क्रांति की भूमिका के रूप में देखा। इन लोगों ने अपने-अपने पक्ष में तर्क भी दिए। इनमें से बहुत सारी बातों का सत्य भविष्य में उजागर हो पाएगा। लेकिन व्यंग्य और विरोध के उस माध्यम से लोगों के बेतरह जुड़ाव को देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि सत्ता के इंद्रधनुषी नारों और आश्वासनों के भीतर आम आदमी के जीवन में भारी असंतोष और हताशा भरी हुई है। इस डिजिटल विरोध पर ध्यान देना इसलिए भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि इसी जेन-जी पीढ़ी ने अपने ग़ैर-पारंपरिक आंदोलनात्मक तरीकों से कई देशों में परिवर्तन ही नहीं लाए हैं, सत्ता भी बदल दी है। दक्षिण एशिया में ही हमारे पड़ोसी श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल इसके गवाह हैं।
इस लेख का उद्देश्य ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ और उसकी संभावना की विवेचना करना नहीं है। बल्कि अनेक देशों में हुए इस तरह के आंदोलनों के पैटर्न को पहचानने और परिणाम को जानने की कोशिश करना है, जिससे भारत के संदर्भ में इसे समझ सकें और आगे की कार्यनीति तय कर सकें।
जेन-जी की विशेषताएँ
वर्ष 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए बच्चों के आने से पहले इंटरनेट आ चुका था, भारत जैसे देश में भी। उन्होंने जब तक खड़ा होना सीखा, तब तक 3G और 4G ने दस्तक दे दी थी। परिणामस्वरूप होश संभालते-संभालते उन्होंने अपने इर्द-गिर्द चमकते हुए स्क्रीन को देखा, ऑनलाइन गेमिंग, यूट्यूब आदि सोशल मीडिया में उलझे हुए लोगों को देखा और देखते-देखते यह सब उनके जीवन का सामान्य हिस्सा हो गया। उनके सयाना होते-होते मध्य वर्ग अपनी पुरानी जीवन-शैली से पल्ला झाड़ रहा था, कारोबार की दुनिया बदल चुकी थी और नये प्रकार के श्रम-संबंधों ने अपनी जगह बना ली थी। अब काम के सिलसिले में भी उनका अधिकांश समय स्क्रीन पर बीतता था। इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, स्नैपचैट, फेसबुक, एक्स, रेडिट आदि ने इनके फ़ैशन को ही नहीं बदला, इनके सोचने और समझने की शैली, भाषा, राजनीति और सामाजिक दृष्टि पर भी गहरा प्रभाव डाला। अत्यधिक स्क्रीन-निर्भरता ने एक ओर तो उन्हें तुरंत जवाब पाने की आदत डाली, दूसरी ओर, शिक्षा और रोजगार की विवशता के कारण वैश्विक यायावरी ने, इनके भीतर सामाजिक संबंधों की अलग दृष्टि उत्पन्न की। इसलिए ये सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को उसी तरह नहीं देखते-समझते और उसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करते, जिस तरह उन्हें जन्म देने वाली पीढ़ी देखती, समझती और करती रही है।
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जेन-जी आंदोलनों के सामान्य पैटर्न
हाल के कुछ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस पीढ़ी के द्वारा कई आंदोलन खड़े किए गए हैं। चूँकि यह पीढ़ी 4G, 5G युग की है, उसी तरह तेज-तर्रार और स्मार्ट, इसलिए इसकी आंदोलनात्मक कार्रवाइयों के तरीके भी पिछली पीढ़ियों से भिन्न और त्वरित रहे हैं। दुनिया भर में इन आंदोलनों की संगठनात्मक संरचना, भावनात्मक अपील और भाषा में कुछ समानताएँ दिखती हैं।
जेन-जी आंदोलनों में सबसे बड़ी समानता है कि हर बार इन्होंने सोशल मीडिया को अपना मंच बनाया। सड़कों पर भी लड़े, लाठियाँ और गोलियाँ भी खायीं, लेकिन शुरुआती मंच इंटरनेट पर बनाया और मीम्स, शोर्ट वीडियोज, लाइव स्ट्रीम आदि को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। यह करके लोगों में भावनात्मक उत्तेजना पैदा की और अपने साथ जोड़ा, फिर सड़क पर उतरे। इस माध्यम से सूचना-अराजकता का अंदेशा तो खूब रहता है, परंतु आंदोलन द्रुत गति से फैलता भी है।
पुराने आंदोलन अक्सर पार्टी, ट्रेड यूनियन, किसी वैचारिक संगठन या किसी नेता के द्वारा खड़े किए जाते थे। लेकिन हांगकांग विरोध, ब्लैक लाइव्स मैटर विरोध, फ्राइडे फॉर फ्यूचर विरोध जैसे अधिकांश आंदोलन नेताहीन या ढीले संगठन वाले आंदोलन रहे हैं। इनका नेटवर्क विकेंद्रित रहा है और इनमें टेलीग्राम, ह्वाट्सऐप, हैचटैग आदि के द्वारा स्वैच्छिक और सहजोद्रिक्त जुटान (spontaneous mobilization) हुआ है।
प्रायः ये आंदोलन ऐसे युवक या युवकों के समूह के द्वारा खड़े किए गए हैं, जिनकी कोई विशेष पूर्व पहचान नहीं रही है। फ़्राइडेज फॉर फ्यूचर की शुरुआत ग्रेटा थनबर्ग ने महज 15 साल की उम्र में की थी, जब उसने हर शुक्रवार स्कूल जाने के बजाय स्वीडिश संसद के बाहर जलवायु के लिए स्कूल हड़ताल का पोस्टर लेकर अकेले बैठना शुरू किया। मार्च फॉर आवर लाइव्स की शुरुआत एम्मा गोंजालेज और उसके कुछ साथियों ने बंदूक हिंसा के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया कैंपेन चलाकर विशाल आंदोलन खड़ा कर दिया। नेपाल में भी यूट्यूब और टिकटॉक पर प्रतिबंध के बाद जिन युवाओं ने ऑनलाइन माध्यमों से लोगों को लामबंद करना शुरू किया, उसके पूर्व उनकी कोई पहचान नहीं थी। महसा अमीनी की मृत्यु के बाद ईरान में जिन्होंने इंस्टाग्राम और एक्स पर महिला, जिंदगी और आजादी का नारा बुलंद किया, उस समय उनकी भी कोई पूर्व पहचान नहीं थी। बांग्लादेश, श्रीलंका आदि के युवकों के साथ भी यही था और भारत के अभिजीत दीपके के साथ भी यही है। यह दूसरी बात है कि इन आंदोलनों से इन्हें पहचान मिली और इसके बाद ये राजनीति, एक्टिविज्म, पत्रकारिता या ग़ैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से सक्रिय रहे, मगर बाद में।
ये आंदोलन प्रायः पहचान और गरिमा के प्रश्न के साथ शुरू हुए हैं। आर्थिक माँगों के अलावा सांस्कृतिक सम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकार, लैंगिक पहचान, नस्ल आदि मुद्दे इन आंदोलनों के उभरने के केंद्र-बिंदु रहे हैं। मुख्य रूप से पहचान, अधिकार और स्वतंत्रता की भाषा बहुत मजबूत रही है। इसकी पृष्ठभूमि में महँगी शिक्षा, बेरोजगारी, अस्थायी नौकरी, भविष्य की अनिश्चितता, गिग इकोनॉमी, आरक्षण, आवास संकट आदि आर्थिक असुरक्षा से उत्पन्न असंतोष ने प्रेरक भूमिका निभायी है। अर्थात् भावनात्मक अपील को आगे करके इन्होंने मूल मुद्दों को उसके साथ जोड़ा। जैसे, भारत में भी पहचान और सम्मान के मुद्दे उठाकर बेरोजगारी, परीक्षा, भ्रष्टाचार आदि मुद्दों को उसके साथ जोड़ा।
भावनात्मक और दृश्य राजनीति का पैटर्न स्पष्ट रूप से इन आंदोलनों में देखा जा सकता है। पोस्टर, अभिनयात्मक विरोध, प्रतीकात्मक संकेत, वायरल नारे आदि लोगों को जोड़ने में कामयाब हुए हैं। कई बार तो एक तस्वीर या 15 सेकंड का वीडियो पूरे आंदोलन का प्रतीक बन गया है।
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सीधे-सीधे राजनीतिक बदलाव की माँग से ये आंदोलन शुरू नहीं हुए। बाद में परिणामस्वरूप राजनीतिक बदलाव हुए हों, यह अलग बात है। जिस व्यवस्था के कारण तकलीफदेह परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं, उसके बदलाव की कोशिश के बदले कुछ सुधार इनकी माँगों के केंद्र में होते हैं। अर्थात् व्यवस्था परिवर्तन की ओर इन आंदोलनों ने कभी ध्यान नहीं दिया।
इन आंदोलनों की विशेष विशेषता इनका तीव्र उभार है। लेकिन इनके पास न तो मजबूत संगठनात्मक ढाँचा होता है, न स्थायी संरचना होती है और न ही सुस्पष्ट और निर्णयात्मक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक दर्शन। इसलिए डिजिटल उत्तेजना से मोबिलाइजेशन तो हो जाता है, लेकिन क्रमागत राजनीतिक विकास और संस्थागत निर्माण असंभव होता है। असंतोष से उपजे आक्रोश के आवेग में इन्होंने कई बार बिना किसी राजनीतिक दल के सहयोग के सत्ता तक को पलट दिया है, नेपाल, बांग्लादेश, कीनिया का रिजेक्ट फाइनेंस बिल आदि इसके अनेक उदाहरण हैं, लेकिन इस बात का एक भी उदाहरण नहीं है कि किसी राजनीतिक दल के बिना या ख़ुद नयी पार्टी बनाए बिना पार्टीलेस व्यवस्था और शासन बना हो। इसका अर्थ है कि आंदोलन भले ही स्वतःस्फूर्त और असांगठनिक तौर पर उभरे, परंतु अंततोगत्वा सांगठनिक राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना वह पूरा नहीं हुआ है।
इन आंदोलनों के पैटर्न को समेकित रूप से कहा जा सकता है कि अक्सर ये हताशा और क्षोभ से उपजते हैं, अनुभवजन्य पीड़ा से उत्प्रेरित होते हैं, भावनात्मक ऊर्जा से अनुप्राणित होते हैं और तात्कालिक न्याय चाहते हैं। भावनात्मक ऊर्जा के आवेग में बड़ी तेजी के साथ लोगों को जोड़ लेते हैं। शुरुआत में पहचान, अधिकार, स्वतंत्रता आदि से जुड़ा कोई तात्कालिक कारण होता है, परंतु बाद में अन्य मुद्दे भी जुड़ जाते हैं। अक्सर इन आंदोलनों ने सत्ता को कड़ी चुनौती दी, परंतु इन आंदोलनों का पर्यवसान या तो छोटे-मोटे सुधारों में हुआ या ख़ुद उसी सत्ता-संरचना का भाग हो जाने के रूप में हुआ। लेकिन सफलता-असफलता, स्थायी प्रभाव-क्षणिक प्रभाव के विवेचन-विश्लेषण से अलग हटकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि इन आंदोलनों में राजनीति की नयी भाषा और तरीकों का प्रयोग हुआ, नये प्रतीक़ों का इस्तेमाल हुआ, ग़ैर-सांगठनिक विद्रोह के उदाहरण खड़े हुए, तकनीक का बेहतर उपयोग किया और संचार की शैली बदली।
अंतर
पिछली सदी के आंदोलनों से इस पीढ़ी के आंदोलनों की जब हम तुलना करते हैं तो पाते हैं कि तब के आंदोलनों में प्रायः कोई राजनीतिक दर्शन या वृहत्तर राष्ट्रीय उद्देश्य होता था, अब केवल कुछ सुधारों की माँग होती है। पहले विचारों की समानता के आधार पर संगठन बनते थे, उनमें कसाव था। लेकिन अब पारंपरिक अर्थ के संगठन के बदले नेटवर्क आधारित फ्लोटिंग समूह निर्मित होते हैं। तब वे संगठन लंबी राजनीतिक तैयारी करके आंदोलन को अंजाम देते थे। अब ये आंदोलन त्वरित डिजिटल जुटान करते हैं। तब कोई आंदोलन राजनीतिक दल, यूनियन या संगठन के द्वारा किया जाता था। अब ये आंदोलन हैचटैग और सोशल प्लेटफॉर्म पर आयोजित होते हैं। तब घोषणापत्र या कम-से-कम पर्चा तैयार होते थे और बँटते थे, जिनमें माँगें या आह्वान होता था। अब नैरेटिव को वायरल किया जाता है। तब के संगठनों में स्थायी कैडर हुआ करते थे, अब इन आंदोलनों में, कुछ चेहरों को छोड़कर, फ्लोटिंग पार्टिसिपेशन होता है।
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जेन-जी आंदोलन की सीमाएँ
यहीं पर यह भी विचारणीय है कि प्रतिरोध की प्रबलता के बावजूद इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप व्यवस्थागत परिवर्तन या संस्थागत निर्माण क्यों नहीं हो पाया है। 20 सदी के आंदोलनों में सामाजिक आकांक्षाओं के आधार पर समाजवाद, उपनिवेश-विरोध, ट्रेड यूनियन की माँगें आदि स्पष्ट वैचारिक आधार पर निर्मित एक ढाँचा हुआ करता था, जिसमें विरोध के साथ ही विकल्प भी प्रस्तुत रहता था। लेकिन आज जेन-जी के आंदोलन व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर नैतिक आक्रोश की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति हैं, जो केवल त्वरित न्याय की अपेक्षा करते हैं, न कि नयी व्यवस्था की स्थापना का उद्देश्य रखते हैं। नयी व्यवस्था का कोई स्पष्ट खाका उनके पास होता भी नहीं है। कई बार तो आंदोलन खड़ा करना उद्देश्य भी नहीं होता है, कोई पोस्ट, रील या पोस्टर वायरल होकर आंदोलनात्मक हो जाता है। दूसरी बात यह कि ये आंदोलन डिजिटल प्लेटफार्म पर उपजते और विकसित होते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कोई ट्रेंड चलाया जा सकता है। लेकिन राज्य का संचालन या संस्थाओं-संगठनों का निर्माण वर्चुअल नहीं हो सकता। तीसरी बात कि जेन-जी के आंदोलनकर्ता स्वयं उस पूँजीवादी संस्कृति की उपज होते हैं, वैयक्तिकता, त्वरित संतुष्टि, अधैर्य, व्यक्तिगत ब्रांडिंग, उपभोक्तावाद, अनौपचारिकता आदि जिसकी विशेषताएँ हैं। इन विशेषताओं से उनके आंदोलन भी अछूते नहीं रह पाते हैं। चौथी बात यह कि जिस साधन का उपयोग कर, अर्थात् सोशल मीडिया, ये आंदोलन विकसित होते हैं, वहाँ ग़ुस्सा, भय, भावनात्मकता आदि इमोशनल विषय वायरल होते हैं, नीति-निर्माण की जटिलता, संस्थागत रचनात्मकता और दीर्घकालिक योजनाओं पर बहस आदि अभिरुचि के विषय नहीं होते। फिर जब तक ये आंदोलन जमीन पर उतरते हैं, तब तक सत्ता हस्तांतरण के इच्छुक दल या संगठन अपनी तैयारी पूरी करके घुसपैठ कर लेते हैं और आश्वासनों तथा दिखावटी सुधारों के द्वारा सत्ता पर काबिज हो जाते हैं। प्रायः ये आंदोलन किसी एक बात पर गुस्से के इजहार के रूप में शुरू होते हैं, उस गुस्से में व्यावहारिक सामाजिक संरचना, जैसे जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, अर्थव्यवस्था, कृषि, श्रम-संबंध, सत्ता और पूँजी का संबंध तथा इस व्यूह से निकलने के उपाय आदि की दृष्टि नहीं रहती है। इन्हें समझे बिना वैकल्पिक निर्माण असंभव है।
जेन-जी आंदोलन और राजनीतिक दल
अनेक बुद्धिजीवी यह कहते हुए मिलेंगे कि इस पीढ़ी को राजनीतिक दलों पर विश्वास नहीं रहा। यह वक्तव्य उतना ही बेमानी और अप्रासंगिक है, जितना यह मान बैठना कि टेस्टट्यूब बेबी या सरोगेट पद्धति से बच्चा होने के युग में माता-पिता का होना अप्रासंगिक हो गया है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल ही राज्य का संचालन और नीति का निर्धारण करते हैं। इनके बिना कोई आंदोलन एक अराजक उत्पात भर होगा, बिना किसी बदलाव के। इसीलिए हर बार यह देखने को मिला है कि जब आंदोलन व्यापक हुआ है तो राजनीतिक दलों ने ही कमान सँभाली है और आंदोलनकर्ताओं ने भी पार्टी का दामन थामा है और कई बार इन आंदोलनकर्मियों ने ख़ुद की अपनी पार्टी भी बना ली है। बच्चा चाहे टेस्ट्यूब ही क्यों न हो, पालन-पोषण तो माता-पिता ही करेंगे।
दूसरी बात कि वर्तमान दौर में, जब आंदोलन स्वतःस्फूर्त हो जा रहे है, राजनीतिक दल निष्क्रिय नहीं हुए हैं। पिछले दस वर्षों में अनेक आंदोलन राजनीतिक दलों, यूनियनों और संगठनों के द्वारा आयोजित और सफल हुए हैं। भारत का ऐतिहासिक किसान आंदोलन इस बात का गवाह है, जिसके कारण तीन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा। किसान संगठनों के द्वारा आयोजित इस आंदोलन को कांग्रेस, वामपंथी दल, अकाली दल, आप आदि कई राजनीतिक दलों के साथ कई राज्य सरकारों का भी इसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग-समर्थन प्राप्त था। अमेरिका, यूरोप, लैटिन अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय श्रमिक और आर्थिक विरोध ने सरकारों और कंपनियों को मुद्रास्फीति के दौर में वेतन-सुरक्षा और सामाजिक कल्याण की नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश किया। श्रीलंका में आर्थिक संकट के ख़िलाफ़ विरोध की शुरुआत को बड़े आंदोलन में बदलने का काम जनता विमुक्ति पेरामुना (JVP) और समगी जन बलवेगया (SJB) जैसे राजनीतिक दलों ने किया। पेरू में फ्री पेरू और अन्य वामपंथी दल, चिली में बांड पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी, पोलैंड में सिविल प्लेटफॉर्म और वामपंथी दल, वेनेजुएला में वॉलंटाड पॉपुलर और अन्य विपक्षी दल ने निर्णयात्मक भूमिका निभायी है। भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में भी आरक्षण के मुद्दे को लेकर शुरू हुए छात्र असंतोष को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्ट और जमात-ए-इस्लामी ने संगठित राजनीतिक दिशा दी और आरक्षण सुधार को हसीना हटाओ के एकसूत्री राजनीतिक एजेंडा में बदला। नेपाल में भी सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जेन-जी के आंदोलन को पारंपरिक राजनीतिक दलों, मधेसी संगठनों और नव गठित राजनीतिक ताकतों ने शासन को बदलने में भूमिका निभायी। ये और ऐसे अनेक उदाहरण साबित करते हैं कि पारंपरिक राजनीतिक दलों की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। युवाओं के भावनात्मक आक्रोश का राजनीतिक अनुवाद राजनीतिक दल ही कर पाये हैं।
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लेकिन सपाट तौर पर यह कह देने से कि ‘आंदोलन के संदर्भ में राजनीतिक दलों की भूमिका अनिवार्य है’, बदलते अंतर्संबंधों को पहचानने की कोशिश से कतराना है। हाल के वर्षों में आंदोलनों की शुरुआत युवा आक्रोश की डिजिटल अभिव्यक्ति से हुई है। इसका यह अर्थ लगाया जा सकता है कि राजनीतिक दल या तो अंतर्व्याप्त असंतोष को समझ नहीं पाते हैं या उस विक्षोभ को संबोधित करने की आकर्षक अपील गढ़ नहीं पाते हैं। उनका ढाँचा भी इस प्रकार का है कि जब तक वे मुद्दों को समझते हैं, रणनीति तैयार करते हैं; तब तक कोई अनजान युवक हलचल मचा देता है – अर्थात् राजनीतिक दलों में त्वरित कार्रवाई का अभाव है, जो 5G और AI युग की अनिवार्यता है। राजनीतिक दलों की संरचना और कार्यशैली औद्योगिक युग की देन है। आज उत्पादन के केंद्र, उत्पादन के तरीके, उत्पादन की जगह और समय, श्रम के प्रकार, उत्पादन की गति, वितरण की नीतियाँ – कुल मिलाकर उत्पादन संबंधों में, तब से लेकर आज तक, आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं। आज गूगल कोई वस्तु नहीं बनाता, मुफ्त में अपने उत्पाद उपलब्ध कराता है, फिर भी भीमाकार कंपनी है। अमेजन बिना किसी औपचारिक दुकान के हाथ में सामान दे जाता है। अधिकतर नौकरियाँ अनौपचारिक हो गई हैं। जो औपचारिक दिखती भी हैं, उसकी शर्तें भी अनौपचारिक जैसी ही हैं। पूँजीवाद के उत्तरकाल में मज़दूर को पार्टनर कहा जाने लगा है। वह अपने को मज़दूर मानता भी नहीं है। राजनीतिक मूल्य भी अब वही नहीं रहे और समाज की संरचना के साथ ही महत्वाकांक्षाएँ भी बदल गयी हैं। इन परिवर्तनों को गौर से समझते हुए उसके मद्देनजर अपने ढाँचे और तरीकों को अपडेट करना होगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







