क्या हो गया है? सूरज जल रहा है, जल में मल मिला है, हवा में जहर, धरती पर रेत, यहाँ तक अंतरिक्ष प्रदूषित हुआ पड़ा है। ना जाने कितने सैटेलाइट, कितनी किरणें हम पर नज़र रखे हैं। अपना ही घर बिग बॉस के हाथों गिरवी पड़ा है। घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही साँस फूल जाती है। अजीब हालत हैं। ऐसे माहौल में आपका क्या हाल है?
दवा से लेकर दारू तक पी-पाकर जीवन घुट रहा है। कभी सोचा है, क्यों भागे जा रहे हैं लोग? पैसा? क्या हो अगर सब कुछ मुफ्त होता। एक पल को सोचिए अगर पैसा ना होता तो कैसा होता?
चलिए! एक पल शांति से सोचते हैं। एक कल्पना करते हैं। आख़िर यह दुनिया है तो माया ही ना? क्यों हम मोह पाले बैठे हैं? ब्रह्म हैं हम, क्या यह दुनिया हमारी नहीं? हमारे बाद भी यह दुनिया किसी की तो होगी ना? फिर किस बात की मारा-मारी?
दुनिया के चाल-ढाल देखकर लगता नहीं है कि इसका हाल-चाल ज़्यादा दिन ठीक-ठाक रह पाएगा। वैश्विक राजनीति को देखते हुए ऐसा लगता है मानवता तीसरे और संभवतः आख़िरी विश्व-युद्ध को अग्रसर है। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति ने वेनेंज़ुला वाले को उठवा लिया, और हमारे वाले को भी हड़काए रखता है। चलिए! कुछ सोचकर ही किया होगा। आइए! पिछले कुछ दिनों में हुई कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं। आख़िर अनुमान लगाने का प्रत्यक्ष आधार तो अनुभव ही बन सकता है।
इंदौर में लोग पानी पीकर मर गए। एक अरसे से बिहार में नक़ली शराब ने ना जाने कितनी जानें ले ली।
बलात्कारी बेल पर हैं, और क्रांतिकारी जेल में हैं। रुपया औंधे मुँह गिरता ही जा रहा है। लोकतंत्र के प्रतिनिधि एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। प्राण से बड़ी प्रतिष्ठा हो चली है। घर, परिवार, से लेकर व्यापार चलाना मुश्किल होता जा रहा है। दवा पीकर लोग मरे जा रहे हैं। भगदड़ की समस्या भी गंभीर है। ना जाने जीवन आज कैसी-कैसी समस्याओं से परेशान है। द्वन्द्व भरी इस दुनिया में लगता है, पैसा ही समाधान है। जिसके पास पैसा है, वह और पैसे को परेशान है। जल, जंगल, ज़मीन सब बिक्री हैं। कोई पहाड़ के पहाड़ ख़रीद ले रहा है। बाक़ी के तन पर कपड़े पूरे नहीं पड़ रहे।
समाधान सही जवाब से नहीं मिलता। हमारी समस्या ही यही है कि हम जवाब तलाश रहे हैं। और हमें सवाल ही पता नहीं होता। सही सवाल पूछेंगे, तभी तो सही जवाब तक पहुँचने की जिज्ञासा जागेगी। चलिए! एक सवाल पूछते हैं। ये घुसपैठिया कौन होता है? आज कल जिसे देखो वह इनकी ही बातें करता पाया जाता है। देश के प्रधानमंत्री हों, गृह मंत्री, यह चाहे वो अमरीका का राष्ट्रपति, सब घुसपैठिया ढूँढ रहे हैं। अपनी ही दुनिया में हम घुसपैटिया कैसे बन गए? इस दुनिया में एक बड़ी कमी है। यहाँ संसाधन सीमित हैं। जीवन भी सीमित है। हिटलर हो, या बुद्ध, आकर चले गए। एक को घुसपैठिया दिखे, उसने उन्हें गैस चैम्बर में भर कर फूँक दिया। एक को डाकू अंगुलिमाल भी अपने लगे। क्या आपको याद है कि कभी बुद्ध धर्म को मानने वाले युद्ध पर गए हों? दिमाग़ पर थोड़ा ज़ोर डालने की कोशिश तो कीजिए। महावीर को ही ले लीजिए, कभी जैन सेना का नाम आपने सुना है?
मैं बिहार की भूमि से आता हूँ, बुद्ध और महावीर की धरती, जहाँ के राजा अशोक सम्राट हुए। गंगा के किनारे घर है मेरा, अक्सर गंगा माँ घर भी घुस आती है। कमरे में कमर भर पानी घुस आता है। मछलियाँ भी तैरती मिल जाती हैं। एक प्रोफेसर का घर है, मछलियाँ भी ज्ञान दे जाती है, तैरना सीखा जाती हैं। अब मैं वहाँ नहीं रहता। अब मैं मैदान से पठार पर आ चुका हूँ। मैं क्यों बिहार से भाग बैठा? शोर के कारण, धार्मिक प्रदूषण के कारण, रात दिन लाउडस्पीकर पर बजते भजन के कारण मैं झारखंड आ गया। शांत है। थोड़ा सुकून है। कुछ पहाड़ है, थोड़ा जंगल है। जगह है। और एक कारण है, राजनीति। हाल ही में हुए बिहार के चुनाव को मैंने क़रीब से देखने की कोशिश की। रवीश कुमार, द वायर, न्यूज़लाउंड्री, आर्टिकल १९, रेड माइक जैसे यूट्यूब चैनलों के माध्यम से पता चला कैसे चुनाव जीता जा रहा है? आख़िर क्यों जीत की इतनी हवस है। जीते-जी वोटरों को कागजों पर मार डाला इस सिस्टम ने। सुना है वोट भी चोरी हो रहा है। यह कैसा सिस्टम है? कैसे मुख्य-मंत्री हैं, जो किसी बेटी की आबरू पर हाथ डाल देते हैं। और बाक़ी मंत्री-मंडल उनका बचाव करता है। और हम देखते रह जाते हैं। ना जाने कितनी इज्जत निज दिन लूट रही है। क्यों?
क्या मैं भी झारखंड में घुसपैठिया हुआ? कभी झारखंड भी तो बिहार का हिस्सा हुआ करता था। मेरे पैदा होने के बहुत बाद बिहार का यह खंड झड़ गया, और झारखंड बन गया। बांग्लादेश क्या कभी अपना नहीं था? हुई गलती, हो गया विभाजन, हम आज भी क्यों बिखर जाने को आतुर हैं?
कब पूछेंगे हम सवाल? कब हम अपने बच्चों को सवाल पूछने की ट्रेनिंग देंगे?
समाधान सही जवाब से नहीं मिलता। हमारी समस्या ही यही है कि हम जवाब तलाश रहे हैं। और हमें सवाल ही पता नहीं होता। सही सवाल पूछेंगे, तभी तो सही जवाब तक पहुँचने की जिज्ञासा जागेगी।
क्यों बाजार समाज पर हावी होता जा रहा है? व्यक्ति के अंदर बाजार घर कर गया है। बाजार पर निर्भरता इतनी बढ़ गई है, कि सरकारें भी धंधा करने को ही अपनी ज़िम्मेदारी मान बैठी है। घर-घर प्यार भी व्यापार बन चला है। नफ़रत आम हो चली है। ऐसी दशा में चलिए अर्थशास्त्र से थोड़ा आगे सोचते हैं। जीवन के अर्थ की तलाश में जीवर्थशास्त्र को समझने की कोशिश करते हैं।
पैसा तो बस एक मुद्रण है। कभी कौड़ी भी क़ीमती थी। क्या होता अगर शिक्षा मुफ्त होती तो। समाज पहले ही मिलकर संसाधन जुटा रहा होता। इन क्षेत्रों को बहीखाते से बाहर करके तो देखिए, एक नई दुनिया दिखेगी। कोई अनाथ नहीं होगा। जीवन सुरक्षित होगा। एक सामूहिक रसोई अपने पड़ोस में होता, तो किसी का क्या चला जाता। आपने भी कभी लंगर तो खाया ही होगा। शायद ही आपने कभी कोई सिख भिखारी देखा होगा। गौर से देखिए, इतिहास में झाँककर देखिए — जहाँ के स्कूल अच्छे मिलेंगे, वहाँ आपको समृद्धि मिलेगी, विकास मिलेगा। हर घर बचपन अगर सुरक्षित होगा, तो कोई आतंकवादी भला क्यों बनेगा? सवाल ही हैं, सही सवाल पूछकर तो देखिए।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)







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