एक लेखक क्या चाहता है?

"लेखक अपनी बेटी को बताना चाहता है कि इस देश-समाज की उत्तराधिकारी तुम ही हो। पर इसके लिए तुम्हें नेता, अधिकारी बनने की जरूरत है। इस देश का हर नागरिक इस देश का अधिनायक है।" - इसी आलेख से
रोज़ जीता, मरता हूँ,
हर दिन भागता फिरता हूँ,
मैं ही पैदा होता हूँ,
मैं ही मरने वाला हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
कभी स्कूल में, कहीं दफ्तर में,
मैं हर जगह पाया जाता हूँ,
मैं सब कर्ता-धर्ता हूँ,
मैं ही तो भाग्य विधाता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
पैसा मेरा, सरकार मेरी,
फिर भी सड़कों पर गड्ढे पाता हूँ,
कभी रेलों में, कभी मेलों में कुचला जाता हूँ,
न्यायालय से लेकर हॉस्पिटल के चक्कर मैं लगाता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
साँस बड़ी मुश्किल से लेता हूँ,
पानी भी गंदा पीता हूँ,
शोर-शराबे में जीता हूँ,
पाँच किलो अनाज पर मैं ज़िंदा हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
मर-मर कर सरकारी खजाना भरता हूँ,
फिर फ़ीस से लेकर फाइन पर साइन करता हूँ,
शिक्षा, सेहत से लेकर मौत पर खर्चे करता हूँ,
कुछ और नहीं तो देश-दुनिया पर चर्चे मैं करता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
हर पार्टी, हर मज़हब में मैं ही पाया जाता हूँ,
इस लोक और इसके तंत्र को मैं ही तो चलाता हूँ,
मैं ही प्रधान से लेकर संतरी सेवक बनता हूँ,
बाजार से लेकर परिवार मैं ही तो बनाता हूँ।
मैं पब्लिक हूँ।
नायक भी मैं, खलनायक भी मैं,
मैं ही तो अधिनायक हूँ।
जन-गण में मैं,
मैं ही मंगलदायक हूँ।
मैं पब्लिक ही नहीं, रिपब्लिक हूँ।
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युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)

सुकांत कुमार
सुकांत कुमार

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)

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