सुबह टहलने हर रोज़ निकलता हूँ। रास्ते में एक बड़ा बग़ीचा पड़ता है। आम के बड़े बड़े दरख़्त। कटहल और सागवान। फल या मंज़र का कोई सवाल नहीं, लेकिन कभी कोई अकेली चिड़िया दिखाई पड़ जाती है। मंज़र या अमोरियों के दिनों में कोयल ख़ास तौर से ध्यान खींचती है। अन्य अनजाने पक्षी भी मौज में रहते हैं। वैसे बरसात का समय है। कभी-कभार आकाश टपक पड़ता है तो दरख़्त पर हरियाली तारी है। पत्ते अक्सर शांत रहते हैं, क्योंकि हवा में वह तेज़ी नहीं है, जो अप्रैल- मई- जून में रहती है। लेकिन देश में रफ़्तार है। आरक्षण को लेकर पुरानी बहस फिर सतह पर है। धर्म को लेकर झूठे-सच्चे क़िस्से चल रहे हैं। इसी में कॉकरोच जनता पार्टी का स्कूल ठीक करो अभियान आशा भी जगाता है।
जाति की सड़ांध हिन्दू समाज का पीछा नहीं छोड़ रही। हम कितने ही जाति के बारे में प्रचार करें कि जाति नहीं बची, लेकिन सच यह है कि जाति हिन्दुओं की नस-नस में है। पूणे में छात्रों की गूँज पर में राहुल गांधी ने मनुस्मृति के नवम अध्याय के एक श्लोक का उद्धरण देकर कहा कि पुरुष सत्ता का यह माइंडसेट अभी भी कायम है। इसके बाद तथाकथित बड़े लोग और सवर्ण जाति के लड़के उस मनुस्मृति के बचाव में उतर आये। यह समाज में पुरुषवाद और जातिवाद स्थापित करती है।
संत से बने राजनेता से बहुत उम्मीद रहती है कि कम से कम ऐसे लोग इंसानियत के पक्ष में खड़े होंगे। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे लोग समाज के लिए ज़्यादा ख़तरनाक हैं। ये इंसान के पक्ष में नहीं, जाति के पक्ष में खड़े होते हैं और गैर बराबरी को स्थापित करने में गर्व अनुभव करते हैं ।
मनुस्मृति के दो श्लोक देखिए। एक स्त्री के बारे में और दूसरे जाति के बारे में –
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षित यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा: न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति।
(मनुस्मृति, नवम अध्याय,श्लोक-3)
हिन्दी अनुवाद- बाल्यावस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है, यौवनावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है। वह सदा अधीन रहती है, क्योंकि वह स्वतंत्रता के योग्य नहीं ।
और दूसरा श्लोक –
उत्तमाड्गोद्भवाज्ज्यैष्ठ्याद्ब्रह्मणश्चैव धारणात्।
सर्वेस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मण: प्रभु:।
( प्रथम अध्याय, श्लोक-94)
हिन्दी अनुवाद- ब्रह्मा जी के उत्तम अंग मुख से उत्पन्न होने से ब्राह्मण जन शेष तीनों ( क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) वर्णों से बड़े हैं , क्योंकि उनका जन्म सबसे पहले हुआ । ब्राह्मण वेद को धारण करने से इस संसार में सर्वश्रेष्ठ हैं अर्थात् शेष तीनों वर्णों को उसके द्वारा किया गया विधान मानना चाहिए और उसको पूज्य समझना चाहिए ।
ऐसे श्लोक से मनुस्मृति भरी पड़ी है, तब भी कोई उसकी प्रशंसा या बचाव में उतरता है तो उसके माइंडसेट पर संदेह ज़रूर करना चाहिए। मनुस्मृति सिर्फ़ स्त्री और शूद्र के खिलाफ नहीं है। वह मनुष्यता के खिलाफ एक षड्यंत्र है। जो लोग यह कहते नजर आते हैं कि जाति बची नहीं और अब आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए, वही लोग कहीं करणी सेना बनाते हैं तो कहीं मैथिल संघ, कहीं ब्राह्मण महासभा तो कहीं कुछ और। इसकी प्रतिक्रिया दूसरी तरफ भी होती है। वे भी कुशवाहा महासभा, यादव महासभा, कुर्मी महासभा से लेकर दबी-कुचली जातियों की सभा बनाते हैं।
जाति-सभाएँ दोधारी तलवार हैं। जाति की सुरक्षा के नाम पर बहुत सारे खेल होते हैं। ये सभाएँ ही बताती हैं कि जातियाँ पूरी ताकत के साथ जीवित हैं। समाज में जातिगत भेदभाव, शोषण और दमन कायम है। सवर्ण जातियों का एक समूह आरक्षण के खिलाफ जंतर मंतर पर बैठा। उसे समझाने तुरंत उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री पहुँच गए। उन्होंने आश्वासन दिया कि ऊपर के नेता से बात करेंगे और समस्या का समाधान करेंगे। नरेंद्र मोदी की सरकार ने आर्थिक आधार पर सवर्ण जातियों को दस प्रतिशत आरक्षण दिया है। जबकि संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने से तथाकथित प्रतिभा कुचली नहीं जाएगी? और जाति दंभ भी कायम रहेगा। आश्चर्य यह है कि केंद्र सरकार के मातहत विभिन्न विभागों में दस लाख पद खाली हैं। लेकिन ये लोग उसे भरने का आंदोलन नहीं कर रहे। इन्हें हर हाल में जाति-वर्चस्व चाहिए, नौकरी नहीं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







