
"धूप से जले हुए मंजर धरती पर बिखरे पड़े हैं। कुछ दिन पूर्व पेड़ों के लाड़ले थे, अब उपेक्षित हैं। उपेक्षा टीस मारती है। जीवन को दग्ध करती है, लेकिन सीख भी देती है।" इसी आलेख से

18 मार्च, 1974 को आंदोलनरत तीन छात्रों से गोलियों से भून दिया गया था। इसलिए आज का दिन राजकीय उत्पीड़न और कुव्यवस्था के विरुद्ध उन आंदोलनरत छात्रों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करने के साथ ही जेपी आंदोलन में शामिल राजनीतिक दलों की वर्तमान प्रवृत्तियों पर भी विचार करने की जरूरत है।

"चुनाव में रोग लगा और अब यह कैंसर का रूप ले रहा है। इसका ठीक से इलाज नहीं हुआ तो लोकतंत्र को राजतंत्र या सैनिक तंत्र में बदलने में देर नहीं लगेगी।" - इसी आलेख से

विस्थापन की त्रासदियों और पीड़ाओं को शब्दों में बाँधने की कोशिश करता साहित्यिक लेख

दरअसल संसार वह है जो ससर रहा है यानी बदल रहा है। इस बदलाव के झोंके में नैतिकता और वर्जनाओं के दायरे भी बदल रहे हैं। इस बदलाव के संकट भी है। जानने के लिए पढ़ें यह आलेख

सभ्यता का तक़ाज़ा है कि लोग शांति और सुख की ओर बढ़ें। लेकिन विश्व में हड़पने की होड़ ने हत्याओं और विनाश का अंतहीन दौर चल पड़ा है। हमारी सभ्यता का आज यही चेहरा बन गया है।

"असल में लोकतंत्र पूँजीपतियों और उसके दलालों का शासन है। जनता को सरकार चुनने का भ्रम भले रहे, लेकिन असल लाभ और मजा पूँजीपति और दलाल ही उठाते हैं।" इसी आलेख से

"प्रकृति की किसी भी चीज़ को मनुष्य ने निर्मित नहीं किया, फिर इन पर मनुष्य का एकाधिकार क्यों हो? ये तमाम चीज़ें सबके लिए हैं और किसी लालची तानाशाह को इसे बर्बाद करने की छूट देना मनुष्यता के साथ द्रोह है।" इसी आलेख से

" राजनीतिक दलों के लिए खून-पसीना बहाते हैं उसके कार्यकर्ता, मगर कार्यकर्ताओं पर नेताओं को भरोसा नहीं होता, इसलिए गोदाम में पड़े अपने पुत्र-पुत्रियों को धो-पोंछ कर व गाल पर पाउडर मल कर निकाल लाते हैं। और फिर उनके जयकारे लगने लगते हैं।" इसी आलेख से

"प्रधानमंत्री ने विदेशी दौरे पर अरबों रूपये लुटाए और जिसका कुल नतीजा है कि वे ट्रंप के ट्रैप में हैं।" इसी आलेख से