
"ट्रंप पर चली गोलियाँ कोई अच्छा संकेत नहीं है, लेकिन ट्रंप हर दिन ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें वे लोगों के अंदर उत्तेजना भरते हैं। अपने स्वार्थ के लिए जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण करते हैं और ईरानी के बच्चे-बच्चियों की हत्या कर शर्म नहीं महसूसते तो आप दुनिया में हिंसक वातावरण पैदा करने के दोषी हैं।" - इसी आलेख से

"सोलहवीं सदी में भी 'जीविका-बिहीन' लोग खुद से सवाल करते थे- कहाँ जायें, क्या करें? आज भी पूरी दुनिया की कम से कम आधी जनसंख्या सोलहवीं सदी की तरह ही अनिश्चित जीवन जी रही है।" - इसी आलेख से

"नफ़रत नयी दुनिया नहीं रच सकती। हिंसा सदा विध्वंस करती है। आज मनुष्य के अंदर जो व्याकुलता है, वह सामान्य व्याकुलता नहीं है। इस व्याकुलता ने मनुष्य के स्तर को बहुत नीचे गिरा दिया है, क्योंकि यह व्याकुलता में रचने की ख्वाहिश नहीं है। एक तरह से विध्वंस का आह्वान है।" - इसी आलेख से

"ईरान पर थोपे गए युद्ध रूक नहीं रहे और वह क्रमशः भयानक होते जा रहे हैं। इस मार्ग से आते-जाते जहाज पर हमले हो रहे हैं और ईरान ने तो यहाँ तक कहा है कि समुद्र का पानी खून से लाल कर देंगे। वे समुद्र का पानी जब लाल करेंगे, तो करेंगे, लेकिन यहाँ तो अनेक देशों के खून सूख रहे हैं।" इसी आलेख से

"व्यवहारों में संतुलन, सम्मान, संवाद। लोकतंत्र के लिए यह एकमात्र रास्ता है, मगर फ़िलहाल तो हर बात में विवाद। जनता भी विवादों में रुचि लेती है।" - इसी आलेख से

"प्रधानमंत्री का नौका विहार भी सुमित्रानंदन पंत का नौका विहार नहीं है। वे यहाँ भी वोट का व्यापार कर रहे हैं। बेचारे को कितना काम करना पड़ता है। मजा के लिए थोड़ा-सा जो भी वक़्त होता है, वह भी व्यापार की भेंट चढ़ जाता है।" - इसी आलेख से

"बंगाल में इन्होंने मछली खा ली तो वह मछली शाकाहारी हो गयी और जब ये अरुणाचल जायेंगे, जहाँ लोग कुत्ते को प्यार से खाते हैं, वहाँ ये लोग कुत्ते खायेंगे और कहेंगे कि मैंने शाकाहारी कुत्ता खाया।" - इसी आलेख से

"पीपर के नीचे हँसी- मजाक और कभी बोगिलबाजी। हम बच्चे बोगिल (धरती पर चौकोर खींचीं रेखाएँ) बनाकर गुल्लियाँ टनकारते। अब गाँव से गुल्ली और गाय दोनों ग़ायब हो गए हैं।"

"चाँद तो सूरज से रोशनी लेता है। आदमी भी एक-दूसरे से ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान ही तो आदमी की रोशनी है, वरना आठ जगहों से टेढ़े अष्टावक्र जनक के दरबारियों को चुनौती कैसे देता!" - इसी आलेख से

"यह सच है कि काल की चक्की चल रही है, एक दिन उस चक्की में पिसना ही है, मगर मनुष्य आख़िर सच्ची ख़ुशी कहाँ से लाये?" - इसी आलेख से